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राज्यों के बजट पर अधिक ध्यान देने की है जरूरत

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  March 12, 2020

हर वर्ष आम बजट पेश होने के बाद इसमें किए गए वित्तीय आवंटन और नीतिगत पहलों पर तमाम बहस और चर्चा होती है। यह वांछित भी है। गत माह प्रस्तुत वर्ष 2020-21 के बजट पर भी यह बात लागू होती है। विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा प्रस्तुत बजट पर अर्थशास्त्री और टीकाकार उतना ध्यान नहीं देते। यह दिक्कत की बात है। उदाहरण के लिए 2019 में 31 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का अनुमानित बजट 37 लाख करोड़ रुपये रहा। यह वर्ष के 27 लाख करोड़ रुपये के केंद्रीय बजट से 37 प्रतिशत अधिक था। राज्यों के बजट की ऐसी अनदेखी ठीक नहीं। यह अनदेखी शायद सरकारों के वार्षिक वित्तीय वक्तव्य जारी करने के तरीके से संबंधित है। सभी राज्य सरकारों के वित्तीय आवंटन संबंधी वक्तव्य में एकरूपता नहीं होतीं। ऐसे में इन वित्तीय वक्तव्यों का विश्लेषण कठिन और हताश करने वाला होता है। 

 
भारतीय रिजर्व बैंक सभी राज्यों के बजट का वार्षिक सार-संक्षेप पेश करता है लेकिन यह काफी देर से आता है। बीते कुछ सप्ताह में नौ राज्यों ने अपना सालाना बजट पेश किया। ये राज्य है बिहार, हरियाणा, केरल, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल। सन 2019-20 में इन राज्यों का सकल राज्य घरेलू उत्पाद करीब 93 लाख करोड़ रुपये रहा जो देश के जीडीपी का 45 प्रतिशत से ज्यादा है। इसके बावजूद इन बजट का समुचित विश्लेषण मीडिया में नहीं हुआ। इन राज्यों के वित्त मंत्रियों द्वारा बजट पेश करने के बाद अहम घोषणाओं को मीडिया में स्थान दिया गया। बहरहाल, पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च ने इन बजटों में शामिल प्रमुख वित्तीय आंकड़ों को एकीकृत ढंग से पेश करके अच्छा किया है। इससे इनका विश्लेषण आसान हुआ है। 
 
ये नौ बजट क्या दर्शाते हैं? चिंता की बात है कि राज्य बजट आंकड़ों की मजबूती और उनकी ईमानदारी भी केंद्रीय बजट के आंकड़ों की तरह कमजोर हुई है। 2019-20 के बजट के संशोधित अनुमानों की पिछले अनुमान से तुलना करने पर यह जाहिर हुआ। आम बजट में भी बजट अनुमान और संशोधित अनुमान का अंतर लगातार बढ़ रहा है। यदि इस वर्ष अब तक पेश नौ राज्यों के बजट को संकेत मानें तो यह बीमारी राज्यों में भी फैल गई है। उदाहरण के लिए 2019-20 में सभी नौ राज्यों का बजट संशोधित अनुमान पहले जताए गए अनुमानों से काफी भिन्न-भिन्न था। उत्तर प्रदेश में संशोधित अनुमान पूर्व में लगाए अनुमान से 5.8 फीसदी कम था। राजस्थान, पंजाब ओडिशा और हरियाणा में भी यही रुख देखने को मिला और वहां इसमें 3.5, 4.3, 2.9 और 2.1 फीसदी गिरावट आई। 
 
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जिन राज्यों में संशोधित अनुमान पहले से ज्यादा रहा उन सभी में एक साल में चुनाव होने थे। बिहार में विधानसभा चुनाव 2020 के अंत में होने हैं। वहां यह व्यय 8.6 फीसदी ज्यादा रहा। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में 2021 के आरंभ में विधानसभा चुनाव होना है उनका संशोधित अनुमान 4.3 और 2.2 फीसदी ज्यादा है। लेकिन केरल जहां 2021 में ही चुनाव होने हैं, वहां संशोधित अनुमान 11 फीसदी कम हुआ। अब तक पेश इन नौ राज्यों के बजट में दो अन्य रुझान ध्यान देने लायक रहे। संशोधित अनुमान में हर राज्य की प्राप्तियों में कमी आई। यह व्यापक तौर पर राज्य वस्तु एवं सेवा कर (एसजीएसटी) संग्रह में आई कमी की वजह से हो सकता है। परंतु राजस्व अनुमान को व्यवहार्य स्तर से अधिक बताना बजट अनुशासन को भंग कर सकता है और इससे राज्य की व्यय प्रतिबद्धताएं पूरी करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है।
 
बिहार में संशोधित अनुमान के अधीन प्राप्तियां बजट अनुमान से 14.3 फीसदी कम रहीं। केरल में यह 14 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 5.4 फीसदी, हरियाणा में 5.2 फीसदी, पंजाब में 4.4 फीसदी, राजस्थान में 4.3 फीसदी, ओडिशा में 2.8 फीसदी और तमिलनाडु में 2.7 फीसदी की कमी आई। पश्चिम बंगाल की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही और उसका संशोधित अनुमान बजट अनुमान की तुलना में 0.6 फीसदी ही कम रहा।  अधिकांश राज्यों के अपने राजस्व लक्ष्य की प्राप्ति से इतना दूर रहने के बावजूद सन 2020-21 में राज्यों के बजट काफी महत्त्वाकांक्षी हैं और इनमें अगले वर्ष की प्राप्तियों के लिए दो अंकों का लक्ष्य तय किया गया है। बिहार में 2020-21 में प्राप्तियों में 21.5 फीसदी का लक्ष्य तय किया गया है। केरल में 15.6 फीसदी, तमिलनाडु में 13.9 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 13 फीसदी, ओडिशा और पंजाब में 11 फीसदी तथा पश्चिम बंगाल में प्राप्तियों में 10 फीसदी इजाफा होने का अनुमान जताया गया है। हालांकि पंजाब और राजस्थान में यह रुझान उलटा है। पंजाब में अगले वर्ष प्राप्तियों में 2.2 फीसदी की कमी आने की बात है जबकि राजस्थान में यह महज 0.2 फीसदी बढ़ेगी।
 
दूसरा परेशान करने वाला रुझान यह है कि कई राज्यों पर कर्ज अदायगी का बोझ बढ़ता जा रहा है जो जीएसडीपी के 3 फीसदी के ऊपर है। पंजाब के  लिए यह जीएसडीपी का 10.8 फीसदी, केरल के लिए 7.13 फीसदी, पश्चिम बंगाल के लिए 6.28 फीसदी, हरियाणा के लिए 4.48 फीसदी, राजस्थान के लिए 4.29 फीसदी तथा उत्तर प्रदेश के लिए 3.55 फीसदी के स्तर पर है। केवल तमिलनाडु ने एसजीडीपी के 2.67 फीसदी स्तर के साथ ऋण अदायगी को नियंत्रण में रखा है। वर्ष 2019-20 में केंद्र की ब्याज देनदारी जीडीपी के 3 फीसदी के बराबर थी। यह संभव है कि शेष 22 सरकारों (राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश) द्वारा आने वाले दिनों में पेश किया जाने वाला बजट एक अलग तस्वीर पेश कर सकता है। परंतु नौ राज्यों के बजट में देखने को मिल रहे रुझानों की भी अनदेखी नहीं की जा सकती है। संक्षेप में कहें तो राज्यों के बजट पर कहीं अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
Keyword: budget, states, economy, RBI,
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