बिजनेस स्टैंडर्ड - कोरोनावायरस के आर्थिक सबक
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कोरोनावायरस के आर्थिक सबक

रथिन रॉय /  March 11, 2020

चीन से उपजी कोरोनावायरस की महामारी न तो अप्रत्याशित है और न ही दु:साध्य। परंतु यह बीमारी वैश्विक आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करने वाली है और इसमें अर्थशास्त्रियों के लिए भी अहम सबक छिपे हुए हैं।

वैश्वीकरण ऐसे संरचनात्मक जोखिम उत्पन्न करता है जिनको विश्लेषणात्मक ढंग से पहचानना और उसे हल करना होगा: वैश्वीकरण तुलनात्मक लाभ के सिद्धांत के विजयघोष का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसा इसलिए क्योंकि तकनीक और नवाचार ने वे गतिरोध कम किए हैं जो उत्पादन को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी जगहों पर स्थानांतरित करने की राह मे बाधा बनते थे। इससे उत्पादन की लागत कम हुई और वैश्विक मांग में इजाफा हुआ। चीन अपने व्यापक आकार और काम के पैमाने के कारण इस ढांचागत बदलाव का सबसे बड़ा वाहक बना। चीन में कोरोनावायरस के प्रसार ने यह दिखा दिया है कि इससे ऐसे गंभीर ढांचागत जोखिम जुड़े हुए हैं जो तुलनात्मक लाभ केसिद्धांत को उलटपुलट कर सकते हैं।

वृहद आर्थिक हस्तक्षेप इस जोखिम से निपटने में काम नहीं आएंगे: फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में 50 आधार अंक की कटौती करके तत्काल कदम उठाया। परंतु इससे अमेरिकी शेयर बाजार महज 15 मिनट के लिए ही शांत रहे। क्योंकि उन्हें पता चल गया कि ऐसी कटौती पूंजी की अनिवार्य तौर पर सस्ता करती है और मुद्रास्फीति को लेकर सहनशीलता बढ़ाती है। परंतु इससे वैश्विक आपूर्ति शृंखला के भंग होने की ढांचागत समस्या हल नहीं होती।

इस शृंखला के भंग होने का अर्थ यह है कि बढ़ा हुआ उपभोक्ता व्यय आपूर्ति से मेल नहीं खाएगा। इससे मुद्रास्फीति प्रभावित होगी। वैकल्पिक आपूर्ति शृंखला तैयार करने के लिए घरेलू निवेश में वक्त लगेगा और यह केवल सस्ती पूंजी लागत पर प्रतिक्रिया देगा, बशर्ते कि कारोबारियों को यह यकीन हो कि दरों में कटौती स्थायी है और वैकल्पिक आपूर्ति शृंखला के चीन की आपूर्ति शृंखला से महंगा होने के कारण समेकित मांग में कमी नहीं आती। भारत के एक ट्रांसफॉर्मर निर्माता से हुई मेरी बातचीत से भी इस बात की पुष्टि हुई। उनकी मुनाफे में चल रही कंपनी अभी चीन से जिस कच्चे माल का आयात करती है, वह उसका उत्पादन दूसरी जगह स्थानांतरित नहीं करेगी। यदि उसे दूसरी जगह स्थानांतरित किया जाता है तो सस्ती पूंजी की मदद से ऐसा करने के बावजूद कंपनी को अपना उत्पाद अपेक्षाकृत महंगी कीमत पर बेचना होगा। मौजूदा मांग स्तर पर ऐसा करना ठीक नहीं होगा। ऐसे में समझदारी यही होगी कि प्रतीक्षा की जाए और इस बीच उत्पादन कम किया जाए।

आपूर्ति शृंखला को विकेंद्रीकृत करना: आर्थिक गतिविधियां पारंपरिक तौर पर एकीकृत उत्पादन क्लस्टर में काम करती हैं क्योंकि लॉजिस्टिक्स की लागत अधिक रहती है। प्रतिस्पर्धा कच्चे माल के लिए वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता मुहैया कराती है। ऐसे में आपूर्ति शृंखला के विकेंद्रीकरण का रुख रखती है और वे तमाम विविधतापूर्ण आपूर्तिकर्ताओं के साथ काम करती हैं। वैश्वीकरण और आपूर्ति शृंखला एकीकरण का अर्थ यह है केवल सबसे किफायती स्थान ही बचेगा। उस जगह पर भी प्रतिस्पर्धा होगी लेकिन जगह अपने आप में एक प्रभावी एकाधिकार तैयार करती है। यदि ऐसे स्थानिक एकाधिकार को जोखिम उत्पन्न हो तो विकेंद्रीकृत आपूर्ति शृंखलाएं प्रतिस्पर्धी हो जाती हैं। कोरोनावायरस महामारी निवेश संबंधी निर्णयों को जिस तरह प्रभावित कर रहा है उससे यह स्पष्ट हो गया है।

सतर्कतापूर्ण इन्वेंटरी प्रबंधन: सस्ते लॉजिस्टिक्स के दौर के पहले इन्वेंटरी प्रबंधन में पूरा ध्यान यह सुनिश्चित करने में लगाया जाता था कि किसी फर्म को आपूर्ति शृंखला की विसंगतियों की वजह से बाजार हिस्सेदारी में नुकसान का सामना न करना पड़े। परंतु लॉजिस्टिक्स संबंधी नवाचार और सूचना तकनीक की क्रांति ने इन्वेंटरी को कम करने को आकर्षक बना दिया है। यह रुझान पलट सकता है क्योंकि कंपनियों को यह लगने लगा है कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में विसंगतियों का जोखिम बढ़ रहा है। यदि आपूर्ति शृंखला की बाधा के चलते जैगुआर लैंड रोवर को सूटकेस में भरकर कार के कलपुर्जे लाने पड़ें तो इन्वेंटरी पर नए सिरे से विचार करना आवश्यक है। 

बहुपक्षीयता के खात्मे की स्थिति को पलटना होगा: यह विडंबना ही है कि वैश्वीकरण के साथ ही उसके सबसे बड़े सुरक्षा ढांचे का पतन हुआ। यह था बहुपक्षीय समन्वित कदम। यद्यपि एचआईवी एड्स संकट से निपटने में ऐेसे बहुपक्षीय समन्वित कदमों को बहुत सफलता मिली थी और तेल कीमतों के कार्टलीकरण तथा ओजोन छिद्र जैसी चुनौतियों से निपटने में भी इसे मदद मिली थी लेकिन बीते तीन दशक के दौरान वास्तविक वैश्विक चुनौतियों से निपटने की उसकी क्षमता कम होती गई। वह व्यापार और वित्तीय नियमन पर केंद्रित हो गया। कोरोनावायरस की बीमारी इस बात को भी रेखांकित करती है कि हमें बहुपक्षीय तालमेल के बारे में अधिक सक्रिय होकर सोचना होगा। खासतौर पर तब जबकियह आपूर्ति शृंखला प्रबंधन से संबद्घ हो लेकिन स्वास्थ्य आपात स्थितियों और जलवायु अनिश्चितताओं तक सीमित न हो।

घरेलू मांग का महत्त्व और अल्पव्ययी लॉजिस्टिक्स: यह विकसित और विकासशील दोनों देशों के लिए सबसे बड़ा सबक है। औषधि आपूर्ति शृंखला में भारत जेनेरिक दवाएं बनाता है और उन्हें यूरोप को निर्यात करता है। वह कच्चा माल चीन से आयात करता है। यूरोप की जेनेरिक दवाओं में 26 फीसदी भारत की होती हैं जबकि अमेरिका में उसकी हिस्सेदारी 24 प्रतिशत है। कोरोनावायरस हमले के बाद भारत की दवा उत्पादन क्षमता के लिए गतिरोध उत्पन्न हो गया है। इसके चलते जेनेरिक दवाओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया गया। इससे विकसित विश्व में औषधि आपूर्ति का संकट उत्पन्न हुआ। 

हमें वृद्घि में इजाफा करने के क्रम में लॉजिस्टिक्स की भूमिका पर पुनर्विचार करना होगा। उसके बाद वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा होने की कीमत और लाभ पर। इसका अर्थ अंतर्मुर्खी होना नहीं है बल्कि यह स्वीकार करना है कि हम लॉजिस्टिक्स में मितव्ययी हैं। ऐसी लॉजिस्टिक्स शृंखला विकेंद्रीकृत आपूर्ति को बढ़ावा देती है और विसंगति के जोखिम को कम करती है।

भारत जैसे बड़े उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों को दो बातों पर विचार करना होगा। पहला, ऐसी वृद्घि नीति अपनानी होगी जो व्यापक मांग पर आधारित हो। यह नीति लॉजिस्टिक्स आधारित निर्यात संबंधी वृद्घि से मजबूत होती है। दूसरा, इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि कैसे कम लॉजिस्टिक्स के साथ बेहतर उत्पादन किया जाए। ऐसा मौजूदा विसंगतियों के दौर में वैश्विक आपूर्ति शृंखला के साथ समायोजन के लिए जरूरी है। वस्तुओं, कच्चे माल और लोगों की कम गतिविधियों के साथ स्थानीय निर्माण ज्यादा मजबूत वृद्घि की राह दिखाता है।  

(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी के निदेशक हैं। लेख में विचार निजी हैं)
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