बिजनेस स्टैंडर्ड - बड़े पैमाने पर परोपकार हो नियमन से मुक्त
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, October 30, 2020 10:53 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

बड़े पैमाने पर परोपकार हो नियमन से मुक्त

श्यामल मजूमदार /  March 04, 2020

भारत को बहुत बड़े पैमाने पर परोपकार की आवश्यकता है। आज देश के अमीर तबके के लोगों के पास ऐसा करने की पूरी गुंजाइश है। इस संबंध में जानकारी प्रदान कर रहे हैं श्यामल मजूमदार 

 
बताया जाता है कि आय कर विभाग ऐसे प्रावधानों पर जोर दे रहा है जिनके तहत सन 1973 के पहले कंपनियों में हिस्सेदारी रखने वाले परोपकारी संस्थानों को अपना ऐसा निवेश समेटना होगा। यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि कई हलकों में मान्यता है कि परोपकारी न्यास को अपने कर छूट के दर्जे का दुरुपयोग कंपनियों को नियंत्रित करने के लिए नहीं करना चाहिए।  परंतु यह गलत संदर्भ है। सवाल दरअसल यह होना चाहिए कि क्या अंशधारिता का मसला, इसका दायरा और फर्म के ऊपर नियंत्रण अथवा इन संस्थानों का उद्देश्य और इनका प्रदर्शन ऐसे नियंत्रण को प्रदर्शित करता है?
 
पूरा ध्यान और विधि निर्माण में इस बात पर दिया जाना चाहिए कि नियंत्रण का किस हद तक इस्तेमाल किया जा रहा है। क्या यह पूरी तरह स्वामित्व संस्था के लाभ के लिए है या फिर संगठन के समग्र कारोबारी लक्ष्य के लिए तथा समस्त संबद्घ अंशधारकों की समृद्घि के लिए?  जरा अंशधारिता के रुझान पर विचार कीजिए। भारत में कई ऐसी कंपनियां हैं जिनकी अंशधारिता का आधार विविधतापूर्ण है। उदाहरण के लिए एलऐंडटी। दूसरी ओर परिवार द्वारा चलाई जाने वाली कंपनियां भी हैं, मसलन टाटा संस। इन कंपनियों में बहुलांश स्वामित्व टाटा न्यास समूह का है और इसकी प्रमुख अंशधारिता वाली कंपनी है टाटा समूह। तीसरा प्रकार विदेशी कंपनी के नियंत्रण वाली अनुषंगी कंपनी का है, मसलन हिंदुस्तान यूनिलीवर। इन कंपनियों का प्रदर्शन और उद्देश्य यह नहीं दर्शाता कि कोई भी एक वर्ग इन संदर्भों में श्रेष्ठ या कमतर है। 
 
इसी तरह कई कंपनियां जिनमें तमाम तरह की अंशधारिता के रुझान रहते हैं, वे अच्छी तरह चल रही हैं। इनमें वे कंपनियां भी शामिल हैं जहां परोपकारी संस्थान अपनी अंशधारिता के प्रभाव से अहम भूमिका रखते हैं।  वास्तव में सरकार को समान कार्य परिस्थितियां प्रदान करने के बारे में विचार करना चाहिए। इसके लिए वह सन 1973 से पहले का दर्जा बहाल कर सकती है। उसके अधीन फाउंडेशन आय कर रियायत के साथ हिस्सेदारी रख सकते और अन्य फाउंडेशन भी टाटा और बिड़ला न्यास के समकक्ष हो पाते।
 
एक के बाद एक सरकारों ने यह इच्छा प्रकट की है कि कंपनियों को सामाजिक विकास योगदान की लागत को आक्रामक तरीके से साझा करना चाहिए। दरअसल कंपनियों द्वारा अपने मुनाफे का दो फीसदी हिस्सा कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व पर व्यय करना वांछित है। भारत को बहुत बड़े पैमाने पर परोपकार की आवश्यकता है। आज देश के अमीर तबके के लोगों के पास ऐसा करने की पूरी गुंजाइश है। उदाहरण के लिए अमेरिका में परोपकारी दान उसके जीडीपी का करीब दो फीसदी है। यदि भारत का कारोबारी जगत इसे अपनाता है तो यह राशि करीब 60 अरब डॉलर तक होगी। 
 
अन्य स्थानों की तरह भारतीय उद्यमी जगत भी अपनी संपत्ति की बहुत बड़ी हिस्सेदारी अन्य कंपनियों के शेयरों में निवेश करता है। प्रवर्तकों को अपनी हिस्सेदारी का बड़ा हिस्सा परोपकार में दान करने की इजाजत देकर और ऐसे परोपकारी संस्थानों को आय कर में रियायत प्रदान करने से सरकार को संपत्ति को सामाजिक कार्यों में स्थानांतरित करने के लक्ष्य को हासिल करने में सहायता मिलेगी।  टाटा और बिड़ला की तरह दुनिया के कुछ जानेमाने संगठन मसलन हाइनकेन, आइकिया, रॉबर्ट बॉस्क, काल्र्सबर्ग आदि का स्वामित्व भी फाउंडेशनों के पास है। वालेनबर्ग फाउंडेशन प्रत्यक्ष रूप से या निवेश फर्म के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से एबीबी, ऐस्ट्राजेनेका और एटलस कोपको आदि का स्वामित्व रखता है। 
 
यह विचार कि परोपकारी संस्थान कारोबार नहीं चला सकते, उस आकांक्षा के विपरीत है जिसके तहत कारोबारों को अधिकाधिक परोपकारी बनाने की बात कही जाती है। यह बात हमें भारत में सन 1970 के दशक के विचारों की ओर ले जाती है। आज यह बात पूरी तरह साबित हो चुकी है कि यह एक अतीतगामी कदम था। फाउंडेशनों को बिना आय कर रियायत गंवाए हिस्सेदारी रखने का निर्णय भी ऐसा ही एक निर्णय था। कारोबार में अविश्वास के चलते सरकार ने सन 1969 में एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम लागू किया और उसके बाद सन 1973 में विदेशी विनिमय नियमन अधिनियम भी। आखिरकार इनके चलते सन 1991 का संकट सामने आया और विनियमन हुआ। 
 
परंतु उस सकल अविश्वास ने कुछ हद तक विश्वास के लिए भी राह तैयार की। यानी अब वक्त आ गया है कि बड़े पैमाने पर होने वाली परोपकारिता को भी तिलांजलि दे दी जाए। सरकार सन 1973 के बाद के समय से भी सबक सीख सकती है। जब आईबीएम और कोक बाहर निकले, यूनीलीवर ने सरकार से इस विषय पर वार्ता शुरू की कि वह 51 फीसदी अंशधारिता को विराम बिंदु बना दे। उसने कहा कि ऐसा इस शर्त पर किया जाएग कि ऐसे बहुराष्ट्रीय निगम पिछड़े इलाकों के विकास के लिए तथा उच्च तकनीक वाले क्षेत्रों में काम करेंगे। 
 
जनता पार्टी सरकार ने शायद इसकी इजाजत भी दे दी होती (स्वर्गीय जॉर्ज फर्नांडिस उस सरकार में उद्योग मंत्री थे) लेकिन वह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। आखिरकार उसके बाद सत्ता में आई इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने इस प्रस्ताव को मंजूरी दी। 'उदारीकरण' शब्द का सबसे पहला इस्तेमाल उनकी सरकार के उद्योग मंत्री नारायण दत्त तिवारी ने किया था। कहने का तात्पर्य यह कि शायद मसला नियंत्रण के स्वरूप का नहीं बल्कि परिणामों की वास्तविकता का है। अगर हम टाटा ट्रस्ट का उदाहरण लें तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि टाटा संस में अपनी भागीदारी की मदद से उन्होंने कई नए कारोबार स्थापित करने में सहायता की। टाटा संस की अंशधारिता में ट्रस्ट की हिस्सेदारी दो तिहाई है। यानी यह संपत्ति सामाजिक उद्देेश्यों के लिए वर्गीकृत परिसंपत्ति समर्थन से एकत्रित हुई। ऐसे में सवाल यह उठता है कि जो चीज टूटी ही नहीं है, उसे ठीक करने की कोशिश ही क्यों करनी?
Keyword: company, CSR, social responsibility, income tax,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या एयर इंडिया के बोली नियमों में बदलाव से आकर्षित होंगे निवेशक?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.