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पेशेवर क्षेत्र को बदल रही है नई तकनीक

अजित बालकृष्णन /  March 13, 2020

विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे पेशेवरों के प्रति समाज में बढ़ते गुस्से के बीच काफी संभव है कि नई तकनीक और कृत्रिम मेधा इन्हें काफी हद तक बदल दे। जानकारी प्रदान कर रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
मैं ऐसी सुर्खियों को स्तब्ध होकर देखता रह जाता हूं: गत जून की एक सुर्खी कहती है कि भारत में 8 लाख चिकित्सक बेहतर कार्य परिस्थितियों की मांग करते हुए हड़ताल पर चले गए। इस नवंबर की एक सुर्खी के अनुसार पुलिस के दमन के खिलाफ बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने दिल्ली की तमाम अदालतों के अधिवक्ताओं से हड़ताल पर जाने को कहा। वहीं गत दिसंबर की एक खबर की सुर्खी है: दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने अस्थायी शिक्षकों के समायोजन की मांग करते हुए अनिश्चितकालीन हड़ताल का आह्वान किया। 
 
मैं भारत के एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखता हूं। मेरे पिता और दादा चिकित्सक थे, मेरे चाचा-चाची और चचेरे भाई-बहिन या तो चिकित्सक थे या कॉलेज में प्रोफेसर अथवा इंजीनियर। हम अन्य परिवारों की ईष्र्या का केंद्र थे। लोगों के भीतर इन्हें लेकर सराहना का भाव रहता और पारंपरिक विवाह बाजार में उनकी अच्छीखासी कदर होती। आखिर ऐसे विवाह ही तो किसी व्यक्ति का सही आकलन पेश करते हैं। मैंने पूरा प्रयास किया लेकिन मैं इस बात की कल्पना तक नहीं कर पाया कि उनमें से कोई जीवन में कुछ हासिल करने के लिए हड़ताल पर जाएगा। हड़ताल पर जाने का काम मिल मजदूर और बोझ उठाने वाले करते थे। देश में चिकित्सकों, अधिवक्ताओं, प्रोफेसरों और इंजीनियरों का वेतन बाकी कर्मियों से काफी बेहतर रहता था। यदि उन्हें आवश्यकता महसूस होती तो उनके वेतन में कुछ सुधार कर दिया जाता। उन्हें इसके लिए बस मुख्यमंत्री या सचिवों के कान में फुसफुसाकर अपनी बात कहनी होती थी और काम बन जाता था। 
 
ये ऐसे पेशे थे जिनकी देश का मध्यवर्गीय युवा आकांक्षा करता था। ये युवा कड़ी मेहनत करते थे ताकि वे प्रतिस्पर्धी परीक्षा पास कर सकें और उनके सामने करियर के दरवाजे खुल सकें। ये पेशे प्रतिष्ठित माने जाते थे और देश के तमाम आर्थिक प्रयोगों से गुजरने के दौरान भी ये प्रतिष्ठित बने रहे। इस बीच देश की अर्थव्यवस्था सरकारी से बाजार आधारित हो गई। इस बीच तमाम राजनीतिक प्रयोग भी हुए (कांग्रेस से वाम और सामाजिक समूह आधारित दलों तक)। इसके अलावा सामाजिक प्रयोग भी हुए और महिलाएं मुख्यमंत्री और बड़े वित्तीय संस्थानों की प्रमुख बनीं। 
 
ये तमाम पेशे बीते 50 वर्ष में कई चरणों से गुजरे हैं। आजादी के वक्त कोई भी अच्छा चिकित्सक या इंजीनियर आगे की पढ़ाई के लिए इंगलैंड जाता, उसकी पढ़ाई का खर्चा परिवार उठाता और वापस लौटकर वह एक सुरक्षित और सम्मानित जीवन जीता। सन 1960 के दशक में देश में विश्वविद्यालय व्यवस्था का विस्तार हुआ, इन पेशों के स्नातक अमेरिका, इंगलैंड या ऑस्ट्रेलिया का रुख करने लगे जहां ऐसे पेशेवरों की कमी के चलते इनकी भारी मांग थी। अभी हाल तक इन पेशेवरों का जीवन काफी सुरक्षित नजर आ रहा था। उसके बाद क्या हुआ? 
 
भारत में चिकित्सकों पर हमले नए नहीं हैं। इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री के एक विश्लेषण के मुताबिक अमेरिका में चिकित्सकों के खिलाफ हिंसा के मामलों में 57 फीसदी आपातकालीन कर्मियों को हथियार से डराया गया। यूनाइटेड किंगडम में 52 फीसदी चिकित्सकों ने कहा कि उनके साथ किसी न किसी तरह की हिंसा हुई। चीन, इजरायल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी ऐसे ही आंकड़े सामने आए। अमेरिका के नॉर्थईस्टर्न विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर एलियट क्रॉज ने उन चुनौतियों का विश्लेषण किया जो आधुनिक पेशों के समक्ष आती हैं। गौरतलब है कि चिकित्सा, कानून, शिक्षण और इंजीनियरिंग आदि पेश कुल पेशों का 60 फीसदी हैं। उनका कहना है कि ये व्यापारिक गिल्ड हैं। वह कहते हैं कि मध्ययुगीन बुनकरों और सूत कातने वालों की गिल्ड की तरह ये पेशे और उनके एसोसिएशन अपने हुनर को एक रहस्यात्मकता प्रदान करते हैं जहां कॉर्पोरेट एकाधिकार कायम करने का आर्थिक लक्ष्य होता है वहां दबाव समूह के रूप में काम करते हैं। डेथ ऑफ द गिल्ड्स नामक अपनी पुस्तक में वह लिखते हैं कि हालांकि अतीत में ये पेशे ताकतवर रहे हैं लेकिन बीते दशक में उपभोक्ताओं की सक्रियता की बदौलत नीति निर्माताओं में इन पेशों के प्रति समानुभूति कम हुई है और किफायत और सेवाओं की गुणवत्ता पर जोर बढ़ा है। 
 
चिकित्सकों की हड़ताल को मीडिया में मिलने वाली कवरेज भी मरीजों के रिश्तेदारों द्वारा उन पर होने वाले हमलों तक सीमित रहती है। अधिवक्ताओं की हड़ताल में ध्यान पुलिस की कड़ी कार्रवाई पर तो शिक्षकों की हड़ताल में मीडिया का ध्यान उनकी स्थायी कर्मचारी बनने की चाह पर केंद्रित रहता है। मैं इसकी तुलना सन 1980 के दशक के बंबई से करना चाहता हूं जब अचानक कई दर्जन टेक्सटाइल मिलों में हड़ताल की खबरें सुर्खियों में आ गई थीं। उस वक्त ऐसा दर्शाया गया मानो ये हड़ताल कामगारों की उच्च वेतन की 'अतार्किक' मांग और 'आक्रामक' मजदूर नेता दत्ता सामंत जिम्मेदार थे। एक वर्ष के भीतर इनमें से 80 मिलें बंद हो गईं और 2.50 लाख कर्मचारी बेरोजगार हो गए। समय बीतने के साथ हम ज्यादा साफ देख पाए कि हुआ क्या है। नायलॉन और पॉलिएस्टर के आगमन ने बंबई की कॉटन का कपड़ा बनाने वाली मिलों को नुकसान में धकेल दिया। मिल मालिकों को अपने मजदूरों को वेतन देने तक के पैसे नहीं थे, बोनस और वेतन वृद्घि तो दूर की कौड़ी है। असली खलनायक दत्ता सामंत नहीं बल्कि कृत्रिम धागों की नई तकनीक थी। 
 
जिस प्रकार कृत्रिम धागों ने कपड़ों को सबकी पहुंच तक पहुंचाया, वहीं अब कृत्रिम मेधा में भारी भरकम निवेश हो रहा है। इससे ऐसे कई काम स्वचालित हो जाएंगे जिन्हें अभी पेशेवरों द्वारा अंजाम दिया जाता है। चिकित्सा क्षेत्र में कृत्रिम मेधा की तकनीक बीमारियों का पता लगाने में काफी सहायक सिद्घ हो रही है। उदाहरण के लिए लिम्फ नोड टिश्यू में स्तन कैंसर का पता लगाना। विधिक क्षेत्र में अनुबंध समीक्षा और वाद के नतीजे के अनुमान लगाने में यह काम आ रहा है। हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय ने पहले ही डिजिटल मानविकी में पाठ्यक्रम शुरू किया है। ऐसे में काफी संभव है कि चिकित्सा सुविधा, विधिक और शैक्षणिक सेवाएं जल्दी ही और अधिक सस्ती होंगी लेकिन यह इस पेशे के कई लोगों की आय को प्रभावित भी कर सकता है। 
 
शायद अब आवश्यकता आ गई है कि मशीन लर्निंग अलगोरिद्म को चिकित्सा महाविद्यालयों, विधिक और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम और यहां तक कि वाणिज्य और मानविकी क्षेत्र के स्नातक पाठ्यक्रम का भी हिस्सा बनाया जाए। इससे युवा भारतीय उभरते विश्व में अधिक विश्वास के साथ कदम रख सकेंगे। 
Keyword: strike, court, advocate,,
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