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वैश्विक व्यापार जगत को कितना प्रभावित करेगा कोरोनावायरस

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  March 04, 2020

क्या भविष्य के आर्थिक इतिहासकार वर्ष 2020 के शुरुआती महीनों पर इस तरह नजर डालेंगे कि यही वह अवधि थी जब वैश्वीकरण की लहर के पिछडऩे की शुरुआत हुई? पिछले एक दशक के दौरान दुनिया भर के लोकप्रिय नेताओं की बातों और इस दौरान आए तकनीकी बदलाव ने निश्चित तौर पर यह बताया कि वैश्वीकरण पहले की तरह कारगर नहीं रहा। हाल के वर्षों में विश्व व्यापार घटा है लेकिन इस संबंध में शोर शराबा हकीकत से ज्यादा हुआ है। कई जगह शुल्क बढ़ाए जाने के बावजूद वैश्विक आपूर्ति शृंखला का पुनर्गठन नहीं हुआ है। कुछ कंपनियों ने चीन से दूरी बनाई है लेकिन मोटे तौर पर सब पहले जैसा है।

 
प्रश्न यह है कि क्या वुहान से फैला कोरोनावायरस सबकुछ बदल देगा। मनुष्यों पर इसका क्या और कितना असर होगा यह बताना मुश्किल है। सन 2009 के स्वाइन फ्लू की तरह यह दुनिया भर में हजारों लोगों की मौत का कारण भी बन सकता है या फिर हालात इससे खतरनाक भी हो सकते हैं। इससे आधी सदी पहले हॉन्गकॉन्ग फ्लू (हालांकि यह चीन से पनपा था) की तरह बहुत बड़ी तादाद में मौतें भी हो सकती हैं। हालांकि जानकारों के मुताबिक आने वाले समय में यह बीमारी इतनी खतरनाक नहीं रह जाएगी और लोगों में इसके प्रति प्रतिरक्षा तैयार हो जाएगी। 
 
ऐसे में कोरोनावायरस का सबसे बड़ा प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर हो सकता है क्योंकि वह चीन पर बहुत ज्यादा निर्भर है। चीन की अर्थव्यवस्था पर इसका स्पष्ट असर है। आधिकारिक आंकड़ों पर तो हमेशा सवाल उठाया जा सकता है लेकिन नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी द्वारा ली गई तस्वीरें भी चीन के औद्योगिक तथा अन्य प्रमुख इलाकों में पिछले आठ सप्ताह के दौरान नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषक तत्त्वों की मात्रा कम होने की गवाही देती हैं। लगभग इसी अवधि में यह वायरस वुहान से पूरे चीन में फैला। इससे करीब 2,500 लोगों की मौत हो गई। 
 
आठ से 10 सप्ताह का समय बहुत मायने रखता है। चीन की अधिकांश कंपनियों और फैक्टरियों ने 25 जनवरी को आरंभ चीनी नव वर्ष के पहले उत्पादन बंद कर दिया था। उस समय निकले शिपमेंट अब दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंच रहे होंगे। बंदरगाहों पर आवक पहले ही 20-30 फीसदी कम हो चुकी है। कंपनियों के पास आमतौर पर दो सप्ताह से एक महीने तक की इन्वेंटरी रहती है हालांकि चीन में अवकाश को देखते हुए जनवरी में ही भंडार एकत्रित कर लिया गया होगा। बहरहाल, जब तक मालवहन सहज नहीं होता, दुनिया भर की कंपनियों को कच्चे माल की कमी का सामना करना होगा। 
 
कार कंपनियां तो यह असर महसूस भी करने लगी हैं। याद रहे जो कंपनियां प्रत्यक्ष तौर पर चीन से नहीं जुड़ी हैं वे भी प्रभावित हो रही हैं। इसलिए क्योंकि उनके आपूर्तिकर्ता चीन के कच्चे माल पर निर्भर हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में आपूर्ति शृंखलाओं पर क्या असर होगा? कहने का अर्थ यह कि दुनिया के एक विशेष हिस्से में चिकित्सा आपदा के चलते तमाम कंपनियों का काम प्रभावित हो सकता है। सन 2002 में सार्स आपदा के बाद चीन दुनिया की फैक्टरी में तब्दील हो गया। ज्यादातर देशों को अनुमान तक नहीं है कि वे चीन पर किस कदर निर्भर हैं।
 
यहां तथ्य यह है कि अस्थिरता का ऐसी स्वास्थ्य आपात स्थिति से कोई संंबंध नहीं। अधिनायकवादी शासन व्यवस्था हमेशा भंगुर होती है। राजनीतिक अस्थिरता कभी भी सर उठा सकती है। चीन हाल के वर्षों में पुरानी अधिनायकवादी प्रणाली के शासन वाला रहा है। चीन ने मौजूदा नेतृत्व के पहले सामूहिक और कम अधिनायकवादी शासन का मॉडल क्यों अपनाया था, इसे समझने के लिए हमें चीन के अस्थिरतापूर्ण राजनीतिक इतिहास को ध्यान में रखना होगा। राजनीतिक अस्थिरता के कारण चीन की मुख्यभूमि की आर्थिक गतिविधियों और आपूर्ति में आया धीमापन एक बात है, राजनीतिक कारणों से ऐसा संभव है। उदाहरण के लिए सैन्य तनाव में इजाफा होने की स्थिति में यह कल्पना करना भी असंभव है कि शेष विश्व चीन की फैक्टरियों पर उसी तरह निर्भर रहेगा जैसे अभी है।
 
सन 2000 से बनी आपूर्ति शृंखला लागत कम करने और किफायत बढ़ाने में कामयाब रही है। इस मामले में दुनिया को जल्दी ही पता चल सकता है कि चीन की मुख्यभूमि के उत्पादन पर निर्भरता उसकी निर्भरता कितनी है और यह भी कि संकट के समय उसके पास बहुत सीमित विकल्प हैं। यही कारण है कि काफी संभव है कि जब तक चीन किसी तरह सुधार नहीं कर लेता है, वैश्वीकरण के इतिहासकार इस मौके को बड़े बदलाव वाले घटनाक्रम के रूप में देखेंगे। हो सकता है मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के नजरिये से और स्थानीय स्थिरता सुनिश्चित करने वाले नीति निर्माताओं की दृष्टि से कोई विकल्प न हो। परंतु क्या यह बात वैश्वीकरण के गणित को बदलने की हैसियत रखती है। जबकि उससे अपेक्षा की जाती है कि वह लागत को न्यूनतम करने और किफायत बढ़ाने का प्रयास करे। 
 
सच तो यही है कि कुछ विनिर्माण इकाइयों का चीन से विस्थापन इसलिए लंबित रहा क्योंकि किफायत का अभाव था और काफी राशि गंवाई जा चुकी थी। पर्ल रिवर डेल्टा और अन्य स्थानों पर बुनियादी ढांचे की कमी और ये दिक्कतें इतनी ज्यादा हैं कि क्लाइंट ने लागत में अहम इजाफे को बरदाश्त करना उचित समझा, बजाय कि अपनी आपूर्ति शृंखला को छेड़कर जोखिम पैदा करने के। अब उन्हें यह पता चल चुका है कि ऐसी उथलपुथल जीवन की हकीकत है। बल्कि जब यह उथलपुथल निर्भरता के साथ जुड़ जाए तो इसका प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है। सवाल यह है कि आगे चलकर यह निर्णय प्रक्रिया में किस हद तक बदलाव लाएगा। यदि चीन की फैक्टरियों में जल्दी ही पूरी क्षमता से काम शुरू नहीं हुआ तो काफी संभव है कि हमें अनुमान से बड़ा बदलाव देखने को मिले। 
Keyword: Corona virus, china, india, trade,,
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