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बड़े बैंकों का भविष्य करदाताओं के सहारे

टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  March 11, 2020

निजी क्षेत्र के येस बैंक के पतन के बाद एक प्रश्न कई लोगों को सोचने पर विवश कर रहा है। वह प्रश्न यह है कि अगर वित्तीय क्षेत्र की स्थिरता केवल एक बैंक  के धराशायी होने के कारण अस्त-व्यस्त हो जाती है तो करदाताओं को अंशधारकों को बचाने के लिए क्यों आगे आना चाहिए?

यह प्रश्न बेहद महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अब लगभग सभी देशों में यह चलन आम हो गया है। इसमें कोई शक नहीं कि यह स्पष्टतया अनुचित है, लेकिन कई लोगों को लगता है कि नैतिकता के पैमाने पर खरा नहीं उतरने के बावजूद इस तरीके को बढ़ावा देने में कोई हर्ज नहीं है। इस पूरी स्थिति को बीमा के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है जब बीमा धारकों की बीमा लेने की चाह इसलिए बढ़ जाती है, क्योंकि उन्हें पता होता है कि किसी अनहोनी की स्थिति में भुगतान किसी दूसरे पक्ष को करना है। इस तरह, किसी योजना को लेकर परंपरागत तौर पर दी जाने वाली चेतावनी का भी कोई मतलब नहीं रह जाता है। हालांकि इन तमाम बातों के बावजूद हम किसी बैंक को बचाने के लिए सारा दबाव करदाताओं पर डाल देते हैं। 

किसी भारी भरकम बैंक को बचाने के चक्कर में करदाताओं पर दबाव डालने का चलन अब पूरी दुनिया में खुले दिल से स्वीकार किया जा रहा है। इस पूरे संदर्भ का तार 1907 के वित्तीय संकट से जुड़ा है। उस समय जे पी मॉर्गन ने कहा था कि बैंक विशेष कारोबारी संस्थान होते हैं, इसलिए उनके साथ अलग व्यवहार की जरूरत होती है। उन्होंने अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। फेडरल रिजर्व का उद्देश्य अमेरिकी बैंक के अंशधारकों को बचाना था, लेकिन इससे भी बढ़कर इसका लक्ष्य किसानों के हितों की रक्षा करना था। यह पूरी कहानी बड़ी दिलचस्प है।  

वित्तीय संकट की जमीन 1905 से ही तैयार हो रही थी। 1907 में यह सामान्य घटना थी और निकरबॉकर ट्रस्ट कंपनी इस धारणा की चपेट में आ गई। उसी समय कई अन्य इकाइयों का भी पतन हो गया और इन घटनाओं ने एक बड़े संकट का रूप ले लिया। हालांकि उस समय एक अंतिम अस्त्र या यूं कहें कि संकट मोचक के रूप में कोई शीर्ष इकाई मौजूद नहीं थी। इतना ही नहीं, ये कंपनियां आंतरिक तौर पर ऋण और कोलैटरल बॉन्ड के जरिये एक दूसरे से विचित्र रूप से जुड़ी हुई थीं। 

लिहाजा, कई 'धनकुबेर' जे पी मॉर्गन के पास गए और वे सभी समस्या का समाधान खोजने में जुट गए। आखिरकार, उन्होंने निर्णय लिया कि जो अपना कर्ज अदा नहीं कर पाए हैं, उन्हें रकम दिए जाने की जरूरत है, क्योंकि अगर वे साथ नहीं आए तो उनका साथ देने वाला कोई नहीं होगा और एक-एक कर सभी बरबाद हो जाएंगे। अमेरिका के तत्कालीन वित्त मंत्री इस उद्देश्य के लिए सरकारी धन का इस्तेमाल करने के लिए तैयार थे, लेकिन राजनीतिक विरोध के कारण बात आगे नहीं बढ़ सकी। 

हालांकि इस बात पर सहमति जरूर बनी कि बैंक ऑफ इंगलैंड (बीओई) के समतुल्य संस्था स्थापित करने की जरूरत है। एक ताकतवर संकट मोचन बैंक  स्थापित करने की मांग बढ़ती गई और अमेरिकी संसद कांग्रेस ने अपने इस प्रस्ताव के समर्थकों की सलाह पर राष्ट्रीय मौद्रिक आयोग (नैशनल मॉनिटरी कमीशन) की स्थापना की। 

इन धनकुबेरों ने नवंबर 1910 में अपनी एक बैठक बुलाई। इसमें कई लोगों ने भविष्य में वित्तीय संकट से बचने के उपायों पर चर्चा की। उन्होंने फेडरल रिजर्व की स्थापना की सिफारिश की और अंतत: अमेरिका के केंद्रीय बैंक की स्थापना का रास्ता साफ हो गया और यह 1913 में अस्तित्व में आ गया। यह बिल्कुल बैंक ऑफ इंगलैंड की तर्ज पर स्थापित हुआ था। 12 क्षेत्रीय बैंक और फेडरल रिजर्व ने नियम-शर्तें तय कीं, जिन पर 1915 से अमल शुरू हो गया। फेडरल रिजर्व को मुद्रा प्रबंधन का उत्तरदायित्व मिला और यह अकेले तय किया करता था कि कितनी मुद्रा छापने की जरूरत है। इसका मुख्य कार्य सरकारी बॉन्ड की खरीद-बिक्री से ब्याज दर नियंत्रित करना था। बाद में यह संकट मोचक भी बन गया और वित्तीय प्रणाली की परिस्थितियां देखते हुए आवश्यकता अनुसार मुद्राएं छापता रहा।

1930 से विभिन्न देशों के केंद्रीय बैंकों स्विटजरलैंड के शहर बेसल में एक अलग संस्था या दूसरे शब्दों में कहें तो एक निजी क्लब के माध्यम से एक दूसरे जुड़े हैं। इस क्लब को बैंक ऑफ इंटरनैशनल सेटलमेंट्स (बीआईएस) के नाम से जाना जाता है। बीआईएस की वेबसाइट में कहा गया है,'बीआईएस का मकसद दुनिया के केंद्रीय बैंकों को उनकी मौद्रिक नीति एवं वित्तीय स्थायित्व में मदद करना है और इन खंडों में अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना और केंद्रीय बैंकों के लिए एक बैंक के तौर पर कार्य करना है।' बीआईएस कहता है कि किसी अप्रत्याशित नुकसान से निपटने के लिए किसी बैंक के पास पर्याप्त रकम होनी चाहिए।

अब हालात ये हैं कि बड़े बैंक धराशायी नहीं होते हैं। इन्हें या तो भारी भरकम नकदी देकर उबार लिया जाता है या किसी मजबूत बैंक के साथ इनका विलय कर दिया जाता है। इससे पहले 1974 में एक बड़ा बैंक हैनओवर बैंक धराशायी हुआ था और भारत की बात करें तो 1961 में पलाई बैंक का कारोबार ठप पड़ गया था। तब से करदाताओं की रकम का इस्तेमाल बैंकों को उबारने के लिए किया जा रहा है।
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