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ठोस उपाय करने से ही थमेगा समाचार चैनलों पर वैमनस्य

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  March 13, 2020

कुछ दिन पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने दो समाचार चैनलों- एशियानेट न्यूज और मीडियावन- पर 48 घंटे का प्रतिबंध लगा दिया था। मंत्रालय का तर्क था कि इन दोनों चैनलों ने दिल्ली में हुए दंगे से जुड़ी सामग्री का प्रसारण अनुचित तरीके से किया, जो केबल टेलीविजन नेटवक्र्स (रेग्युलेशन) अधिनियम, 1995 के तहत वर्णित नियमों के अनुरूप नहीं था। मंत्रालय का कहना था कि इन चैनलों ने जिस तरह दंगे से जुड़े समाचारों का प्रसारण किया था, उससे समाज में कटुता पैदा हुई। दंगे में 50 से अधिक लोग मारे गए और सैकड़ों बेघर हो गए। दोनों चैनलों ने मंत्रालय के निर्णय पर सवाल खड़े किए। मंत्रालय ने एक दिन बाद ही प्रतिबंध हटा दिया। 

 
मंत्रालय की यह कार्रवाई महज दिखावा ही कही जा सकती है। दिल्ली में मुख्य रूप से हिंदी और अंग्रेजी भाषाएं ही बोली जाती हैं। मलयालम भाषा के इन दोनों चैनलों के दर्शकों की संख्या दिल्ली में नाम मात्र है। दूसरी तरफ हिंदी और अंग्रेजी समाचार चैनल अक्सर समाज को बांटने वाली खबरें प्रसारित करते रहते हैं और हरेक घटना को अनावश्यक रंग चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं। ऑक्सफर्ड डिक्शनरी में घृणा भाषण को ऐसे भाषण या लेखन के तौर पर परिभाषित किया गया है, जो किसी खास समूह के लोगों पर प्रजाति, धर्म या यौन आचरण के आधार पर हमला करता है या धमकी देता है। राजनीतिज्ञ जब समाज को बांटने वाले भाषण देते हैं तो उन पर शायद ही कड़ी कार्रवाई होती है। समाचार चैनलों पर समाचार प्रस्तोता (न्यूज एंकर) लगभग हर रोज वैमनस्य एवं समाज को बांटने वाले समाचार बिना किसी संकोच के प्रसारित करते रहते हैं। इस तरह की गतिविधियां केबल अधिनियम का उल्लंघन करती हैं, लेकिन इसे लेकर सरकार ने कभी गंभीरता नहीं दिखाई है। 
 
कुछ अपवाद जरूर हैं, लेकिन मोटे तौर पर भारतीय न्यूज टेलीविजन और इसके न्यूज एंकरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम धूमिल किया है। भारतीय न्यूज चैनल और उनके न्यूज एंकर न केवल भारत में हास्य व्यंग्य के पात्र बन गए हैं, बल्कि विदेश में भी दूसरे देशों के पत्रकार इनकी खिल्ली उड़ाते हैं। आखिर नौबत यहां तक कैसे आ पहुंची है? टेलीविजन की पहुंच 83.6 करोड़ भारतीयों तक है। इसकी तुलना में इंटरनेट की 66 करोड़ और अखबारों की 40 करोड़ लोगों तक ही पहुंच है। ब्रॉडकास्ट ऑडियंस काउंसिल रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार इनमें समाचार चैनलों की पहुंच 26 करोड़ लोगों तक है। करीब 5 से 10 करोड़ लोग इंटरनेट के माध्यम से भी समाचार देखते हैं। वर्ष 2000 में समाचार चैनलों की तादाद करीब 10 थी और यह संख्या बढ़कर 400 से अधिक हो गई है, जो दुनिया में सबसे अधिक है। ऐसे चैनलों की आई बाढ़ के बीच 24 घंटे समाचार दिखाने वाले चैनलों की मांग, प्रशिक्षण का अभाव, राजस्व पर निर्भरता और उलझे मालिकाना हक हालात और पेचीदा बना देते हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि एक भारतीय समाचार प्रसारण बाजार का जन्म हुआ है। 
 
हालत यह है कि फर्जी समाचार वेबसाइटों और भारतीय समाचार चैनलों के बीच अंतर ना के बराबर रह गया है। फर्जी समाचार वेबसाइट चौकाने वाली सुर्खियां लगाते हैं और भारतीय समाचार चैनल और इनके न्यूज एंकर दर्शकों को बांधे रखने के लिए नाटकीय तरीके से खबरें परोसते हैं। समाचार चैनल किसी घटना को कितना भी बढ़ा चढ़ाकर या नाटकीय तरीके से पेश क्यों न करें, उन्हें वित्तीय तौर कोई लाभ मिलता नहीं दिख रहा है। टेलीविजन उद्योग 74,000 करोड़ रुपये का है, जिनमें समाचार टेलीविजन की हिस्सेदारी मात्र 3,000-4,000 करोड़ रुपये है। इनमें भी कुछ ही समाचार चैनल मुनाफा कमा पा रहे हैं। हालांकि ये जो दिखाते हैं, उनका समाज पर व्यापक असर जरूर पड़ता है। अन्य नुकसान के साथ ही ये भारत की विविधता की छवि को भी तार-तार कर रहे हैं। भारत ऐसा देश रहा है, जिसके बुद्धिजीवियों और मुख्य कार्याधिकारियों का विदेश में स्वागत किया जाता है। 
 
विडंबना यह है कि ये हालात उन चैनल मालिकों के तहत ही हुए हैं, जिन्होंने पिछले 50 वर्षों में देश को बेहतरीन मीडिया ब्रांड दिए हैं। बिगड़ते हालात को देखते हुए निश्चित तौर पर प्रभावी कदम उठाए जाने की जरूरत है। सबसे पहले मालिकाना हक में बदलाव की जरूरत है। गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता और अन्य दबावों के बीच किसी एक को चुनने की बात आती है तो मालिकाना हक संबंधी शर्तें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। दुनिया के कुछ श्रेष्ठ न्यूज ब्रांड- द इकॉनमिस्ट, द न्यू यॉक टाइम्स, फाइनैंशियल टाइम्स- पर ट्रस्ट का नियंत्रण है। 
 
दूसरा उपाय यह है कि दूरदर्शन और आकाशवाणी को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया जाए। एक स्वतंत्र सार्वजनिक प्रसारक समाचार बाजार में कई सकारात्मक बदलाव ला सकता है। बीबीसी का नाम इस लिहाज से अहम है। इसने न केवल ब्रिटेन के लोगों तक निष्पक्ष भाव से खबरें पहुंचाई हैं, बल्कि वहां निजी समाचार प्रसारकों पर भी नियंत्रण रखा है। तीसरे उपाय के तहत एफएम रेडियो चैनलों को समाचार प्रसारित करने की अनुमति दी जा सकती है। इससे एक और समाचार माध्यम सामने आएगा, जिसकी पहुंच बड़ी संख्या में लोगों तक होगी। 
 
अंत में कुछ जिम्मेदारी दर्शकों और विज्ञापनदाताओं की भी बनती है। क्या दर्शक एवं विज्ञापनदाता उन चैनलों से दूरी बना सकते हैं, जो समाज में वैमनस्यता फैलाते हैं? यहां पर यह तर्क दिया जा सकता है कि समाचार चैनल इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि इससे उन्हें अपनी पहुंच बढ़ाने में मदद मिलती है। पिछले तीन वर्षों में कुछ खास हिंदी एवं अंग्रेजी समाचार चैनलों के दर्शकों की संख्या एवं विज्ञापन राजस्व में इजाफा हुआ है। कुछ भी हो, लेकिन घृणा फैलाने वाले समाचारों से शायद ही देश का भला हो। अगर करोड़ों दर्शक ऑनलाइन या प्रिंट माध्यम में से बेहतर विकल्पों का चयन कर सकते हैं और विज्ञापनदाता दूरी बनाए रखना शुरू करें तो क्या यह घृणा, दर्शक, राजस्व, धुव्रीकरण का सिलसिला तोड़ सकते हैं?
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