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भारत-अमेरिका व्यापार के संदर्भ में बहुत कम सिद्धांत प्रासंगिक

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  March 03, 2020

डॉनल्ड ट्रंप की भारत यात्रा से दोनों पक्षों को कुछ लाभ हो सकते हैं, लेकिन क्या गतिरोध दूर होंगे? इसके  जवाब के लिए अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सिद्धांत पर नजर डालना जरूरी है। यह वर्ष 1945 के बाद अर्थशास्त्र में सबसे ज्यादा अनुसंधान वाले विषयों में से एक होता था। लेकिन 1970 के दशक में अमेरिकियों की सिद्धांतों में रुचि खत्म हो गई और उन्होंने बाजारों में पकड़ बनाने के लिए साम्राज्यवादी तरीके अपनाए। इसलिए आधुनिक अर्थशास्त्री केवल आकंड़ों का विश्लेषण करते हैं। आंकड़ों के उपयोग अवश्य हैं, विशेष रूप से रणनीति और कार्यनीतियों को दुरुस्त बनाने के लिए। लेकिन ये देशों के बीच व्यापार के पैटर्न की ठीक से व्याख्या नहीं करते हैं और न ही यह बताते हैं कि उन्हें अपने बीच व्यापार को कैसे देखना चाहिए। इसकी वजह यह है कि आर्थिक सिद्धांत स्थायी माने जाने वाले तर्क पर आधारित होते हैं। लेकिन आंकड़े बदलते रहते हैं। ये आज प्रासंगिक हैं, कल नहीं। इसलिए सिद्धांत की शिक्षाओं को भूलना बहुत बुद्धिमानी नहीं है। ऐसे बहुत कम सिद्धांत हैं, जो विशेष रूप से भारत-अमेरिका के संदर्भ में प्रासंगिक हैं। इनके बारे में पाठकों को जानकारी देना उचित है। 

 
सबसे पहला सिद्धांत डेविड रिकार्डो ने दिया, जिन्होंने कहा कि महज लाभदायी और वैश्विक प्रतिस्पर्धी उद्योग होना ही पर्याप्त नहीं है। उन्होंने कहा कि केवल सबसे अधिक प्रतिस्पर्धी यानी तकनीकी बढ़त वाले उद्योग होना बेहतर है क्योंकि एक सीमित अवधि में लाभप्रद लेकिन कम प्रतिस्पर्धी उद्योगों के बंद होने से होने वाला आर्थिक नुकसान कारोबार से मध्यम अवधि में प्राप्त होने वाले लाभ से अधिक होगा। बाद के अर्थशास्त्रियों ने इस सिद्धांत को खारिज करने की कोशिश की है। लेकिन यह काफी हद तक अब भी  सही है क्योंकि बहुत से उद्योगों के बंद होने से बेरोजगारी के राजनीतिक परिणामों को स्वीकार करना अहम है। जो देश इन नतीजों को स्वीकार करते हैं, वह अच्छा प्रदर्शन करता है। अमेरिका भी अब तक ऐसा करता आया है। भारत जैसे देशों का भी खराब प्रदर्शन नहीं रहा है। 
 
उसके बाद क्लासिक हेक्चर-ओहलिन सिद्धांत में महत्त्वपूर्ण बात कही गई है। इसने रिकार्डो के प्रतिस्पर्धी लाभ के सिद्धांत को आगे बढ़ाया। इसमें कहा गया कि देश उन उत्पादों का निर्यात करते हैं, जिनमें उनके उत्पादन के भरपूर और सस्ते संसाधनों का इस्तेमाल होता है और उन उत्पादों का आयात करते हैं, जिनमें देश के दुर्लभ संसाधनों का उपयोग होता है। यह साफ नजर आता है, लेकिन यह सफलता के लिए पूरी तरह मुक्त श्रम बाजारों पर निर्भर करता है। इसका मतलब है कि लोगों को कभी भी नियुक्त करने और कभी भी हटाने की प्रणाली को अपनाना है। चुनावी राजनीति इसे मुश्किल बना देती है, इसलिए वे यूरोपीय संघ जैसी कल्याणकारी नीतियों को अपनाते हैं। 
 
इसके बाद 1950 के दशक में वेसली नियोन्टिफ ने हेक्टर-ओहलिन सिद्धांत का परीक्षण किया और अपना लोकप्रिय विरोधाभास पेश किया। निर्यात आंकड़ों के विश्लेषण के बाद उन्होंने पाया कि अमेरिका श्रम संसाधन की अधिक जरूरत वाली चीजों का निर्यात कर रहा है, जहां श्रमिकों की किल्लत और पूंजी की बहुतायत वाला देश है। इसे लेकर आर्थिक क्षेत्र में तब तक चिंता बनी रही, जब तक किसी ने इसकी व्याख्या नहीं की। इसमें कहा गया कि कुशल श्रम भी पूंजी का एक प्रकार है। अब भारत भी इसका बड़ी मात्रा में निर्यात अमेरिका को करता है।  
 
तीसरा सिद्धांत 1941 में दिया गया। इसे स्टोलपर-सैमुअलसन सिद्धांत नाम दिया गया। इसमें कहा गया है कि अगर वाई के संदर्भ में एक्स की कीमत बढ़ती है तो एक्स के उत्पादन में सबसे ज्यादा इस्तेमाल साधन का वास्तविक प्रतिफल बढ़ेगा। इसका विपरीत भी होता है। कुछ साल बाद पॉल सैमुअलसन ने इस सिद्धांत को साधन कीमत समानीकरण सिद्धांत के रूप में फिर से पेश किया। इसमें कहा गया है कि अगर आप पूरी तरह सीमाओं को खोल देते हैं तो श्रम और पूंजी की लागत समान हो जाएगी। इसलिए आप देख सकते हैं कि क्यों राजनीति इसे रोकती है। अमेरिका में चीनी नाइयों या भारतीय सॉफ्टवेयर कर्मचारियों की किन्हें जरूरत है?
 
सैमुअलसन ने सिद्धांत दिया कि गैट का दायरा वस्तु एवं शुल्क में कमी से ज्यादा व्यापक होना चाहिए। इसे साम्यवाद के आकर्षण को मात देने के सबसे बेहतर तरीके के रूप में देखा गया। अब यह साफ हो जाना चाहिए कि इन सभी सिद्धांतों का सार यह है कि देश उन चीजों का निर्यात करते हैं, जिन्हें वे सस्ती लागत पर बना सकते हैं और उन चीजों का आयात करते हैं, जिनका वे सस्ती लागत पर नहीं बना सकते हैं। चीन की सफलता इन सिद्धांतों का सबूत है। इससे भारत की नाकामी का पता चलता है। 
 
ऐसे में अब अमेरिका किन चीजों का सस्ती दरों पर उत्पादन करता है और किसी उत्पाद में सबसे ज्यादा किस साधन का इस्तेमाल होता है? यह साधन डॉलर है। अगर कोई देश राजनीतिक रूप से स्वतंत्र है तो कारोबारी ताकत हमेशा उत्पादन के भरपूर कारकों से जुड़ी रहती है। इसलिए चीन में श्रम है और अमेरिका में डॉलर है और इन डॉलर के उत्पादन की तकनीक रिकार्डो का सिद्धांत है। दोनों देशों की मिलकर और अलग-अलग तगड़ी कारोबारी ताकत है। भारत में क्या भरपूर है? सही मायनों में कुछ भी नहीं। 
 
भारत के 99 फीसदी श्रमिक अद्र्ध-कुशल या अकुशल हैं, इसलिए इस साधन की बहुतायत का कोई फायदा नहीं है। वहीं देश में जो थोड़े-बहुत कुशल श्रमिक हैं, उनका यह निर्यात करता है। इससे न डॉलर की बहुत अधिक आमदनी होती है और न ही तकनीक खरीद की क्षमता पैदा होती है। इस तरह भारत लाभप्रद कारोबार की हर आवश्यक शर्त पर खरा नहीं उतरता है। यही वजह है कि भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यापार को उपनिवेशवादी शोषण के रूप में देखने के वाम अर्थशास्त्र के प्रभावों को दूर करने के लिए नियो क्लासिकल व्यापार सिद्धांत में एक रिफ्रेशर कोर्स की जरूरत है। 
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