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सॉवरिन वेल्थ फंड घटा सकते हैं भारत में निवेश

ऐश्ली कुटिन्हो / मुंबई March 11, 2020

अमीर तेल उत्पादक देशों द्वारा सॉवरिन वेल्थ फंडों (एसडब्ल्यूएफ) के जरिये भारत में किया जाने वाला निवेश तेल कीमतों में गिरावट की वजह से प्रभावित हो सकता है। सऊदी अरब, कुवैत, नॉर्वे और कनाडा जैसे देशों को तेल कीमतों में आई ताजा गिरावट का नुकसान उठाना पड़ सकता है। ये देश भारत में एसडब्ल्यूएफ के जरिये निवेश करते हैं। एनएसडीएल के आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय इक्विटी में सॉवरिन वेल्थ फंडों के तहत आने वाली परिसंपत्तियोंं का आकार 1.82 लाख करोड़ रुपये का है। 

तेल कीमतों में बड़ी गिरावट से इस ईंधन पर जोखिम की धारणा को बढ़ावा मिल सकता है जिससे एफपीआई अपना निवेश निकाल सकते हैं। एफपीआई ने पिछले 12 सत्रों में लगभग 33,000 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर बेचे और एसडब्ल्यूएफ की बिकवाली से हालात और ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। एसडब्ल्यूएफ, मुख्य तौर पर दीर्घावधि निवेशक होते हैं। 

विदेशी ब्रोकरेज फर्म बोफा सिक्योरिटीज ने बुधवार को अपने वित्त वर्ष 2021 के एफपीआई निवेश प्रवाह के अनुमान में 5 अरब डॉलर तक की कमी की। ब्रोकरेज फर्म ने भारत के लिए वित्त वर्ष 2021 की वृद्घि का अनुमान घटाकर 5.4 प्रतिशत कर दिया है, वहीं वैश्विक मंदी की स्थिति में इसे 4.4 प्रतिशत किया गया है। विश्लेषकों के अनुसार, तेल कीमतों में गिरावट का कई प्रमुख तेल उत्पादक या निर्यातक देशों के आय स्तरों और वित्तीय स्थिति पर प्रभाव पड़ सकता है। खपत भी प्रभावित हो सकती है जिससे भारत समेत अन्य देशों से आयात प्रभावित होगा। तेल कीमतों में लंबे समय तक मंदी की स्थिति में कुछ देशों में सामाजिक अशांति की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। 

डाल्टन कैपिटल एडवाइजर्स के निदेशक यूआर भट ने कहा, 'दुनियाभर में सरकारों को विदेशी निवेशकों के बीच भरोसा लौटाने के लिए मौद्रिक और राजकोषीय मोर्चे पर कदम उठाने की जरूरत होगी।' 

एचडीएफसी सिक्योरिटीज में रिटेल रिसर्च के प्रमुख दीपक जसानी का कहना है कि जहां तेल कीमतों में गिरावट से भारत की वृहद स्थिति (राजकोषीय स्थिति, मुद्रास्फीति, मुद्रा और विदेशी मुद्रा भंडार) सुधारने में मदद मिल सकती है, वहीं यदि वैश्विक वृद्घि की रफ्तार प्रभावित होती है तो इससे निर्यात मांग पर दबाव पड़ सकता है। उन्होंने कहा, 'सॉवरिन वेल्थ फंडों से भारत में ताजा निवेश प्रवाह घट सकता है। हम तेल कीमतों में लंबे समय तक मंदी की स्थिति में बिकवाली देख सकते हैं।' उनका कहना है कि इस मंदी से पश्चिम एशिया के देश, रूस, नॉर्वे, कनाडा और अमेरिका भी प्रभावित हो सकता है।

यूरोप और अमेरिका में कोविड-19 की महामारी से पैदा हुईं मांग वृद्घि की चिंताओं की वजह से तेल कीमतों पर दबाव पड़ा है। जेपी मॉर्गन ऐसेट मैनेजमेंट की एक रिपोर्ट में कहा गया है, '30-40 डॉलर प्रति बैरल के मौजूदा स्तर का मतलब होगा दुनियाभर में कई ऊंची लागत वाले उत्पादकों के लिए परिचालन नुकसान उठाना, जिससे आपूर्ति में कमी आएगी। हालांकि आखिरकार कीमतें अधिक टिकाऊ स्तर की ओर वापस आएंगी। फिर भी यह झटका बाजार के लिए अल्पावधि में जोखिम का कारण बना रह सकता है।' 

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