बिजनेस स्टैंडर्ड - देश में ऊर्जा सुरक्षा का बदलता परिदृश्य
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देश में ऊर्जा सुरक्षा का बदलता परिदृश्य

अरुणाभ घोष /  March 03, 2020

ऊर्जा सुरक्षा की बात करें तो या तो पुरानी चिंताओं में नई जटिलताएं आई हैं या फिर ऊर्जा क्षेत्र में आ रहे बदलाव से जुड़ी नई चिंताएं उभर रही हैं। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रहे हैं अरुणाभ घोष

 
देश की अर्थव्यवस्था का आकार 5 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंचाने की बात की जा रही है। ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा एक बहुत बड़ी चिंता है। देश में ऊर्जा सुरक्षा का परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। देश में ऊर्जा सुरक्षा अहम संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता पर निर्भर करती है। इन संसाधनों की कीमत भी कम और अनुमान के अनुरूप होनी चाहिए ताकि आपूर्ति क्षेत्र में कोई बाधा न हो। ऐसा इसलिए ताकि पर्यावरण और भविष्य की पीढिय़ों के लिए स्थायित्व सुनिश्चित किया जाए। इसके आयामों की बात करें तो या तो पुरानी चिंताओं से संबंधित नई जटिलताएं सामने आ रही हैं या फिर ऊर्जा बदलाव के क्षेत्र में नई चिंताएं उभर रही हैं।
 
पहली बात, आपूर्ति की सुरक्षा ऊर्जा के स्थानांतरण, भूराजनीति आदि से प्रभावित होती है। भारत अपनी आवश्यकता के तेल का 84 फीसदी आयात करता है। सन 2022 तक तेल आयात पर निर्भरता घटाकर 67 फीसदी करने के लक्ष्य के बावजूद इसमें इजाफा हो रहा है। साल दर साल आपूर्ति बदलने से विश्वसनीयता पर असर होता है। सन 2015 के ईरान परमाणु समझौते के पहले भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ता थे सऊदी अरब, इराक, नाइजीरिया और वेनेजुएला। वर्ष 2016 से ईरान तीन शीर्ष आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया था लेकिन अब वह एक बार फिर नीचे फिसल गया है। यदि अमेरिका और इराक के बीच का तनाव बढ़ता है तो तेल आपूर्ति के एक और बड़े स्रोत के लिए जोखिम उत्पन्न हो जाएगा।
 
इस बीच 2017 में पहली बार अमेरिकी कच्चा तेल भारत पहुंचा। वह पहले ही छठा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन चुका है। हालांकि चालू वर्ष में इराक के 25 फीसदी की तुलना में उसकी हिस्सेदारी केवल 5.7 फीसदी रही। खबरों के मुताबिक भारत रूस के सुदूर पूर्व क्षेत्र से कच्चे तेल का आयात बढ़ाने के लिए लंबी अवधि के अनुबंध पर काम कर रहा है। इसके बावजूद पश्चिम एशिया मध्यम अवधि में अहम बना रहेगा। नवंबर तक इस क्षेत्र ने भारत के तेल आयात में 55 फीसदी हिस्सेदारी की। दुनिया का सबसे बड़ा तेल आयातक चीन इस क्षेत्र पर महज 43 फीसदी निर्भरता रखता है। विविधता अपनाने के तमाम प्रयासों के बावजूद इस क्षेत्र की घटनाएं सरदर्द साबित होती हैं।
 
तेल कीमतें और उनका अनुमानित होना भी एक चुनौती है क्योंकि अतीत में तेल आयात बिल में काफी अनिश्चितता देखने को मिली है। इस अनिश्चितता के कारण जीवाश्म ईंधन सब्सिडी या कर राजस्व बजट का निर्धारण करना मुश्किल होता है। वित्त वर्ष 2015 में जीवाश्म ईंधन सब्सिडी बिल 16.8 अरब डॉलर और वित्त वर्ष 2018 में 9.4 अरब डॉलर था। ऐसे उतार-चढ़ाव औद्योगिक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करते हैं। खासतौर पर उस समय जबकि कच्चे माल की लागत में ऊर्जा की हिस्सेदारी अधिक हो। आयातित गैस कीमतें एक और पहलू शामिल करती हैं। गैस की अधिकता के  कारण एशिया में हाजिर बाजार कीमतें 4 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (एमएमबीटीयू) हो गई हैं। भारत पूर्व अनुबंध के मुताबिक कतर से 85 लाख मिलियन टन गैस 9-10 डॉलर प्रति एमएमबीटीयू की दर पर लेने को बाध्य है। ऐसे में सौदे की शर्तों पर नए सिरे से चर्चा की बात हो रही है। पेट्रोनेट अमेरिकी कंपनी में इक्विटी हिस्सेदारी ले सकती है, ऐसे में टेलूरियन को कम दरों पर 50 लाख टन गैस मिल सकती है। यह कीमत तय करेगी कि भारत की अर्थव्यवस्था किस हद तक गैस आधारित होगी।
 
तीसरा, ऊर्जा सुरक्षा के लिए सुरक्षित रास्ता तैयार करने में समुद्री सुरक्षा सहयोग की अहम भूमिका है। भविष्य में इसमें स्थिरता और सीमा पार बिजली ग्रिड की सुरक्षा भी शामिल हो सकती है, बशर्ते कि हम सीमा पार बिजली कारोबार शुरू करें। एक एशियाई सुपरग्रिड को लेकर भारी चर्चा चलती रही है। इसकी अपनी अलग तकनीकी और राजनीतिक चुनौतियां और निहितार्थ हैं। आपूर्ति बाधा कम करने के लिए भारत सामरिक तेल रिजर्व में निवेश करता रहा है। हालांकि सुरक्षित भंडारण की हमारी समझ व्यापक जमीनी बातों से अलग है। बैटरी तकनीक का उदय मौजूद विकल्पों को कई तरह से प्रभावित करेगा। आर्थिक तंत्र के विद्युतीकरण की गति इससे ही निर्धारित होगी। खासतौर पर लाखों सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रम जिनके लिए बिजली की खराब गुणवत्ता चिंता का प्रमुख विषय है। ऊर्जा भंडारण, बिजली के मिश्रण में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी को भी प्रभावित करेगा। हाल में सौर ऊर्जा और भंडारण की सफल बोली की दर ताप बिजली के साथ प्रतिस्पर्धी रही जो उत्साहवर्धक है। वैकल्पिक इलेक्ट्रोकेमिकल बैटरी केमिस्ट्री पर इस बात का असर होगा कि हम वितरित बिजली पर कितना भरोसा कर सकते हैं और ग्रिड आधारित व्यवस्था को कितनी मजबूती प्रदान कर सकते हैं। सामरिक तेल रिजर्व के अलावा भारत को चक्रीय अर्थव्यवस्था और उन अहम खनिजों के सामरिक रिजर्व के बारे में गंभीरता से विचार करना होगा जो विभिन्न ऊर्जा भंडारण कामों में इस्तेमाल किए जाते हैं। 
 
ऊर्जा में बदलाव चौथी तरह के जोखिम सामने लाता है जिन्हें वित्तीय रूप से फंसी हुई परिसंपत्ति कहा जा सकता है। जलवायु परिवर्तन से लडऩे के प्रयास कंपनियों की बैलेंस शीट पर जीवाश्म ईंधन भंडार के मूल्य को लेकर संदेह उत्पन्न करते हैं। फाइनैंशियल टाइम्स के मुताबिक तापमान में दो डिग्री सेल्सियस का इजाफा होने की स्थिति में सरकारी तेल कंपनियों का करीब आधा भंडार बेकार हो जाएगा। कई तेल निर्यातक कंपनियों पर इसका बहुत बुरा असर होगा। उस स्थिति में 13 बड़ी अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियों को 360 अरब डॉलर मूल्य का नुकसान होगा।
 
दुनिया के बड़े निवेशक इस बदलती हकीकत को आकार दे रहे हैं। दिसंबर में 631 गैर अमेरिकी निवेशक जिनके पास 37 लाख करोड़ डॉलर की संपत्ति थी, ने सरकार से कहा कि वह जलवायु संबंधी कदमों को गति दे। गत माह 7 लाख करोड़ डॉलर की सबसे बड़ी परिसंपत्ति प्रबंधक कंपनी ब्लैकरॉक ने कहा कि वह उच्च स्थायी जोखिम वाले निवेश से बाहर निकलेगी। कोयले के साथ ज्यादा जोखिम है। मौजूदा कोयला भंडार का बमुश्किल चौथाई हिस्सा दो डिग्री सेल्सियस वाली परिस्थिति में जलाया जा सकता है। सन 2011 से अब तक कोयला खनन कंपनियों के मूल्य में 74 प्रतिशत की गिरावट आई है। कोयला उत्पादन बढ़ाने की घोषणाओं के बीच भारत को फंसी परिसंपत्ति के जोखिम का आकलन करना होगा। ऐतिहासिक रूप से देखें तो ऊर्जा सुरक्षा तकनीक, आर्थिकी या भूराजनीति से प्रभावित हुई है। अब इन सभी मोर्चों पर बदलाव हो रहे हैं। ऊर्जा की मांग भी पश्चिम से पूर्व की ओर स्थानांतरित हो रही है। पुरानी चिंताएं और नई समस्याएं घुलमिल गई हैं। भारत को आगे रहने की तैयारी रखनी होगी।
 
(लेखक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवॉयरनमेंट ऐंड वाटर के सीईओ हैं)
Keyword: power, electric, economy, fuel oil,,
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