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न्याय में देरी

संपादकीय /  March 08, 2020

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय न्यायिक सम्मेलन में अपने उद्बोधन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विधि के शासन के महत्त्व की बात की। इतना ही नहीं उन्होंने इस संदर्भ में तीव्र गति से न्याय प्रदान करने की भूमिका को भी रेखांकित किया।  प्रधानमंत्री का यह कहना सही है कि खासतौर पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों का, भले ही वे विवादास्पद क्यों न हों, सरकार की शाखाओं और आम जनता द्वारा खूब सम्मान किया जाता है। अत्यधिक हाई प्रोफाइल मामलों का अत्यंत तेज गति से निपटारा करना और विधि के शासन का सम्मान करना भी एक अहम पहलू है। 

 
ऐसे में यह खेद की बात है कि हालिया अतीत में देश की सबसे बड़ी अदालत कुछ गहन संवैधानिक और राजनीतिक महत्त्व के मसलों को सुगमतापूर्वक निपटाने में विफल रही है। मौजूदा दौर के सबसे विवादास्पद मसलों में से एक मसला है राष्ट्रीय राजधानी के शाहीन बाग जैसे स्थानों पर नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ प्रदर्शन करने के अधिकार का। सर्वोच्च न्यायालय ने अब इस विषय पर सुनवाई 23 मार्च तक टाल दी है। यह अपने आप में अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। दिल्ली में हालिया हिंसा का कुछ संदर्भ इस विरोध प्रदर्शन के खिलाफ नाराजगी से भी जुड़ा है। ऐसे में सुनवाई टाला जाना और खेदजनक है। अदालत भी निष्क्रिय नहीं बैठी है। उसने अदालत की ओर से प्रदर्शनकारियों से बात करने के लिए दो प्रतिष्ठित लोगों को वार्ताकार नियुक्त किया। परंतु अधिक तेज गति से निस्तारण शायद दिल्ली में हाल में उपजे तनाव को कम करने में मदद करता। एक अन्य अहम संवैधानिक और राजनीतिक मसला चुनावी बॉन्ड से ताल्लुक रखता है। ऐसे मामलों में इतनी भी देरी नहीं की जानी चाहिए कि वे विवादित हो जाएं।
 
संविधान के अनुच्छेद 370 के समाप्त होने से उपजे मसलों और इसके कारण पूर्व जम्मू कश्मीर प्रांत में कठोर सैन्य नीति को लेकर भी लगातार सवाल पूछे जा रहे हैं। ऐसे गंभीर संवैधानिक मसलों को जल्द से जल्द निपटाना चाहिए।  आखिर सर्वोच्च न्यायालय का उद्देश्य भी तो यही है। आखिरकार न्यायालय ने इंटरनेट बंदी के व्यापक विषय पर निर्णय दिया। उसने ऐसे प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया पर कुछ प्रतिबंध लगाए। इसके बावजूद कश्मीर पर लगे प्रतिबंधों का विशिष्ट प्रश्न लंबे समय तक टाला गया। इसके अलावा एक बुनियादी सवाल बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिकार का है। विधि के शासन वाले देशों में सदियों से न्यायपालिका के बुनियादी कामों में से एक बंदी बनाने की वैधता के नियम से जुड़ा है। परंतु हाई प्रोफाइल मामलों में भी मसलन पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री और मौजूदा सांसद फारुख अब्दुल्ला को बंदी बनाए जाने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने उतनी तेजी से काम नहीं किया जितना उसे करना चाहिए था। इस विषय में नोटिस छह दिन बाद जारी किया गया। इस अंतराल का इस्तेमाल सरकार ने अब्दुल्ला पर जन सुरक्षा अधिनियम की धारा लगाने में किया। ऐसा न्यायिक हस्तक्षेप में देर होने की वजह से हो सका। 
 
इसमें दो राय नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय को किसी भी मामले में अंतिम और सही निर्णय पर पहुंचने से पहले पूरा समय लेना चाहिए। खासतौर पर ऐसे मामलों में जो राष्ट्रीय महत्त्व के हैं। बहरहाल, यदि न्यायिक निर्णय बहुत देरी से आता है तो उसकी प्रासंगिकता समाप्त हो जाती है। यदि ऐसा होता है तो खुद न्यायिक प्रक्रिया की प्रासंगिकता के लिए ही जोखिम उत्पन्न हो जाती है। 
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