बिजनेस स्टैंडर्ड - राणा कपूर: किसी को नहीं कहा 'ना'
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राणा कपूर: किसी को नहीं कहा 'ना'

सचिन मामबटा / मुंबई March 08, 2020

चश्मा और आम कपड़े पहने राणा कपूर शनिवार को जब पूछताछ के लिए मुंबई के बलार्ड एस्टेट स्थित प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के कार्यालय पहुंचे तो वह उस दिग्गज बैंकर से एकदम अलग नजर आ रहे थे जिसने येस बैंक को देश के अग्रणी बैंकों की जमात में शामिल किया। येस बैंक की स्थापना 2003 में हुई थी। कपूर उस वक्त रैबो इंडिया फाइनैंस से जुडे थे और उन्हें येस बैंक का प्रमुख नहीं बल्कि सह-प्रवर्तक निदेशक बनना था। बैंक ने अपना पहला प्रमुख खोजने की जिम्मेदारी एक्जीक्यूटिव सर्च फर्म कॉर्न फेरी को सौंपी। आखिरकार प्रवर्तक समूह के बीच हुई चर्चा में यह तय हुआ कि राणा कपूर को प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी बनना चाहिए। एक अन्य सह-प्रवर्तक अशोक कपूर को चेयरमैन बनाने का फैसला हुआ। कपूर ने रैबो से इस्तीफा दे दिया और उसने भी भारत में अपने नए मुख्य कार्यकारी की तलाश शुरू कर दी। कपूर ने अमेरिका में पढ़ाई की थी और बैंक ऑफ अमेरिका तथा एएनजेड ग्रिंडलेज इनवेस्टमेंट बैंक सहित कई विदेशी बैंकों में काम किया था। ऐसे में सवाल उठ रहे थे कि उन्हें एक विदेशी बैंक में आरामदायक नौकरी छोड़कर एक नए बैंक में काम करने का फैसला क्यों किया? इसका उत्तर उन्होंने दो शब्दों में दिया, 'उद्यमशीलता का मजा।'
 
यही जुनून था कि जुलाई 2005 में जब मुंबई मूसलाधार बारिश से पानी-पानी हो गई थी तो वह अपने ऑफिस में बैठे काम कर रहे थे। बोर्ड बैठक से पहले उन्होंने सारा लंबित काम निपटाया। लेकिन बोर्ड की बैठक को टालना पड़ा क्योंकि शहर में मची अफरातफरी के कारण बोर्ड के दो सदस्य इसमें हिस्सा नहीं ले पाए। संयोग से उसी वक्त कंपनी सूचीबद्ध हुई थी। बैंक की सूचीबद्धता शायद ही इससे बेहतर हो सकती थी। 50 शेयरों के लिए पहला कारोबार 65 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से हुआ। यह कीमत इश्यू की कीमत से 44 फीसदी अधिक थी। शेयर की कीमत में इसके बाद आई बढ़त के साथ बैंक नैशनल स्टॉक एक्सचेंज के निफ्टी 50 सूचकांक में शामिल हो गया। इसके बाद उसे 30 शेयरों वाले बीएसई सेंसेक्स में भी जगह मिल गई। इन दो सूचकांकों में देश की जानी मानी कंपनियां शामिल हैं। सितंबर 2017 में बैंक का मूल्य 80,000 करोड़ रुपये से अधिक था। 
 
बीच के वर्षों में बैंक ने दिन दोगुना रात चौगुना उन्नति की। उसे बैंकर के रूप में राणा कपूर की छवि का फायदा मिला जो आक्रामक तरीके से ऋण देना चाहते थे। जब दूसरे बैंकों को कुछ प्रवर्तकों से अपना पैसा लेने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था, कपूर उनसे अपना पैसा लेने में सफल रहे। लेकिन उनकी यह तरकीब हमेशा काम नहीं आई। बैंक की इस प्रवृत्ति से बैंकिंग नियामक भारतीय रिजर्व बैंक खुश नहीं था।  हाल ही में सरकार ने येस बैंक के बोर्ड को भंग करने और उस पर कई तरह की पाबंदियां लगा दी जिससे बीएसई में इसका बाजार पूंजीकरण 4,132 करोड़ रुपये रह गया। इसके बाद तो बैंक की शाखाओं पर पैसा निकालने के लिए जमाकर्ताओं की लाइन लग गई। उनसे कहा गया है कि बैंक के संकट का समाधान होने तक वे 50 हजार रुपये से अधिक रकम नहीं निकाल सकते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि बैंक ने ऐसे उद्योगपतियों को बहुत पैसा उधार दे दिया था जो इसे चुकाने की स्थिति में नहीं थे। बैंक के पास इस कर्ज को कवर करने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं थी। ईडी ने रविवार सुबह कपूर को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आरोप है कि कपूर परिवार ने उन कंपनियों से रिश्वत ली थी जिन्हें येस बैंक ने उधार दिया था। 
 
आरबीआई के राणा कपूर को बर्खास्त करने के बाद रवनीत गिल को येस बैंक का नया मुख्य कार्याधिकारी बनाया गया था। डॉयचे बैंक से आए गिल पिछली कुछ तिमाहियों से अतिरिक्त फंडिंग के लिए हाथपांव मार रहे थे। कई निवेशकों के नाम हवा में तैर रहे थे लेकिन इनमें से किसी ने भी बैंक में निवेश नहीं किया। कपूर ने कर्ज देने में जो आक्रामकता दिखाई थी, उससे बैंक को भरोसा बनाने में मदद नहीं मिली।  लंबे समय तक बैंक की उधारी वृद्धि दोहरे अंकों में रहे। 2019 में ही इसकी रफ्तार में कुछ कमी आई। बैंक के उपलब्ध पिछली तिमाही के आंकड़ों के मुताबिक उसकी उधारी में पिछले साल के मुकाबले 6.1 फीसदी की गिरावट आई। 
 
इससे एक साल पहले से ही बैंक का तिमाही शुद्ध मुनाफा घटना शुरू हो गया था और सितंबर 2018 से हर तिमाही में उसे नुकसान हुआ है। सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों का अनुपात यानी कुल उधारी की तुलना में फंसे कर्ज का प्रतिशत 1.6 फीसदी से बढ़कर सितंबर, 2019 तिमाही में 7.4 फीसदी पहुंच गया।  दिलचस्प है कि बैंक का कुल जमा भी पहली बार सितंबर, 2019 में घट गया। शायद जमाकर्ताओं को बैंक की स्थिति का अहसास हो गया था। बैंक ने दिसंबर, 2019 के तिमाही आंकड़ों की घोषणा में देरी की है जो अच्छा संकेत नहीं है। 
 
बैंकों ने कपूर के गिरवी शेयर बेच दिए। नवंबर 2019 की एक खबर के मुताबिक कपूर के पास केवल 900 शेयर रह गए थे जिनकी कीमत 60 हजार रुपये थी। सितंबर 2018 में उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा था कि वह कभी भी अपने शेयर नहीं बेचेंगे। उन्होंने अपने शेयरों की तुलना हीरे से करते हुए कहा कि वह उन्हें अगली पीढ़ी को सौंपेंगे। आखिरकार उन्हें प्रमुख और अहम शेयरधारक के रूप में बैंक से निकलना पड़ा। अपनी इस यात्रा में येस बैंक कोई कई अन्य दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा। इसमें दिवंगत सह-संस्थापक अशोक कपूर की पत्नी मधु कपूर के साथ बोर्ड में प्रतिनिधित्व को लेकर हुआ विवाद भी शामिल है। इस मामले ने बहुत तूल पकड़ा था। बंबई उच्च न्यायालय ने मधु कपूर के पक्ष में फैसला सुनाया था। दोनों प्रवर्तक परिवारों के बीच सुलह की अफवाहें थी लेकिन शेयरों की कीमत में इसका कोई संकेत नहीं दिखा। बैंक में जिस तरह से चीजें हो रही थीं, उससे आरबीआई खुश नहीं था और उसने राणा कपूर को अपना कार्यकाल आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी।
 
बैंक के शुरुआती विज्ञापनों में दिखाया गया था कि एक उद्यमी फंड की तलाश में हैं और बैंक उसे 'येस' कहता है। बैंक का संचालन शुरू होने से पहले बिज़नेस स्टैंडर्ड ने राणा कपूर से पूछा था कि उन्होंने बैंक का नाम येस बैंक क्यों रखा है। तब उन्होंने कहा था, 'यह सकारात्मक है और इसमें भरोसा तथा विश्वास की भावना है।' लेकिन निवेशकों और बैंक की शाखाओं के बाहर खड़े जमाकर्ताओं की भावना शायद कुछ अलग ही होगी।
Keyword: yes bank, NPA, rana kapoor, ED, RBI,,
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