बिजनेस स्टैंडर्ड - दूरसंचार पर फिर एक बार संकट की मार
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दूरसंचार पर फिर एक बार संकट की मार

राहुल खुल्लर /  March 06, 2020

दूरसंचार क्षेत्र के बरबाद होने की स्थिति में समूची अर्थव्यवस्था पर इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा। भारत कतई नहीं चाहेगा कि ऐसी स्थिति पैदा हो। इस बारे में बता रहे हैं राहुल खुल्लर

 
अक्टूबर 2019: उच्चतम न्यायालय ने समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) के बारे में सरकार की परिभाषा को सही ठहराते हुए कहा कि बकाया शुल्क, ब्याज और जुर्माने के तौर पर दूरसंचार कंपनियों को लाखों करोड़ रुपये चुकाने होंगे। इस आदेश की अनुपालना में देरी होने पर न्यायालय ने 14 फरवरी, 2020 को सख्त नाराजगी जताई। घबराई सरकार ने आनन-फानन में इन कंपनियों से आधी रात तक पूरी राशि चुकाने को कह दिया। उसके बाद एक हफ्ते में दूरसंचार कंपनियों ने इस बकाये का कुछ हिस्सा जमा कर दिया। दूरसंचार जगत के दिग्गजों, मंत्रियों एवं शीर्ष सरकारी अधिकारियों के बीच बैठकों का दौर चलता रहा। सर्वोच्च अदालत के फैसले के चार महीने बीत चुके हैं और कोई भी समाधान नजर नहीं आ रहा है।
 
वरिष्ठ पत्रकारों, वकीलों और दूरसंचार क्षेत्र के विशेषज्ञों ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को गलत एवं दोषपूर्ण बताते हुए इसकी आलोचना की है। यह फैसला इन कारणों से विशुद्ध रूप से पक्षपातपूर्ण लग रहा है: (1) यह लाइसेंस शर्तों के बारे में एक कानूनवादी नजरिया अपनाता है और एजीआर के मनमाने एवं विशुद्ध रूप से अनुचित परिभाषा को नजरअंदाज करता है। (2) यह इस बात को मानकर चलता है कि कंपनियों ने लाइसेंस करार पर अपनी मर्जी से हस्ताक्षर किए थे (जबकि उनके पास कोई चारा नहीं था)। (3) दूरसंचार कंपनियों और सरकार के बीच वर्ष 2011 तक सच्चे अर्थों में एक विवाद था लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इस विवाद की वास्तविकता पर कोई सवाल नहीं उठाया। (4) दूरसंचार विवाद समाधान एवं अपील पंचाट (टीडीसैट) के प्रमुख के रूप में हमेशा ही सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश रहे हैं। इस पंचाट ने लगातार दूरसंचार कंपनियों के पक्ष में फैसले सुनाए थे लिहाजा कंपनियों का यह मानना लाजिमी था कि उन्हें कदम उठाने की जरूरत है। (5) ब्याज, जुर्माना और जुर्माने की राशि पर ब्याज लगाने का फैसला इस धारणा पर आधारित है कि राजस्व भुगतान में जानबूझकर देरी की गई। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय ने गेल इंडिया, पावर ग्रिड और ऑयल इंडिया जैसी गैर-दूरसंचार कंपनियों से भी बकाया वसूली के अनचाहे दुष्परिणामों को संभवत: नजरअंदाज किया है।
 
इस समस्या की गंभीरता का अंदाजा लगाना उपयोगी है। नवीनतम अनुमान बताते हैं कि कुल बकाया 3.9 लाख करोड़ रुपये का है जिसमें दूरसंचार कंपनियों पर 1.4 लाख करोड़ रुपये और गैर-दूरसंचार कंपनियों पर 2.5 लाख करोड़ रुपये है। इसका मतलब है कि गिनी-चुनी 10 फर्मों को ही सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दो फीसदी राशि का बकाया देना है। सच तो यह है कि अकेली दो कंपनियों का ही बकाया जीडीपी के 0.75 फीसदी के बराबर है। वहीं वर्ष 2020-21 के लिए अनुमानित केंद्र सरकार के कुल राजस्व प्राप्तियों के 20 फीसदी के बराबर है। इस तरह बहुत बड़ी राशि इससे जुड़ी हुई है। 
 
पहले दूरसंचार कंपनियों पर नजर डालते हैं। इस क्षेत्र का कुल वार्षिक समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) बकाया राशि के सौ फीसदी के बराबर है। यानी दूरसंचार कंपनियों को अपना बकाया चुकाने के लिए अपने कुल वार्षिक शुद्ध राजस्व की जरूरत पड़ेगी। बीते तीन साल में इस क्षेत्र की मुनाफा कमाने की क्षमता पर गंभीर असर पड़ा है। नए निवेश के लिए अंदरूनी संसाधनों की कोई गुंजाइश नहीं है। कुछ कंपनियां इस फैसले के बाद किस तरह भुगतान करने जा रही हैं? अब दूरसंचार क्षेत्र से इतर कंपनियों पर पडऩे वाले इस फैसले के असर पर गौर करते हैं। गैर-दूरसंचार कंपनियों पर बकाया 2.5 लाख करोड़ रुपये में से 75 फीसदी रकम की देनदारी तीन कंपनियों- गेल, पावर ग्रिड और ऑयल इंडिया पर ही है। इन कंपनियों के कुल वार्षिक राजस्व और उन पर बकाया के बीच अनुपात इस तरह है: गेल (160 फीसदी), पावर ग्रिड (88 फीसदी) और ऑयल इंडिया (330 फीसदी)। ऐसे में एक कंपनी के वित्त पर पडऩे वाले संभावित असर को इस तरह आंका जा सकता है: आरक्षित राशि एवं अधिशेष के बरक्स उनके बकाये का अनुपात गेल (300 फीसदी) और ऑयल इंडिया (150 फीसदी) है। उच्चतम न्यायालय के आदेश का पालन करने पर उनकी आरक्षित राशि की तिगुनी रकम चली जाएगी और उसके बाद भी उन्हें बड़ी रकम उधार लेनी होगी।
 
इन निर्णयों के आर्थिक प्रभावों को लेकर पहले भी काफी कुछ कहा जा चुका है। दूरसंचार क्षेत्र संभवत: द्वैधाधिकार या एकाधिकार की स्थिति में सिमटकर रह जाएगा। दूरसंचार में नया निवेश आना बंद हो जाएगा, 5जी स्पेक्ट्रम की तय नीलामी का सफल होना मुश्किल हो जाएगा और एक बड़ी दूरसंचार कंपनी मरणासन्न हो जाएगी। इसका रोजगार पर प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रतिकूल प्रभाव पडऩा स्वाभाविक है। सार्वजनिक क्षेत्र वाली ये गैर-दूरसंचार कंपनियां प्रभावी तौर पर दिवालिया हो जाएंगी और इनकी तरफ से नए निवेश की बात तो भूल ही जाइए। बैंकिंग क्षेत्र पर पडऩे वाले प्लवन प्रभाव से सबसे ज्यादा नुकसान होगा। गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के सृजन के नए दौर के लिए खुद को तैयार रखना होगा। बैंकिंग प्रणाली अभी एनपीए संकट से खुद को पूरी तरह बाहर नहीं निकाल पाया है लिहाजा नया दौर उसे और गहरी समस्या में डाल देगा। वरिष्ठ बैंकरों ने इस बारे में पहले ही अपनी आशंकाएं जाहिर कर दी हैं। जोखिम से बचने की प्रवृत्ति छोडऩे की अपील को लोग अनसुना करने लगेंगे। जहां तक निवेश की मांग एवं ऋण प्रवाह में नई जान फूंकने की बात है तो उसे भूल ही जाइए। 
 
यहां कुछ ऐसे विकल्प हैं जिन पर गौर करने की जरूरत है। पहला, दूरसंचार कंपनियों से लिए जाने वाले ब्याज, जुर्माने एवं जुर्माने पर ब्याज को तत्काल वापस लिया जाए। कुल बकाये में इनका अंशदान करीब 73 फीसदी है। लाइसेंस शुल्क वसूलने के फैसले से सहमति जताने के साथ ही यह विकल्प कहता है कि दूरसंचार कंपनियों ने जानबूझकर अवमानना नहीं की थी लिहाजा उन पर जुर्माना नहीं लगाया जाना चाहिए। दूसरा, सारी बकाया राशि को ब्याज-मुक्त कर्ज के रूप में तब्दील कर दें और उसका भुगतान 15 समान वार्षिक किस्तों में किए जाने का प्रावधान किया जाए। नौ फीसदी की घटी हुई दर पर भी यह 46 फीसदी का बड़ा घटक हो जाएगा। अपने शुद्ध वर्तमान मूल्य (एनपीवी) के संदर्भ में सभी दूरसंचार कंपनियों को 46 फीसदी की राहत मिलेगी। तीसरा, दूरसंचार नियामक ट्राई की तरफ से जनवरी 2015 में जीआर की परिभाषा और प्रवर्तनीय जीआर के बारे में दी गई अनुशंसाओं को स्वीकार कीजिए। इससे गैर-दूरसंचार कंपनियों की पीड़ा खत्म होगी। चौथा विकल्प यह है कि पांच वर्ष के लिए लाइसेंस शुल्क या स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क का अवकाश घोषित कर दिया जाए। इससे 80,000 करोड़ रुपये की एनपीवी क्षति होगी। इसमें अड़चन यह है कि इससे मौजूदा समस्या का फौरन समाधान नहीं हो पाएगा। कंपनियों को पहले बकाये का निपटान करना होगा और फिर राहत मिलने का इंतजार करना होगा। वैसे हर कोई जानता है कि लंबे समय में क्या होता है?
 
केंद्रीय बैंक के गवर्नर स्वभाव से ही सजग और मितभाषी होते हैं। आरबीआई के गवर्नर ने हाल ही में कहा कि एनपीए का पिछला बोझ ही काफी अधिक बना हुआ है जिससे ऋण वृद्धि प्रभावित हो रही है। इसके साथ उन्होंने यह भी कहा कि बैंकिंग क्षेत्र को दूरसंचार क्षेत्र में हो रही घटनाओं से चुनौतियां झेलनी पड़ेंगी। उनके शब्दों पर ध्यान दें। भारत इस समय कतई नहीं चाहेगा कि अर्थव्यवस्था दूरसंचार क्षेत्र की बरबादी से जुड़े असर का सामना करे। सरकार दुविधा की हालत में नहीं रह सकता है, वक्त मुस्तैद होकर कदम उठाने का है।
 
(लेखक दूरसंचार नियामक ट्राई के पूर्व चेयरमैन हैं) 
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