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क्रिप्टोकरेंसी के नियमन की जटिल गुत्थी

गीतिका श्रीवास्तव और सुदीप्त दे /  March 08, 2020

देश में क्रिप्टोकरेंसी के उपयोग तथा नियमन को लेकर उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए ऐतिहासिक निर्णय के बाद 'क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध तथा सरकारी डिजिटल करेंसी का नियमन विधेयक 2019' नामक मसौदा विधेयक पर बहस छिड़ गई है। मसौदा विधेयक में क्रिप्टोकरेंसी के उपयोग को दंडनीय बनाया गया है जिसके लिए दस वर्ष तक की सजा का प्रावधान है। फिलहाल सरकार तथा बैंकिंग नियामक भारतीय रिजर्व बैंक, दोनों को नई तकनीक पर अपने विचारों में बदलाव लाने के लिए एक बार फिर गहन विचार विमर्श करना होगा। 

 
सिरिल अमरचंद मंगलदास में पार्टनर अरुण प्रभु ने कहा, 'इस निर्णय के बाद इस क्षेत्र में नवोन्मेष बढ़ेगा और ब्लॉकचेन तथा डीएलटी तकनीक पर आधारित नई परियोजनाएं विकसित होंगी।' इसके चलते केंद्र सरकार तथा नियामकों के सामने अपने निर्णयों पर एक बार फिर विचार करने तथा क्रिप्टोकरेंसी के लिए नियमों को बनाकर इस परिवेश को तेजी से बढऩे में मदद करने का अवसर मिलेगा।  एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड तथा 'क्रिप्टोकरेंसीज इन इंडिया: नॉट इल्लीगल बट नॉट क्वाइट लीगल' पुस्तक के लेखक दिनकर कालरा कहते हैं, 'देश में आधारभूत संरचना तथा प्रतिभाएं शानदार आर्थिक अवसर प्रदान करती हैं।'
 
विशेषज्ञों का कहना है कि अब कई तरह के परिदृश्य देखे जा सकते हैं। उच्चतम न्यायालय के निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि क्रिप्टोकरेंसी आरबीआई के तहत आती हैं और इसके चलते केंद्रीय बैंक इस निर्णय पर पुनर्विचार याचिका दायर कर सकता है। अगर आरबीआई ऐसा करता है तो इससे एक बार फिर नियम कानून का रास्ता खुल सकता है। केंद्र सरकार के समर्थन के साथ आरबीआई संभावित धोखाधड़ी से ग्राहकों को बचाने के लिए अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है।  दूसरे परिदृश्य में हो सकता है कि नियामक एक बार फिर से पूर्ण प्रतिबंध लगा दे, हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अब इसकी संभावनाएं काफी कम हैं। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में कहा कि आरबीआई के पास प्रतिबंध संबंधी निर्णय को लेकर जरूरी दस्तावेजों अथवा सबूतों का अभाव है। हालांकि अगर विधायिका इस संबंध में कानून बनाने जा रही थी और अगर इस कानून को न्यायालय में चुनौती दी जाती तो कानून को ठोस सबूतों के साथ अपने तर्कों का समर्थन करके इस परीक्षण को पास करना होता। इस मामले में क्रिप्टो एक्सचेंजों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील और इकीगई लॉ के संस्थापक अनिरुद्ध रस्तोगी कहते हैं, 'यह सरकार पर है कि वह जोखिम संबंधी उपायों पर काम करे।'
 
सरकार एक अन्य विकल्प के तौर पर हालिया निर्णय के आधार पर अपने रुख की समीक्षा कर सकती है। यह फरवरी 2015 में फाइनैंशियल एक्शन टास्क फोर्स द्वारा प्रकाशित 'क्रिप्टोकरेंसी के लिए जोखिम आधारित दृष्टिकोण' जैसी विभिन्न रिपोर्ट की समीक्षा कर सकती है। इसमें अनुसंशा की गई कि क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध का प्रस्ताव करने वाले देशों को इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि क्या इस तरह के प्रतिबंध से उद्योग में छुपे तरीके से तो कारोबारी गतिविधि नहीं बढ़ रहीं।  सरकार वर्ष 2018 में अंतर-मंत्रिस्तरीय समिति की प्रारंभिक रिपोर्ट का मसौदा विधेयक 'क्रिप्टो टोकन तथा क्रिप्टो एसेट (प्रतिबंध, नियंत्रण एवं विनियमन) विधेयक 2018' के साथ भी जा सकती है। इस विधेयक के मसौदे में मान्यताप्राप्त तथा विनियमित एक्सचेंजों में क्रिप्टोकरेंसी की बिक्री तथा खरीद की अनुमति देने के प्रावधान थे। समिति ने शुरू में कहा था कि प्रतिबंध को लागू करना मुश्किल होगा और इससे कई परिचालक अवैध गतिविधियां शुरू कर देंगे जिससे गैर कानूनी गतिविधियों के लिए इनके उपयोग का चलन बढ़ जाएगा। 
 
अगर सरकार इस विधेयक पर वापिस जाती है तो यह उद्योग के लिए 'बैठो तथा देखो' वाली स्थिति होगा। खेतान ऐंड कंपनी में पार्टनर ,संजय खान नागरा कहते हैं, 'कानूनी जटिलताओं के बीच विभिन्न प्राधिकारियों (आरबीआई, सेबी, वित्त मंत्रालय आदि) को इस पर गहन विचार करना होगा।' इस मामले में याचियों का पक्ष रखने वाले तथा निशित देसाई एसोसिएट्स में वकील जयदीप रेड्डी एवं वैभव पारिख सलाह देते हैं कि सरकार को क्रिप्टोकरेंसी मध्यस्थों के लिए एक नया लाइसेंस लेकर आना चाहिए जिस पर तकनीक, अर्थव्यवस्था तथा वित्त की समझ वाले विशेषज्ञ समूह की निगरानी हो। विशेषज्ञ क्रिप्टोकरेंसी के लिए आवश्श्यक नियम बनाने पर जोर दे रहे हैं। इंडसलॉ में पार्टनर श्रीनिवास कट्टा कहते हैं, 'अगर नियामक मुद्रा तथा सिक्योरिटी की दुनिया में कदम रख रहे हैं तो प्रतिबंध जैसे नियम आसानी से समाप्त किए जा सकते हैं।' विशेषज्ञों का कहना है कि क्रिप्टोकरेंसी पर कर लगाने संबंधी प्रस्ताव भी नीति निर्माताओं के रुख को बदल सकते हैं। दिनकर कहते हैं, 'क्रिप्टोकरेंसी रहेंगी और जल्द ही विश्व का कानूनी ढांचा इसे स्वीकार कर लेगा।'
 
नियामकीय सैंडबॉक्स
 
अगस्त 2019 में आरबीआई नियामकीय सैंडबॉक्स के विचार को लेकर आया था। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि क्रिप्टोकरेंसी तकनीक का उपयोग करने वाली फिनटेक कंपनियों के लिए भी एक नियामकीय सैंडबॉक्स लाया जा सकता है।  विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में सीनियर रेजिडेंट फैलो शहनाज अहमद का कहना है, 'क्रिप्टोकरेंसी संबंधित फिनटेक नवोन्मेष का परीक्षण करने के लिए फिनटेक कंपनियों को अनुमति देने से आरबीआई के समक्ष भारत में साक्ष्य आधारित नियामकीय प्रक्रिया विकसित होगी।' नियामकीय सैंडबॉक्स नवोन्मेष कर रही कंपनियों तथा नियामकों को एक अलग माहौल उपलब्ध कराता है जिसमें नए प्रयोगों का परीक्षण किया जा सके। इससे सभी को संबंधित प्रयोग के लाभ तथा जोखिम के साक्ष्यों की गणना करने में मदद मिलेगी। 
 
विधि सेंटर फॉर लीगल पालिसी ने हाल ही में जारी एक रिपोर्ट 'ब्लूप्रिंट ऑफ फिनटेक रेगुलेटरी सैंडबॉक्स लॉ' में एक अलग कानून की सिफारिश की है जो एक समान फ्रेमवर्क के तहत फिनटेक नवोन्मेष के लिए सैंडबॉक्स परीक्षण का अनुमति दे। प्रस्तावित फ्रेमवर्क सैंडबॉक्स परीक्षण में भाग लेने के लिए सभी संबंधित वित्तीय क्षेत्र नियामकों, जैसे सेबी, आरबीआई आदि के लिए एक औपचारिक तंत्र प्रदान करेगा। प्रस्तावित कानून के व्यापक संदर्भों को रेखांकित करते हुए रिपोर्ट में वित्तीय क्षेत्र के नियामकों को मिलाकर एक अंतर-नियामकीय समन्वय समिति बनाने का सुझाव दिया गया है। हालांकि प्रत्येक नियामक अपने स्वयं के सैंडबॉक्स का संचालन जारी रख सकता है लेकिन इसमें कहा गया है कि प्रस्तावित कानून को देश में फिनटेक सैंडबॉक्स परीक्षण के लिए न्यूनतम मानकों को पूरा करना चाहिए।
Keyword: cryptocurrency, RBI, court, bank,,
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