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बैंक घोटालों से चिंतित डेट फंड निवेशक

जयदीप घोष और संजय कुमार सिंह /  March 15, 2020

बिड़ला सन लाइफ म्युचुअल फंड के मुख्य कार्याधिकारी ए बालासुब्रमण्यन कहते हैं, 'हर व्यक्ति को नेट एसेट वैल्यू (एनएवी) में उतार-चढ़ाव को सहन करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। उनके लिए ऐसे फंडों से जुड़े रहना सही रणनीति होगी, जो कई दौर देख चुके हैं और मामूली उतार-चढ़ावों को पार कर सकते हैं।'

पिछले 18 महीनों में कई मौकों पर एनएवी में उतार-चढ़ाव को लेकर निवेशकों के धैर्य की परीक्षा हुई है। उदाहरण के लिए येस बैंक के बोर्ड के अधिकार छीनकर अपने हाथ में लेने और एडिशनल टियर वन (एटी-1) बॉन्डों को रद्द करने के भारतीय रिजर्व बैंक के फैसले से निप्पॉन इंडिया की पांच योजनाओं का एनएवी एक दिन में 9 फीसदी से 25 फीसदी तक गिरा। फ्रैंकलिन इंडिया, आईडीबीआई और यूटीआई एसेट मैनेजमेंट जैसी अन्य फंड कंपनियों की योजनाओं को भी नुकसान झेलना पड़ा है। 

डेट फंड निवेशक सितंबर 2018 में इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनैंशियल सर्विसेज घोटाला सामने आने के बाद से लगातार दबाव में हैं। तब से कई बड़ी कंपनियां डेट म्युचुअल फंड योजनाओं के भुगतान में डिफॉल्ट या देरी कर चुकी हैं। इन कंपनियों में अनिल अंबानी समूह, जी एंटरप्राइजेज, दीवान हाउसिंग फाइनैंस आदि शामिल हैं।  सबसे बड़ी चिंता यह है कि ये घटनाएं बार-बार हो रही हैं। ऐसे माहौल में डेट निवेशकों को क्या करना चाहिए?

कोटक म्युचुअल फंड के प्रबंध निदेशक नीलेश शाह सलाह देते हैं, 'इसमें बिना जोखिम के कोई प्रतिफल नहीं मिल रहा है, इसलिए निवेशकों को ऑफर दस्तावेज, मासिक पोर्टफोलियो की जानकारी देने वाली फैक्ट शीट को देखने और पोर्टफोलियो के ऋण जोखिम, तरलता जोखिम और ब्याज दर जोखिम को समझने के बाद डेट फंड में निवेश करना चाहिए। ऐसा करने के लिए ज्यादातर निवेशकों के पास समय नहीं होता है, इसलिए उन्हें वित्तीय योजना के लिए कोई उचित वितरक या सलाहकार चुनना चाहिए।'

हाल में येस बैंक में पैदा हुई समस्या थोड़ी अलग है। इसके बहुत से ऋण फंसते जा रहे हैं, इसलिए बैंक को नियामकीय शर्तें पूरी करने के लिए इक्विटी पूंजी जुटाने की जरूरत थी। लेकिन बैंक का प्रबंधन ऐसा नहीं कर पाया, जिससे भारतीय रिजर्व बैंक को दखल और अस्थायी रोक के लिए बाध्य होना पड़ा। बैंक के पुनर्गठन के लिए जो प्रस्ताव तैयार किया गया है, उसके प्रारूप के मुताबिक भारतीय स्टेट बैंक 49 फीसदी हिस्सेदारी के बदले 2,450 करोड़ रुपये का निवेश करेगा।  

एटी-1 बॉन्डों में क्या है खास

डेट फंड निवेशकों के लिए समस्याएं बहुत अलग हैं। आम तौर पर जब किसी कंपनी में समस्या पैदा होती है तो बॉन्ड धारकों को सबसे पहले भुगतान किया जाता है। उसके बाद ऋणदाताओं और इक्विटी धारकों को भुगतान किया जाता है। लेकिन एटी-1 बॉन्ड पूरी तरह सीनियर सिक्योर्ड बॉन्ड नहीं हैं। उनकी जगह डेट और इक्विटी के बीच है। उनमें नियमित सीनियर बॉन्डों की तुलना में ऊंची कूपन दर मिलती है। अगर साझा इक्विटी टियर 1 अनुपात एक निश्चित सीमा से नीचे आता है तो इन एटी-1 बॉन्डों के मूल्य को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है। येस बैंक का अधिग्रहण करने वाली कंपनी को बैंक का कर्ज वहन करना पड़ता। लेकिन अगर बैंक की बैलेंस शीट कर्ज से लदी होती तो कोई भी कंपनी उसके अधिग्रहण को आगे नहीं आती। यही वजह है कि आरबीआई ने एटी-1 बॉन्डों का मूल्य पूरी तरह खत्म करने का प्रस्ताव रखा है। 

येस बैंक ने 8,500 करोड़ रुपये के एटी-1 बॉन्ड जारी किए हैं, जिनमें से करीब 2,700 करोड़ रुपये के बॉन्ड म्युचुअल फंडों ने खरीदे हुए हैं। बैंक की अन्य सभी डेट प्रतिभूतियों की रेटिंग घटाकर डी या डिफॉल्ट कर दी गई है। म्युचुअल फंडों ने येस बैंक के करीब 100 करोड़ रुपये के अन्य (गैर एटी-1) बॉन्ड भी खरीदे हुए हैं। इन बॉन्डों के मूल्य को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता है। लेकिन एटी-1 बॉन्डों का मूल्य शून्य हो गया है। येस बैंक के बॉन्डों में मोटे निवेश वाली फंड कंपनियों ने उन्हें अलग कर दिया है। कुछ बॉन्ड धारक डेट को इक्विटी में बदलने की मांग लेकर अदालत में गए हैं। 

प्राइमइन्वेस्टर डॉट इन की सह-संस्थापक विद्या बाला कहती हैं, 'येस बैंक कई चुनौतियों से जूझ रहा था और एटी-1 बॉन्डों में नियमित कॉरपोरेट बॉन्डों की तुलना में ज्यादा जोखिम है। ऐसे में सवाल पैदा होता है कि म्युचुअल फंडों के उनमें अपना निवेश क्यों बनाए रखा।' यह संभव है कि फंड प्रबंधकों ने इन बॉन्डों से छुटकारा पाने की कोशिश की हो, लेकिन वे इसमें सफल न रहे हों। मिरे एसेट ग्लोबल इन्वेस्टमेंट के प्रमुख (फिक्स्ड इनकम) महेंद्र जाजू ने कहा, 'जब किसी कंपनी में कोई दिक्कत होती है तो फंड प्रबंधक के लिए उस कंपनी के बॉन्डों को द्वितीयक बाजार में बेचना मुश्किल होता है।' 

निवेशकों के लिए विकल्प 

निवेशकों को यह जांचना चाहिए कि उनके फंड का इन बॉन्डों में कितना निवेश है। बाला ने कहा, 'अगर निवेश अधिक है और शेष पोर्टफोलियो की गुणवत्ता अच्छी नहीं है तो निवेशकों को उस फंड से बाहर निकल जाना चाहिए। लेकिन अगर फंड का निवेश इन बॉन्डों में महज 1-2 फीसदी है और शेष पोर्टफोलियो अच्छा है तो निवेशक उस फंड के साथ बने रह सकते हैं।'

मौजूदा निवेशकों के लिए साइड पॉकेटिंग लाभप्रद रहेगा। ऐसा जी एंटरप्राइजेज के मामले में हुआ था, जिसने कुछ देरी के बाद भुगतान किया था। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर इंडिया में निदेशक (प्रबंधक अनुसंधान) कौस्तुभ बेलापुरकर ने कहा, 'अगर आप मुख्य फंड में भी अपनी यूनिट बेचते हैं तो आपको स्थायी नुकसान नहीं होगा। जब कोई सकारात्मक समाधान होगा तो म्युचुअल फंडों को कुछ पैसा मिल सकेगा। आपको भी अलग पोर्टफोलियो के इन बॉन्डों से कुछ पैसा मिल सकता है।' 

निवेशकों के लिए रणनीति 

शाह ने कहा, 'जो निवेशक कम ऋण जोखिम उठाना चाहते हैं, उन्हें कम ऋण जोखिम वाले फंडों जैसे डायनैमिक बॉन्ड फंड, गिल्ट फंड और पीएसयू डेट फंड में निवेश करना चाहिए। ये फंड प्रतिफल देने के लिए ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव को ठीक से नियंत्रित करते हैं। जो निवेशक क्रेडिट जोखिम उठाना चाहता है, वह क्रेडिट रिस्क फंडों के बारे में विचार कर सकता है। ये फंड अधिक प्रतिफल के लिए कम रेटिंग वाली परिसंपत्तियों में निवेश करते हैं।'

बालासुब्रमण्यन ने कहा कि जहां तक किसी योजना को चुनने का सवाल है, निवेशकों को अपने धन का बड़ा हिस्सा उन अच्छी डेट योजनाओं में लगाना चाहिए, जो 6 महीने से 3 साल की अवधि वाली प्रतिभूतियों में निवेश करती है। उन्होंने कहा, 'इन योजनाओं के परिपक्व होने पर निवेश राशि का फिर से निवेश हो जाता है, इसलिए परिपक्वता पर ब्याज दर फिर से तय होती है।' नए निवेशकों को अच्छे पोर्टफोलियो वाले फंडों से जुड़े रहना चाहिए।  जाजू ने कहा, 'मौजूदा माहौल आक्रामक नहीं बल्कि अच्छी गुणवत्ता वाले फंडों से जुड़े रहने के लिए बेहतर है।' वह कहते हैं कि निवेशकों को ऐसे फंडों से बचना चाहिए, जो स्ट्रक्चर्ड प्रॉडक्ट और एटी-1 बॉन्डों जैसी योजनाओं में निवेश करते हैं।

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