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भारतीय कुलीन वर्ग का समाजवाद

शेखर गुप्ता /  March 15, 2020

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में प्रवेश के बाद भोपाल में जोरदार स्वागत के बीच ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि राज्य की राजनीति में वह और शिवराज सिंह चौहान ही ऐसे नेता हैं जो अपनी कारों में एयर कंडीशनर (एसी) नहीं चलाते। उनकी इस बात पर तंज कसे गए कि एक महाराजा ऐसा है जो रेंज रोवर से चलता है लेकिन वह एसी का प्रयोग नहीं करता। परंतु यह बात महत्त्वपूर्ण नहीं है। राजनीतिक दृष्टि से वह भारतीय राजनीति की एक केंद्रीय हकीकत को स्वीकार कर रहे हैं: राजनीति में सर्वाधिक शक्तिशाली और समृद्ध से लेकर शाही और ताकतवर उद्योगपति तक हर किसी को मितव्ययी और सादगीपसंद दिखना पड़ता है, भले ही वे किसी चायवाले जैसे नहीं दिखें।

बात करते हैं उस चाय वाले की जो भारतीय राजनीति में सबसे चर्चित है। गीतकार प्रसून जोशी ने सन 2018 में लंदन में जब टेलीविजन पर प्रसारित एक बातचीत में उनसे यह कहा था कि इतनी फकीरी आप लाते कहां से हैं तो वह दरअसल भारतीय राजनीति की इसी हकीकत को रेखांकित कर रहे थे। वह कहना चाह रहे थे कि प्रधानमंत्री फकीर जैसी विनम्रता और सादगी कहां से लाते हैं? इसका सहज और तथ्यात्मक उत्तर होता- क्योंकि मैं फकीरी में पैदा हुआ, मैं इतना गरीब था कि मुझे रेलवे प्लेटफॉर्म पर चाय बेचनी पड़ी। परंतु इससे मकसद पूरा नहीं होता। उद्देश्य था इस बात को सामने लाना कि इतना ताकतवर और लोकप्रिय व्यक्ति भी फकीर रह सकता है।

यहां तीन प्रासंगिक बातों का उल्लेख आवश्यक है। पहला, हम सत्ताधारी वर्ग से कुलीनता को चाहे जितना जोड़ें लेकिन सच यह है कि कोई सामंत या महाराजा अब तक शीर्ष पर नहीं पहुंचा। लेकिन कोई फकीर भी वहां तक नहीं पहुंचा था। नरेंद्र मोदी इकलौते ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने यह उपलब्धि हासिल की। तीसरी बात, एक बार जब एक लोकप्रिय राजा (महाराजा नहीं) को चुना गया, उस वक्त  उनका नारा था, 'राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है।' हम मांडा के राजा स्वर्गीय विश्वनाथ प्रताप सिंह की बात कर रहे हैं।

क्या हम कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति अमीरों या सामाजिक कुलीनों के लिए नहीं है? यह सच है कि बीते सात दशक में हमें ऐसे कुलीनों के तीन नाम तक नहीं मिलते जो इतने लोकप्रिय हों कि उन्हें किसी राज्य का नेतृत्व सौंपा जा सके। ऐसे दो नाम हैं पंजाब में अमरिंदर सिंह और राजस्थान में वसुंधरा राजे (ज्योतिरादित्य की बुआ)। यह रिकॉर्ड खराब है लेकिन सामंती कुलीनों के लिए।

शेष के संदर्भ में एक सा सिलसिला नजर आता है जहां एक पीढ़ी धूल-मिट्टी से उभरती है और उसके वंशज नए सत्ताधारी कुलीन बन जाते हैं। नेहरू-गांधी परिवार कामगार वर्ग से नहीं था लेकिन लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम, बंसी लाल, शरद पवार, मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद, करुणानिधि और ऐसे तमाम अन्य नेता थे। उनके वंशज सबसे बेहतर घडिय़ा और चश्मे पहनते हैं, सबसे अच्छी गाडिय़ां चलाते हैं और बेहतरीन पेन रखते हैं। मोदी भी उनमें से एक हैं। हालांकि इन सभी को विनम्र दिखना होता है। जब वे यकीन से ऐसा नहीं कर पाते तो उन्हें ऐसी बातें कहनी पड़ती हैं कि वे अपनी कारों में एसी नहीं चलाते।

यह पाखंड हर दल में है। इसीलिए राहुल गांधी को दलित के घर खाते, मोटर साइकिल पर पीछे बैठे और ढाबे पर खाना खाते नजर आना चाहिए। उन्हें सवारी ट्रेन में सफर करते दिखना चाहिए। फिर क्या हुआ जो वे विदेशों में लंबी छुट्टियां बिताते हैं। कमल नाथ को चुनाव प्रचार के दौरान अपने हैरोड के बिस्किट सीट के बीच छिपा कर रखने चाहिए। ज्यादातर राजनीतिक राजकुमारों को दो तरह की जीवन शैली रखनी होती है। इसे दिन के राजनीतिक समय की पूर्वाह्न शैली और शाम को सामाजिक मेलमिलाप की अपराह्न शैली कह सकते हैं। ऐसे दोहरेपन से मेरा पहला साबका सन 1984 में ग्वालियर में स्वर्गीय माधव राव सिंधिया का चुनाव प्रचार कवर करते समय पड़ा। वह कांग्रेस का समाजवादी संदेश देते, हमें प्रोत्साहित करते कि हम उन्हें केवल भैया कहकर पुकारें लेकिन एक गांव से गुजरते समय उनकी आंख चमक उठी और उन्होंने गर्व से कहा कि उन्होंने वहीं पहली बार बाघिन का शिकार किया था। 

मतदाता इस सच्चाई से अवगत हैं लेकिन उन्हें दिखावा पसंद है। भारतीय राजनीति में नेता की विनम्रता कारगर हथियार है। इसलिए कह सकते हैं कि यहां डॉनल्ड ट्रंप जैसे नेता का चुना जाना मुश्किल है। हम बहुत अमीर लोगों पर ज्यादा यकीन नहीं करते।

हमारी राजनीति हमेशा से ऐसी ही थी। सरकारी स्कूलों की किताबों में जवाहरलाल नेहरू वाले अध्याय में पढ़ाया जाता है कि वह इतने अमीर परिवार से आते थे कि उनके कपड़े ड्राई क्लीन होने स्विट्जरलैंड जाते थे। परंतु असल जोर इस बात पर था कि उन्होंने यह आराम त्यागा और जेल गए।

इससे एक नया मॉडल सामने आया: भले ही आप साधारण परिवार से नहीं आते लेकिन यदि आपको राजनीति में करियर बनाना है तो आप अलग रूप अपना सकते हैं। यही कारण है कि आज भी नेहरू से नफरत करने वाले, खासकर हिंदू दक्षिणपंथी यूरोपियन कुलीनों के साथ पार्टी करते, धूम्रपान करते उनकी तस्वीरें प्रचारित करते हैं। 

यकीनन शास्त्री असली जन नेता माने जाते थे। यह बात प्रसिद्ध है कि वह अपने पीछे परिवार के लिए एक पुरानी फिएट (बाद में प्रीमियर) कार और चुकाने के लिए सरकारी कर्ज छोड़ गए थे। कुलीनता के इसी आक्रामक विरोध के कारण बाद के दशकों के दौरान गरीबी को एक गुण के रूप में पेश किया गया। इससे आगे चलकर राष्ट्रीय विचारधारा प्रदूषित हुई। 

मैंने संप्रग के शासन काल में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के निर्धनतावाद का मजाक उड़ाते हुए कहा था, 'गरीबी मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं यह सुनिश्चित करूंगा कि आप गरीब रहें।' शायद ऐसा करना मुझे रोमांचक लगा हो लेकिन इससे मेरा ही मजाक उड़ा। इसे चाहे जो नाम दिया जाए लेकिन एक खास किस्म का लोकलुभावनवाद आज हमारी राष्ट्रीय विचारधारा है। मोदी से लेकर राहुल तक और माक्र्सवादियों से लेकर मोहन भागवत और ममता बनर्जी से लेकर दिलीप घोष तक सभी इस पर सहमत हैं। हर कोई चाहता है कि वह कम से कम अमीर नजर आए और अपनी राजनीति अमीरों को नुकसन पहुंचाने के भ्रम के इर्दगिर्द तैयार करें। इससे गरीबों को परपीड़ा का सुख मिलता है और यदाकदा कुछ हासिल हो जाता है। मोदी सरकार ने अत्यधिक अमीरों, पूंजीगत लाभ और लाभांश कर में इजाफे जैसे जो कदम उठाए हैं उससे बहुत कम राजस्व मिलेगा लेकिन जब अमीर रोते हैं और शिकायत करते हैं तो गरीबों को आनंद आता है।

राजनीतिक अर्थव्यवस्था में ऐसी एकरूपता देश को कहां ले जाएगी? ऐसे में आश्चर्य नहीं कि देश में दो ही धारणाएं बची हैं। सामाजिक विभाजन वाली या फिर व्यक्ति केंद्रित। नेहरू द्वारा चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के नेतृत्व वाले कांग्रेस पार्टी के उदारवादियों की सफल विदाई को छह दशक बीत चुके हैं। ये लोग आर्थिक स्वतंत्रता के समर्थक थे और न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन के असल हिमायती। ऐसे में भारतीय राजनीति में जोर इस बात पर रहा है कि कौन अधिक समाजवादी दिख सकता है। आज मोदी इस मामले मे बाकियों से मीलों आगे हैं।

इसलिए आज भारत उस दशा में पहुंच गया है जिसका मखौल उड़ाते हुए अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने हिंदू वृद्धि दर करार दिया था। सन 1970 की तरह यह दशक भी झूठी खुशहाली का है। नरसिंहराव-मनमोहन सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी के अधीन सीमित समय के लिए हमने जो भी देखा वह एक भटकाव भर था। 

मुझे सन 1990 की प्राग की एक घटना याद आती है। मेरे युवा टैक्सी चालक ने चेकोस्लोवाकिया के बेहतरीन विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग की थी लेकिन उसके पास नौकरी नहीं थी। वह वामपंथ से अपनी घृणा के बारे में बहुत जुनून से बात कर रहा था। मैंने उसे याद दिलाया कि भारत में वामपंथ अच्छी स्थिति में है और उनके समर्थन वाली सरकार (वीपी सिंह की) सत्ता में है।

उसने मुझसे कहा, जब आपातकाल लगा और आपकी राजनीतिक स्वतंत्रता छिनी तो आपने लड़कर उसे वापस लिया। परंतु आपने अपनी आर्थिक आजादी के लिए लड़ाई नहीं लड़ी क्योंकि आपने कभी इसका स्वाद नहीं चखा था। हम चेकवासी राजनीतिक और आर्थिक दोनों तरह की स्वतंत्रता के लिए लड़े।
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