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जातीय बहुलता के अंत की ओर बढ़ रहे श्रीलंका के कदम

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  March 06, 2020

श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे ने गत दिनों जब जल्द आम चुनाव कराने की घोषणा की तो कोई अचरज नहीं हुआ। इस द्वीपीय देश में 25 अप्रैल को नई संसद के चुनाव के लिए मतदान होगा। उस समय तक मौजूदा प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के बड़े भाई महिंदा राजपक्षे अपने 16 मंत्रियों के साथ कार्यवाहक सरकार चलाते रहेंगे लेकिन कोई अहम नीतिगत निर्णय नहीं कर पाएंगे। राजनीतिक स्थिरता के ऊपरी असर के बावजूद इस चुनाव से श्रीलंका में जातीय एवं धार्मिक तनाव बढऩे की आशंका है।

 
पिछला आम चुनाव 17 अगस्त, 2015 को हुआ था। उसके नतीजे एकदम स्पष्ट थे। यूनाइटेड नैशनल पार्टी (यूएनपी) ने 225 सदस्यीय संसद में 106 सीटों पर जीत हासिल की थी जबकि यूनाइटेड पीपल्स फ्रीडम अलायंस (यूपीएफए) को 95 सीटें मिली थीं। चुनाव के बाद रानिल विक्रमसिंघे प्रधानमंत्री बने जबकि राजपक्षे परिवार की अगुआई वाले धड़े को विपक्ष में बैठना पड़ा। तमिल पार्टियों के गठजोड़ इलंकेई तमिल अरसू कच्ची (आईटीएके) ने चुनाव में 16 सीटें और पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट (जेवीपी) ने छह सीटें जीती थीं जबकि ईलम पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और श्रीलंका मुस्लिम कांग्रेस के खाते में एक-एक सीट आई थी।
 
सीटों के इस आंकड़े के पीछे नए राजनीतिक गठजोड़ की उलझी हुई तस्वीरें थीं। पहले एक-दूसरे की विरोधी रही पार्टियां श्रीलंका में सिंहली बौद्धों के नेता महिंदा राजपक्षे को हराने के इकलौते मकसद से एक साथ आ गईं। राजपक्षे के राष्ट्रपति रहते समय ही खूंखार गुरिल्ला संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) का खात्मा करने के लिए सघन सैन्य अभियान चलाया गया था। उस अभियान की निगरानी महिंदा राजपक्षे के छोटे भाई गोटाभाया राजपक्षे ने की थी। ऐसे में यह स्वाभाविक ही था कि राजपक्षे परिवार के किसी भी सदस्य को तमिल एवं मुस्लिम आबादी के दबदबे वाले उत्तरी एवं पूर्वी प्रांतों में पसंद नहीं किया जाएगा। उत्तरी एवं पूर्वी इलाकों ने बड़ी संख्या में तमिल पार्टियों के गठबंधन के पक्ष में मतदान किया जिसका अन्य दलों ने यह मतलब निकाला कि जनादेश राजपक्षे खानदान के खिलाफ है। ऐसे में तमिल गठजोड़ विक्रमसिंघे और यूएनपी के साथ चला गया। उसके बाद विक्रमसिंघे प्रशासन के लिए यह राजनीतिक कर्तव्य बन गया कि तमिल आबादी के साथ अतीत में हुई कुछ बड़ी गलतियों को सुधारा जाए। लेकिन समस्या यह थी कि विक्रमसिंघे इस भूल-सुधार कवायद के लिए दिल से तैयार नहीं थे। इसका परिणाम यह निकला कि तमिलों और कुछ हद तक मुस्लिमों को भी यह लगने लगा कि न्याय एवं मानवाधिकार सुनिश्चित करने से जुड़ी बातें महज जुबानी जमाखर्च हैं। इसी के साथ अल्पसंख्यकों तक पहुंचने की सीमित स्तर पर हुई सरकारी कोशिशों ने भी बहुसंख्यक सिंहल बौद्धों को चौकन्ना कर दिया। 
 
फ्रांसीसी क्रांति के विवादास्पद विचारक माने जाने वाले लुई डी सेंट-जस्ट ने फांसी पर लटकाने के लिए ले जाते समय कहा था, 'जब आप क्रांति का आधा सफर तय करते हैं तो आप खुद ही अपनी कब्र खोद लेते हैं।' श्रीलंका में भी कुछ ऐसा ही हुआ और तमिल उग्रवाद की जगह इस्लामी उग्रवाद ने ले ली। इसे सिंहली बौद्धों के वर्चस्व के खतरे की प्रतिक्रिया बताया गया। इसका नतीजा वर्ष 2019 में ईस्टर के दिन इस्लामी कट्टरपंथियों की तरफ से बमबारी के तौर पर सामने आया। ये हमले कोलंबो और बट्टीकलोआ दोनों जगहों पर हुए थे। विक्रमसिंघे सरकार से निराश मुस्लिम सिंहल बौद्धों के दबदबे एवं अपने भविष्य को लेकर आशंकित होने के बाद चरमपंथ के रास्ते पर चल पड़े।
 
इसका परिणाम यह हुआ कि पहले से ही खस्ताहाल श्रीलंका की अर्थव्यवस्था एकदम से धराशायी हो गई। देश को अपनी अत्यधिक विदेशी उधारी चुकाने के लिए लिए गए भारी कर्ज के भुगतान की मुश्किल चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। श्रीलंका को अब से 2023 तक परिपक्व होने वाले विदेशी ऋण और डेट के एवज में 17 अरब डॉलर चुकाने होंगे। वर्ष 2018 में श्रीलंका की पर्यटन से आय करीब 4.4 अरब डॉलर रही थी जबकि 2019 में यह करीब चार अरब डॉलर रही है। पर्यटन आय में आई गिरावट के लिए यूरोपीय देशों द्वारा अपने नागरिकों को श्रीलंका जाने से परहेज करने संबंधी सलाह को जिम्मेदार माना गया। इससे भी बुरा यह हुआ कि पहले से ही बेमेल गठजोड़ में शामिल तत्कालीन राष्ट्रपति मैत्रीपाल श्रीसेना और विक्रमसिंघे आखिरकार अलग हो गए। उसके फौरन बाद श्रीसेना ने विक्रमसिंघे को बरखास्त कर दिया तो देश में गंभीर संकट खड़ा हो गया। हालत यह थी कि वर्ष 2019 की अंतिम तिमाही में श्रीलंका के भीतर किसी के भी पास शासन की बागडोर नहीं थी। 
 
फिर इस साल की शुरुआत में राष्ट्रपति चुनाव कराए गए और अपेक्षा के मुताबिक गोटाभाया राजपक्षे ही विजयी हुए। उन्होंने यूएनपी के उम्मीदवार सजित प्रेमदासा को शिकस्त दी। हालांकि उस हार के फौरन बाद प्रेमदासा ने अलग होकर अपनी नई पार्टी बना ली। इस हफ्ते श्रीलंका ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में पारित 2015 की प्रस्ताव संख्या 30/1 से खुद को अलग करने की घोषणा कर दी है। इस प्रस्ताव में कहा गया था कि श्रीलंका सरकार अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रति अपना सद्भाव प्रदर्शित करने के लिए न्याय एवं मेलमिलाप की विस्तृत प्रक्रिया चलाएगी। नए निजाम का यह फैसला आगामी चुनावों में हावी रहने वाली विभाजनकारी बहस का शुरुआती संकेत है। 
 
ऐसे तमाम संकेत हैं कि तमिल मतदाता तमिल दलों को वोट देंगे जबकि सिंहली आबादी राजपक्षे और उनके समर्थकों के साथ खड़ी रहेगी। वहीं मुस्लिम मतदाताओं की पसंद मुस्लिम उम्मीदवार ही रहेंगे। आने वाले चुनाव श्रीलंका के बहुजातीय स्वरूप के अंत की बानगी होंगे। यह देखना अभी बाकी है कि एक राष्ट्र के तौर पर श्रीलंका किस तरह बचा रहेगा?
Keyword: Sri Lanka, president, Gotabaya Rajapaksa,
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