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कमी फिर उजागर

संपादकीय /  March 11, 2020

ज्योतिरादित्य सिंधिया (49) के ताजा कदम के बाद कांग्रेस नेतृत्व को जाग जाना चाहिए। उनके कांग्रेस छोडऩे को लेकर किसी को चकित नहीं होना चाहिए। सिंधिया कांग्रेस कार्य समिति के निर्णयों के प्रति खुलकर अपनी असहमति जाहिर कर रहे थे। पिछले कुछ समय से उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार की कई नीतियों की सराहना करनी भी शुरू कर दी थी। सन 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की भारी पराजय के बाद अध्यक्ष पद से राहुल गांधी के इस्तीफे का लाभ उठाने के बजाय कांग्रेस के बूढ़े होते नेतृत्व ने 73 वर्षीय सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बना दिया। ऐसा लगता है कि युवा नेताओं के पार्टी से बाहर जाने को लेकर शीर्ष नेताओं में कोई चिंता ही नहीं है।

पार्टी की झारखंड इकाई के अध्यक्ष अजय कुमार (57) गत वर्ष अगस्त में सोनिया गांधी की नियुक्ति के बाद पार्टी छोडऩे वाले पहले बड़े नेता थे। उन्होंने आम आदमी पार्टी की सदस्यता ली। इसके बाद सिंधिया के रिश्तेदार प्रद्योत देव बर्मन (41) ने पार्टी की त्रिपुरा इकाई की अध्यक्षता से इस्तीफा दिया और फिर पार्टी आला कमान से मतभेद के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी। सितंबर में युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और हरियाणा इकाई के अध्यक्ष अशोक तंवर (44) ने विधानसभा चुनाव से पहले गहन आंतरिक मतभेद के चलते पार्टी छोड़ दी। 

सिंधिया की राजनीतिक वंशावली के कारण उन्हें पार्टी में बतौर राजनीतिज्ञ उनके कद से ज्यादा तवज्जो मिली। उन्होंने नवंबर 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी को कम अंतर से मिली जीत के बाद ही नाखुशी जाहिर करनी शुरू कर दी थी। वह गुना लोकसभा सीट अपने एक पूर्व सहयोगी से हार गए थे जो भाजपा में चला गया था। पार्टी के वरिष्ठï नेता दिग्विजिय सिंह और मुख्यमंत्री कमल नाथ ने उन्हें हाशिये पर धकेल रखा था। नाथ उन्हें उपमुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार नहीं कर रहे थे और राज्य सभा की दो सीटें दिग्विजय सिंह और प्रियंका गांधी (48) के लिए आरक्षित किए जाने की खबर थी। जानकारी यही है कि भाजपा ने सिंधिया को राज्य सभा की सदस्यता के साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह देने का वादा किया है। सिंधिया के समर्थन में इतने विधायक हैं कि मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार गिर भी सकती है। 

पार्टी के युवा नेताओं की यह असहमति कांग्रेस नेतृत्व के वैचारिक दिवालियेपन को भी दर्शाती है। पार्टी मोदी के बहुसंख्यकवादी लोकलुभावनवाद का मजबूत और विश्वसनीय जवाब नहीं दे सकी है। अनुच्छेद 370 पर उसकी प्रतिक्रिया गलत रही और नागरिकता संशोधन अधिनियम और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) जैसे विवादित विषय पर भी। देव वर्मन, जितिन प्रसाद (46), सिंधिया और दीपेंद्र हुड्डा (42) समेत कई युवा नेताओं ने एनआरसी या अनुच्छेद 370 समाप्त करने का समर्थन किया। मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा (43) ने टैक्सस में आयोजित 'हाउडी मोदी' कार्यक्रम पर प्रधानमंत्री मोदी को बधाई दी थी। इससे पता चलता है कि मोदी युवा राजनेताओं में किस कदर लोकप्रिय हैं।

कांग्रेस कार्य समिति ने इन युवा नेताओं में से किसी से बात करने का प्रयास नहीं किया। राहुल गांधी के पास पिछले कुछ महीनों में इतना वक्त नहीं था कि वह सिंधिया से एक बार मुलाकात कर लेते। इससे यह संदेह उत्पन्न होता है कि कहीं पार्टी इन नेताओं की राह इसलिए तो नहीं रोक रही कि वे कहीं राहुल गांधी के लिए चुनौती न बन जाएं। गौरतलब है कि बतौर राजनेता राहुल गांधी ने भी खुद को अच्छी तरह साबित नहीं किया है। वह और उनकी बहिन अब कांग्रेस कार्य समिति के सबसे युवा सदस्य हैं। कार्य समिति की औसत उम्र 70 वर्ष है। कुल मिलाकर पार्टी खुद को खत्म करने की राह पर है। वह भी ऐसे समय में जो भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद अहम है।
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