बिजनेस स्टैंडर्ड - रेल सेवाओं का निजीकरण
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रेल सेवाओं का निजीकरण

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  March 06, 2020

रेल सेवाओं के निजीकरण का मसला सैद्घांतिक नहीं बल्कि व्यावहारिक है। इसके जरिये ही इस कवायद को सफल बनाया जा सकता है। कई देश अपनी रेल सेवाओं का आंशिक निजीकरण कर चुके हैं। ब्रिटेन, जापान, कनाडा, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड आदि ऐसे ही कुछ देश हैं। मिस्र ने भी यह प्रक्रिया शुरू कर दी है जबकि अर्जेन्टीना ने रेल पटरियां तक निजी ढंग से बिछाने का काम शुरू किया है। इनमें से कई देशों ने एक सदी पहले निजी रेल से ही शुरुआत की थी। बाद में जब रेल कंपनियां संकट से जूझने लगीं तो उनका राष्ट्रीयकरण किया गया। अब एक बार फिर इस क्षेत्र में सरकारी स्वामित्व कम किया जा रहा है। भारत में भी 19वीं सदी के मध्य में रेलवे की शुरुआत निजी रेल कंपनियों से ही हुई थी। सन 1951 में उनका निजीकरण किया गया और अब पहली बार वापस निजीकरण का कदम उठाया जा रहा है। भोपाल स्थित हबीबगंज स्टेशन देश का पहला निजी रेलवे स्टेशन है और जल्दी ही 50 अन्य स्टेशन इस श्रेणी में शामिल हो जाएंगे। 

 
शुरुआती योजना 400 स्टेशनों का निजीकरण करने की थी। दो निजी तेजस ट्रेनों की संख्या बढ़ाकर 150 की जानी है। यह कोई मुश्किल काम नहीं है क्योंकि देश में रोज 7,000 यात्री ट्रेन चलती हैं। तेजस केवल नाम के लिए निजी ट्रेन है क्योंकि उनका परिचालन सरकारी कंपनी करती है। इसके अलावा परिवहन के अन्य तरीकों में निजी क्षेत्र का दबदबा आम है।  बंदरगाह और नौवहन, विमानतल और विमानन कंपनियां तथा यात्री बस और ट्रक सेवाएं इसका उदाहरण हैं। केवल रेलवे पर ही सरकार का एकाधिकार रहा। सरकारी या निजी स्वामित्व का मसला वैचारिक नहीं है बल्कि रेल परिचालन का निजीकरण अन्य तरह के परिवहन के निजीकरण से कहीं अधिक जटिल है। निश्चित तौर पर निजी रेल का इतिहास उतार-चढ़ाव वाला रहा है। 19वीं सदी के मध्य में भारतीय रेल का निर्माण और संचालन निजी कंपनियों द्वारा किया जाता था। वे ऐसा उस पूंजी से करती थीं जिस पर 5 फीसदी रिटर्न की गारंटी होती थी। दूसरी तरह देखें तो भारतीय करदाता ब्रिटेन को हर वर्ष अपने जीडीपी का 4 फीसदी तक कर देते थे जिसमें ज्यादातर हिस्सा रेलवे से था। परंतु 20वीं सदी के बाद के दिनों में जब शुरुआती निजी बिजली उत्पादन कंपनियों को गारंटीड रिटर्न की पेशकश की गई तो उस विवादित इतिहास को भुला दिया गया। 
 
उन्नीसवीं सदी के उत्तराद्र्घ में अमेरिका में जब पहली बार तट से तट तक रेल लाइन बिछाई गई तब उसके लिए जिस मुफ्त जमीन की पेशकश की गई थी उसका आकार बहुत बड़ा था। ब्रिटिश रेल का निजीकरण तो समकालीन उदाहरण है। मार्गे्रट थैचर द्वारा किया गया यह निजीकरण भी विवादों में रहा लेकिन जापान साझा रेल नेटवर्क पर आधा दर्जन से अधिक निजी रेलवे सिस्टम चलाता है। भारत ने कुछ वर्ष पहले निजी कंटेनर फ्रेट परिचालन की शुरुआत की थी लेकिन उसे ज्यादा कामयाबी नहीं मिल सकी। सन 1990 के दशक में रेलवे वर्कशॉप के निजीकरण का प्रस्ताव आया लेकिन ज्यादा नहीं टिका। इसके जोखिम और दिक्कतें एकदम स्पष्ट हैं। नई निजी ट्रेनों के साथ प्रतिस्पर्धा में रेल संचालन हितों के टकराव की वजह बनेगा और विवाद उत्पन्न होंगे। परंतु इन्हें हल करने के लिए कोई नियामकीय व्यवस्था प्रस्तावित नहीं है। 
 
निजी ट्रेनों के संभावित परिचालन वाले कई मार्गों पर पटरियों की क्षमता कमतर है। रेलवे माल वहन से होने वाली आय से यात्रियों को क्रॉस सब्सिडी देता है, ऐसे में व्यवहार्यता का प्रश्न भी उठेगा। खासकर ऐसे में जबकि हवाई किराया काफी कम रहता है। इन सबसे बढ़कर मौजूदा रेलवे और नया निजी ट्रेन परिचालन तभी सहजता से काम कर सकेगा जब वह सेवाओं के लिए उपयुक्त किराया वसूल करे। विमानतल के मामले में कुछ विमानन कंपनियों की शिकायत रही है कि उनसे हवाई अड्डे पर बहुत अधिक शुल्क वसूल किया जाता है। उनका कहना है कि ये हवाई अड्डे दुनिया में सर्वाधिक शुल्क वाले हैं। 
 
इस क्षेत्र में नियामक का सुझाव देने में संकोच किया जाता है क्योंकि दूरसंचार, विमानन आदि क्षेत्रों में नियामक का अनुभव संतोषजनक नहीं रहा। परंतु कोई विकल्प नहीं है। इन अनसुलझे मसलों और जटिलताओं को देखते हुए अच्छा है कि सरकार धीमी गति से आगे बढ़ रही है। 50 स्टेशनों और 150 ट्रेनों का अनुभव सबक की तरह होगा। इससे ऐसे नियम बनाने में सुविधा होगी जो निजी परिचालकों के खिलाफ भी न हों, जिन पर कोई आरोप भी नहीं लगे, सरकारी अंकेक्षक जिसकी आलोचना न करें और जो अदालती लड़ाइयों में न उलझे। नई ट्रेन तेज होनी चाहिए लेकिन निजीकरण की योजना धीमे और सुविचारित अंदाज में सामने रखी जानी चाहिए। 
Keyword: railway, station, track, train, telecom,,
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