बिजनेस स्टैंडर्ड - तेल कीमतों में गिरावट
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तेल कीमतों में गिरावट

संपादकीय /  March 09, 2020

सोमवार को कारोबार के शुरुआती घंटों में ही ब्रेंट क्रूड की कीमतें 30 प्रतिशत तक गिर गईं। यानी इस वर्ष के आरंभ से अब तक इनमें 45 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है। तेल कीमतें निकट भविष्य में कमजोर बनी रहेंगी और विश्लेषकों का अनुमान है कि ब्रेंट क्रूड की कीमतें मौजूदा 35 डॉलर प्रति बैरल से घटकर 20 डॉलर प्रति बैरल तक आ सकती हैं।

गिरावट की तात्कालिक वजह तेल निर्यातक देशों के समूह (ओपेक) और रूस के बीच उत्पादन कटौती को लेकर सहमति नहीं बन पाना है। परिणामस्वरूप सऊदी अरब ने कीमतों में कटौती कर दी और वह उत्पादन बढ़ाने वाला है। संभव है कि रूस और अन्य तेल उत्पादक भी उत्पादन बढ़ाएं। बहरहाल बुनियादी रूप से देखें तो उत्पादन कम करने की आवश्यकता इसलिए पड़ी क्योंकि दुनिया भर में मांग कमजोर है। संभव है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को मांग और आपूर्ति का झटका कोरोनावायरस पर नियंत्रण के बहुत बाद तक रहेगा।

यह गिरावट सभी तेल उत्पादक देशों को प्रभावित करेगी। अमेरिका कच्चे तेल का सबसे बड़ा उत्पादक है। यह न केवल निवेश को प्रभावित करेगा बल्कि यह ऋण की परिस्थितियों को भी सख्त बना सकता है। इसके व्यापक निहितार्थ हो सकते हैं। पश्चिम एशिया के देश तेल पर अत्यधिक निर्भर हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक सऊदी अरब को अपने बजट को संतुलित रखने के लिए तेल कीमतों को 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रखना होगा। चूंकि तेल कीमतें उस स्तर से काफी नीचे हैं इसलिए उसे व्यय में कटौती करनी होगी। इससे न केवल वैश्विक मांग प्रभावित होगी बल्कि भारत जैसे देशों में धन प्रेषण भी प्रभावित होगा। कच्चे तेल की कम कीमत से उपभोक्ता लाभान्वित होते हैं लेकिन वृद्घि पर इसका प्रभाव सीमित होता है क्योंकि व्यवस्था में व्यापक अनिश्चितता उत्पन्न होती है।

कच्चे तेल का बड़ा आयातक होने के नाते भारत को तेल कीमतों से लाभ होगा। वृहद स्तर पर शुद्घ निर्यात के मामले में बेहतर स्थिति वृद्घि में सहायक होगी। चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में भी सकल घरेलू उत्पाद में वृद्घि का बड़ा हिस्सा शुद्घ निर्यात और सरकारी व्यय से संचालित है। बहरहाल, कीमतों में गिरावट का नीतिगत प्रबंधन सावधानीपूर्वक करना होगा। सरकार को इस अवसर का लाभ उठाकर अपनी वित्तीय स्थिति दुरुस्त करनी चाहिए जैसा उसने 2014 में किया था।

कमजोर आर्थिक माहौल को देखते हुए उसकी वित्तीय स्थिति अगले वर्ष भी दबाव में रह सकती है। ऐसे में पेट्रोलियम उत्पादों पर उच्च कर से घाटे को नियंत्रित किया जा सकता है। बहरहाल, सरकार को समझना होगा कि यह लाभ अस्थायी है। कम तेल कीमतें और वैश्विक बाजार की अनिश्चितता मुद्रा बाजार को भी अस्थिर कर सकती है और भारी मात्रा में पूंजी बाहर जा सकती है। इसके अलावा शोध यह भी दर्शाता है कि पिछली बार चालू खाते का घाटा कम होने से रुपया मजबूत हुआ था। इसका असर निर्यात पर पड़ा था। ऐसे में यह अहम है कि भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रा का प्रबंधन करे ताकि वैसे हालात न बनें।

सरकार तेल कीमतों में सुधार की शुरुआत भी कर सकती है और तेल विपणन कंपनियों से कह सकती है कि वे मूल्य निर्धारण का तरीका ट्रेड पैरिटी प्राइस (टीपीपी) से बदलकर बाजार की वास्तविकता के अनुरूप करें। टीपीपी अंतरराष्ट्रीय बाजार में उत्पाद कीमतों पर आधारित है। इसका निर्धारण यह मानकर किया जाता है कि पेट्रोल और डीजल का 80 फीसदी हिस्सा आयात किया जाता है और 20 फीसदी निर्यात किया जाता है। अब वक्त आ गया है कि तेल विपणन कंपनियां अपने उत्पादों का मूल्य स्वतंत्र होकर तय करें और पारदर्शिता वाले बाजार सिद्घांतों का अनुसरण करें।
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