बिजनेस स्टैंडर्ड - मजबूत नेता की आर्थिक सफलता जरूरी नहीं
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मजबूत नेता की आर्थिक सफलता जरूरी नहीं

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  March 08, 2020

अब वक्त आ गया है कि भारतीय राजनीति के हम जैसे विश्लेषक दो स्वीकारोक्तियां करें।  पहली, हम पिछले कुछ समय से गलत प्रश्न पर बहस कर रहे हैं। और दूसरी यह कि हम गलत जवाब का साथ देते रहे। सन 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से ही यह सवाल बना रहा है कि क्या अच्छी अर्थनीति अच्छी राजनीति की राह बनाती है? दूसरे शब्दों में क्या आप आर्थिक सुधार करके, सरकार और अफसरशाही का आकार घटाकर, कुछ ताकत बाजार को देकर, वृद्धि मजबूत बनाकर दोबारा चुनाव जीत सकते हैं? यदि नहीं तो इसके लिए क्या करना होगा? इसका उत्तर यह रहा है कि एक मजबूत नेता चुनें जो राजनीतिक जोखिम उठाने से डरता नहीं हो। केवल ऐसा करके ही अच्छी अर्थनीति हासिल की जा सकती है। ऐसे मजबूत नेता में यह राजनीतिक पूंजी होगी कि वह आर्थिक सुधारों के अलोकप्रिय दुष्परिणाम मसलन असमानता में इजाफा और पूंजीवाद का रचनात्मक विनाश आदि को गौण बना सके। जाहिर है वह और उसके साथ हम सभी विजेता होंगे।

 
हालिया राजनीतिक इतिहास यह दर्शाता है कि हम दोनों ही मोर्चों पर गलत रहे। हम इंदिरा गांधी के दौर के बाद के सबसे मजबूत नेतृत्व के छठे वर्ष में हैं। कुछ लोग, खासतौर पर नरेंद्र मोदी के समर्थक यह भी कह सकते हैं कि मोदी उनसे भी मजबूत हैं। आखिर उन्होंने ऐसे जोखिम उठाए और निर्णय लिए जो वह अपने शिखर दिनों में भी नहीं कर पाईं, भले ही वह ऐसा चाहती रही हों। मिसाल के तौर पर जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करना। या फिर जैसा कि विदेश मंत्री एस जयशंकर (मौजूदा कैबिनेट में एक दुर्लभ विद्वान हैं) ने इस सप्ताह नई दिल्ली में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च द्वारा आयोजित वार्षिक सम्मेलन में कहा था, कई विवादास्पद मुद्दों को यूंही टाला जा रहा था, मोदी सरकार ने उन पर निर्णय लेने की ताकत दिखाई है। यह सब ठीक है और अगर आप मोदी के वफादार हैं (बड़ी तादाद में भारतीय उनके वफादार हैं भी जिन्होंने भाजपा को दोबारा सत्ता सौंपी है) तो यह बहुत अच्छा लगेगा। परंतु कुछ सवाल बाकी हैं। 
 
पहला तो यही कि यदि देश का सबसे मजबूत और साहसी नेता अभी भी अच्छी राजनीति कर रहा है तो क्या इसने अच्छे अर्थशास्त्र का मार्ग प्रशस्त किया? या फिर अपने कमजोर पूर्ववर्ती से कुछ बेहतर कर पाए हैं? हम यह नहीं कह रहे हैं कि आप ने जिसे चुना है उस निर्णय पर आप पछताएं। आपके मतदान के पीछे सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि कई तरह के कारण होते हैं। मजबूत और शक्तिशाली नेता के चुनाव के पीछे भी यही तर्क होते हैं। संस्कृति, राष्ट्रवाद, धर्म, वाक कला, करिश्मा आदि तमाम बातें शामिल हो सकती हैं। परंतु प्रश्न यही है कि क्या मजबूत नेता का अर्थ मजबूत अर्थनीति भी होता है? सन 2019 की गर्मियों में मोदी दोबारा और बड़े बहुमत से चुनकर आए तो दो बातें साबित हुईं। पहली बात, उन्होंने अच्छी राजनीति की और दूसरा वृद्धि में ठहराव, बढ़ते घाटे और बेरोजगारी के बावजूद मतदाताओं ने उन्हें वोट दिया।
 
इसीलिए मैंने पहले ही कहा कि इन तमाम वर्षों के दौरान हम पहला प्रश्न ही गलत पूछते रहे: क्या अच्छी अर्थनीति अच्छी राजनीति को जन्म देती है? सवाल यह होना चाहिए था: क्या अच्छी और सफल राजनीति को अर्थव्यवस्था की परवाह करने की जरूरत है? उत्तर एकदम स्पष्ट है: यदि आप अपनी राजनीति को समझते हैं, सही भावनात्मक पहलुओं को स्पर्श कर सकते हैं, पर्याप्त तादाद में लोगों को लाभ पहुंचा सकते हैं तो वे बेरोजगारी, वृद्धि कृषि आय में ठहराव जैसी बातों की अनदेखी कर देंगे।
 
मोदी के कई मतदाता तो आर्थिक आंकड़ों की ओर देखते भी नहीं। खासतौर पर तब जबकि अन्य उपायों की मदद से लोगों को 'बेहतर' महसूस कराया जा सकता हो। 'बेहतर' महसूस करने की इसी भावना पर सवार होकर वाजपेयी सरकार ने सन 2004 के चुनाव में दोबारा जीत हासिल करने का विफल प्रयास किया था। इसके लिए उसने 'इंडिया शाइनिंग' का नारा दिया था। यह मानते हुए कि हमारा बुनियादी सवाल गलत था, हम अगले सवाल का रुख करते हैं। मजबूत नेता हमें वह देता है जिसकी हमें आकांक्षा होती है: बिना तात्कालिक राजनीतिक नुकसान का आकलन किए निर्णायक आर्थिक नेतृत्व, जो सबके लिए लाभदायक हो। परंतु आज कोई आंकड़ा या अहसास हमें वह राहत नहीं प्रदान करता।
 
पिछले कुछ समय से तमाम आर्थिक संकेतक नकारात्मक हो चुके हैं: वृद्धि, घाटा, व्यापार (निर्यात और आयात), निवेश, बचत, रोजगार आदि, आदि। इकलौती अच्छी खबर बुनियादी ढांचा क्षेत्र से आ रही है। सन 1991 के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था कभी भी इतने लंबे समय तक स्थायी गिरावट या ठहराव पर नहीं थी। तो क्या मजबूत नेतृत्व अच्छी और साहसी अर्थनीति की गारंटी नहीं है? किसी वैचारिक विश्लेषण को आंकड़ों के माध्यम से पूर्वग्रह ग्रस्त या उपयुक्त साबित करना अत्यंत कठिन है। बहरहाल, हम खुशनसीब हैं कि क्वाट्र्जडॉटकॉम की भूराजनैतिक रिपोर्टर एनालिसा मेरेली ने स्टेफनी रिजियो और अहमद सकाली द्वारा रॉयल मेलबर्न इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्रॉलजी ऐंड विक्टोरिया यूनिवर्सिटी के लिए किए गए अध्ययन की रिपोर्ट के रूप में हमें यह अनमोल चीज दी है। यह अध्ययन लीडरशिप क्वार्टली नामक जर्नल में प्रकाशित हुआ था।
 
इन शोधकर्ताओं ने 133 देशों के सन 1858 से 2010 (152 वर्ष) के राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का अध्ययन किया और यह निष्कर्ष निकाला कि मजबूत नेता अपनी अर्थव्यवस्थाओं के लिए नुकसानदेह रहे या बेमानी। ऐसे में आप सवाल कर सकते हैं कि सिंगापुर के ली क्वान यू अथवा रवांडा के पाल कागामे जैसे 'उदार तानाशाहों' को क्या मानें? अध्ययन कहता है कि ऐसे ताकतवर नेताओं में इक्कादुक्का संयोग से अच्छे भी निकलते हैं लेकिन मोटे तौर पर तो उनका अपने देश की अर्थव्यवस्थाओं पर नकारात्मक असर पड़ता है। मेरेली अपने अध्ययन में कहती हैं, 'अधिकतकर शक्तिशाली नेताओं ने अपने देश की अर्थव्यवस्थाओं को उससे भी बुरी हालत में छोड़ा जिस हालत में वह उन्हें मिली थी। या फिर उन्होंने उस आर्थिक लहर की सवारी की जिसे आना ही था।' ये सारे नेता तानाशाह नहीं थे। इनमें से कई लोकतांत्रिक देशों में उत्पन्न हुए और लगातार चुनावों का सामना किया। प्रश्न यह है कि मतदाताओं ने उन्हें दंडित क्यों नहीं किया? मतदाता ऐसे नेताओं की तुलना में कमजोर नेताओं को जल्दी दंडित क्यों करते हैं? भारतीय संदर्भ में बात करें तो आपातकाल के कारण इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर करने के बाद मतदाता तीन वर्ष से भी कम समय में उन्हें वापस सत्ता में ले आए। मजबूत नेता के प्रति यह कैसा खिंचाव है? उपरोक्त शोध इस बारे में वानरों के दृष्टांत का सहारा लेते हुए कहता है कि कठिन समय में वे सबसे मजबूत नर वानर का नेतृत्व स्वीकारते हैं। इससे साबित होता है कि पहले सवाल की तरह हम उसका जवाब भी गलत तलाश रहे थे। यानी यह सही नहीं है कि मजबूत नेता आर्थिक मोर्चे पर भी बेहतर होगा। मोदी के कार्यकाल पर नजर डालिए। 
 
मेरी नजर में उनका सबसे साहसी और सुधारवादी कदम था नया भूमि अधिग्रहण विधेयक। वह इकलौता ऐसा कदम है जिससे वह पीछे हटे। अपनी सत्ता और लोकप्रियता के शिखर पर वह यह जोखिम लेने से पीछे हट गए। छह साल में ऐसा केवल एक बार हुआ। सबसे बुरे और बिना सोचे समझे लिए गए नोटबंदी के निर्णय पर वह टिके रहे। इससे उन्हें राजनीतिक लाभ भी मिला। कम से कम उत्तर प्रदेश के चुनाव में जो नोटबंदी के तत्काल बाद हुए थे। ऐसा इसलिए क्योंकि इससे उनकी निर्णायक नेता की छवि और मजबूत हुई थी। मुक्त बाजार सुधार, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा, कम शुल्क दरों, मुक्त व्यापार, कम कर दर और न्यूनतम सरकार का समर्थक होते हुए मैंने कभी नहीं सोचा था कि मुझे अपनी दलील के समर्थन में थॉमस पिकेटी का सहारा लेना पड़ेगा। मैं उनकी पहली किताब को सतही मानता हूं लेकिन अपनी दूसरी किताब कैपिटल ऐंड आइडियोलॉजी में उन्होंने समझदारी की बात की है। वह लिखते हैं, 'असमानता न तो आर्थिक है और तकनीकी। यह वैचारिक और राजनैतिक है।' उनके मुताबिक यह तब तक बनी रहेगी जब तक मजबूत नेता इसके बावजूद अपनी प्रभुताशाली राजनीति और विचारधारा के साथ फलते-फूलते रहेंगे।
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