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तेल में फिसलन से दुनिया भर में हड़कंप

ज्योति मुकुल, पुनीत वाधवा और शाइन जैकब / नई दिल्ली 03 09, 2020

कच्चे तेल की आपूर्ति में कटौती को लेकर सऊदी अरब और रूस के बीच तनातनी से अंतरराष्ट्रीय बाजार में आज तेल कीमतों में पिछले तीन दशक में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। तेल के दाम घटने से नरमी की मार झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है और सब्सिडी बिल को नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है। लेकिन क्रूड की कीमतों में गिरावट से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

कारोबार के दौरान ब्रेंट क्रूड के दाम करीब 30 फीसदी फिसलकर 31 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया था लेकिन बाद में यह थोड़ा सुधरा और 34.93 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। वेस्ट टैक्सास इंटरमीडिएट की कीमत 23.18 फीसदी घटकर 31.71 डॉलर प्रति बैरल रहा। पेट्रोलियम उत्पादों के दाम घटने से भारतीय ग्राहकों को फायदा मिल सकता है लेकिन यह बहुत हद तक सरकार पर निर्भर करेगा कि वह इस मौके का लाभ अपना राजस्व बढ़ाने में करती है या नहीं। पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क बढ़ाने से ग्राहकों को इस कमी का पूरा लाभ नहीं मिल पाएगा।

सऊदी अरब ने तेल के दाम में रिकॉर्ड कटौती करने और उत्पादन बढ़ाने की पेशकश कर एक तरह से तेल उत्पादक देशों के बीच कीमत को लेकर जंग छेड़ दी है। सऊदी अरब चाहता था कि कोरोना संकट के कारण कीमतों को स्थिर करने के लिए रूस उत्पादन में कटौती पर सहमति जताए। तेल उत्पादक देशों के संगठन ओपेक ने 5 मार्च को रूस से कहा था कि प्रतिदिन 15 करोड़ बैरल उत्पादन घटाने में वह भी शामिल हो। लेकिन रूस इस पर राजी नहीं हुआ। 

गोल्डमैन सैक्स ने 2020 की दूसरी और तीसरी तिमाही के लिए ब्रेंट क्रूड के दाम के अनुमान को घटाकर 30 डॉलर प्रति बैरल कर दिया है, साथ ही कहा कि यह 20 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को भी छू सकता है। सऊदी अरब ने एशिया के लिए अप्रैल आपूर्ति वाले तेल के दाम में 4 से 6 डॉलर प्रति बैरल की कटौती की है, वहीं अमेरिका के लिए 7 डॉलर प्रति बैरल तक दाम घटाने की घोषणा की है। सिंगापुर की वैश्विक तेल बाजार विश्लेषक वंदा इनसाइट्स की संस्थापक वंदना हरि ने कहा कि विश्लेषकों का कहना है कि 

ओपेक और गैर-ओपेक अलायंस की विफलता से तेल बाजार पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और आगे चुनौतियां और बढ़ सकती है, जिसका अभी अनुमान नहीं लगाया जा सकता। कोरोना के कारण तेल की मांग प्रभावित हुई है और नए हालात से पिछले हफ्ते अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा दर में की गई कटौती का फायदा नहीं मिलेगा। अंतरराष्ट्रीय एनर्जी एजेंसी ने अपने फरवरी के अनुमान को काफी घटा दिया है। पेरिस की इस एजेंसी ने कहा कि 2020 में वैश्विक तेल की मांग 9.99 करोड़ बैरल प्रतिदिन रह सकती है, जो 2019 की तुलना में करीब 90,000 बैरल कम है। पहले उसने तेल की मांग 825,000 बैरल प्रतिदिन बढऩे का अनुमान लगाया था।

हरि ने कहा, 'अगर कोरोना संकट के बीच तेल की कीमतों को लेकर जंग छिड़ती है तो ब्रेंट 30 डॉलर प्रति बैरल से नीचे जा सकता है।' उन्होंने कहा कि इसके स्थिर होने से पहले यह 20 डॉलर प्रति बैरल तक फिसल सकता है।चीन में कोरोना के नए मामले कम हुए हैं लेकिन दुनिया के दूसरे देशों में इसका प्रसार बढ़ा है और इससे तेल की मांग पर असर पडऩे की आशंका है, जिसके बारे में आने वाले समय में ओपेक विचार कर सकता है। विश्लेषकों का कहना है कि कमजोर मांग के कारण तेल में बुनियादी तौर पर फिसलन बनी हुई है और बाजार में तेल की आपूर्ति ज्यादा है। एसऐंडपी ग्लोबल प्लैट्स एनालिटिक्स के अनुसार चीन में तेल की मांग 2020 में 170,000 डॉलर प्रति बैरल बढऩे की उम्मीद है, जो मूल अनुमान का महज 20 फीसदी है।

आईईए के कार्यकारी निदेशक फातेह बिरोल ने कहा, 'कोरोनावायरस संकट से कोयला, गैस और अक्षय ऊर्जा सहित पूरे ऊर्जा बाजार पर असर पड़ रहा है लेकिन तेल बाजार पर इसका असर ज्यादा गंभीर है क्योंकि लोगों और सामान की आवाजाही ठप हो रही है। इसकी वजह से परिवहन के लिए ईंधन की मांग पर व्यापक असर पड़ा है।' 

बिरोल ने कहा, 'दुनिया में सबसे अधिक ऊर्जा की खपत करने वाले चीन की पिछले साल कुल वैश्विक तेल मांग में 80 फीसदी से ज्यादा योगदान रहा था। ऐसे मेंचीन में कोरोना संकट का असर वैश्विक ऊर्जा और तेल बाजार पर व्यापक तौर पर पड़ेगा।'

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