बिजनेस स्टैंडर्ड - कृषि जिंसों पर कोरोनावायरस की मार
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कृषि जिंसों पर कोरोनावायरस की मार

दिलीप कुमार झा /  03 03, 2020


पहले चीन-अमेरिका व्यापार युद्घ और फिर कोरोनावायरस की मार ने कृषि जिंसों के दाम औंधे कर दिए हैं, लेकिन हालत सुधरते ही कीमतें एक बार फिर उछाल मार सकती हैं



ची न के बड़े कारोबारी शहरों में जैसे-जैसे कोरोनावायरस का प्रकोप बढ़ा वैसे-वैसे ही कृषि जिंसों के वैश्विक व्यापार को झटके लगने लगे। चीन खपत होने वाली प्रमुख वस्तुओं और औद्योगिक कृषि उत्पादों का सबसे बड़ा उत्पादक भी है और उपभोक्ता भी। लेकिन घातक कोरोनावायरस का प्रसार रोकने के लिए अग्रणी कारोबारी संघों ने चीन के साथ अपने व्यापारिक रिश्ते तोड़ लिए हैं। लेकिन जानलेवा कोरोना वायरस वैश्विक कृषि व्यापार को पहले ही काफी चोट लगा चुका है। चीन के प्रमुख कारोबारी शहर वुहान में इस वायरस का शुरुआती विस्फोट होने के बाद के कुछ हफ्तों में ही भारत में अधिकांश कृषि जिंसों की कीमतें 10 से 15 फीसदी तक गिर चुकी हैं। सोयाबीन, हल्दी और ग्वार गम जैसी जिंसों के दाम कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के अनुपात में पहले ही गिर चुके हैं। अधिकांश कृषि अर्थशास्त्रियों को लगता है कि चीन के साथ वैश्विक कारोबारी रिश्ते तोडऩे की वजह से कीमतों में यह गिरावट एक महीना पहले ही शुरू हो गई थी। चीन के साथ सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े किसी भी दो देशों के बीच औद्योगिक एवं कृषि जिंसों के आयात एवं निर्यात पर रोक लगाने का भी कीमतों पर असर पड़ा है।
केडिया कमोडिटी के प्रबंध निदेशक अजय केडिया कहते हैं, 'हम अनुमान लगा रहे थे कि इनमें से अधिकांश कृषि जिंसों की कीमतें मार्च में रबी फसलों की उपज की आवक चरम पर होने से घट जाएंगी। लेकिन इस समय चीन के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पूछ-परख या ऑर्डर नहीं आने से निर्यात कारोबार लगभग ठप हो चुका है। हाल के समय में सभी कृषि जिंसों के भाव में तेज
गिरावट आई है।' भारत में कृषि जिंसों को पिछले दो साल से लगातार मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। मॉनसून की शुरुआत में बारिश न होने का सिलसिला 2017 से लेकर 2018 तक चला था और फिर 2019 में बारिश जरूरत से ज्यादा ही हो गई। इसके अलावा मॉनसून के दौरान बारिश के असमान वितरण ने भी पिछले दो फसल सत्रों में कृषि उपज पर गहरा असर डाला है। वर्ष 2018 में बारिश की किल्लत होने पर उपभोक्ताओं को पूरे साल कृषि जिंसों के दाम में तीव्र वृद्धि का सामना करना पड़ा था। इसी तरह 2019 के खरीफ सत्र में भी लगभग सभी उत्पादक राज्यों में भारी बारिश के के कारण बाढ़ आने से फसलों को काफी नुकसान हुआ था जिसकी वजह से अधिकांश कृषि उत्पादों के भाव चढ़ गए थे। असल में, कृषि जिंसों की बढ़ी कीमतों ने खाद्य मुद्रास्फीति को भी तेज किए रखा। यह सिलसिला 2020 की शुरुआत तक बना रहा। माना जा रहा है कि कृषि जिंसों के भाव गिरने से खाद्य उत्पादों की महंगाई दर में कमी आएगी।
खाद्यान्न की कीमतें बढ़ीं
जनवरी में वैश्विक खाद्य कीमतें लगातार चौथे महीने बढ़त पर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) का खाद्य कीमत सूचकांक जनवरी में औसतन 182.5 अंक रहा जो दिसंबर से 0.7 अंक और जनवरी 2019 की तुलना में 11.3 फीसदी अधिक था। खाद्य तेल, चीनी और गेहूं की कीमतों में वृद्धि को सूचकांक में आई तेजी के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार माना गया। एफएओ का यह सूचकांक सामान्य तौर पर खरीदी-बेची जाने वाली खाद्य जिंसों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आए मासिक बदलावों को दर्ज करता है। एफएओ का खाद्य तेल कीमत सूचकांक भी जनवरी में सात फीसदी तक बढ़कर तीन वर्षों के उच्चतम स्तर तक जा पहुंचा। इसके लिए पाम, सोया, सूर्यमुखी और रेपसीड तेलों के भाव में वृद्धि जिम्मेदार रही। हालांकि जनवरी के दूसरे पखवाड़े में खाद्य तेलों के भाव में तेजी का रुख नरम पड़ गया। इस नरमी के पीछे वैश्विक कारोबार को लेकर अनिश्चितता पैदा होने, कोरोनावायरस के फैलाव की आशंका और भारत एवं मलेशिया के बीच व्यापारिक तनाव का असर रहा।
जनवरी में चीनी मूल्य सूचकांक में 5.5 फीसदी की तेजी दर्ज की गई जिसके लिए कई बड़े चीनी उत्पादक देशों में चीनी की पैदावार कम होने की आशंका जिम्मेदार रही। मगर ब्राजील की मुद्रा में जारी कमजोरी और कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया गिरावट ने भी चीनी की वैश्विक कीमतों में नरमी लाने का काम किया। जनवरी महीने में अनाज मूल्य सूचकांक भी दिसंबर की तुलना में 2.9 फीसदी चढ़ गया। इसके लिए कई देशों में मजबूत मांग होने और गेहूं, मक्का तथा चावल जैसे अनाजों की खरीद बढऩे से कीमतों में आई तेजी को कारण बताया गया। विदेशों से मक्खन, चीज़ और स्किम्ड मिल्क पाउडर की तगड़ी मांग आने के कारण डेयरी मूल्य सूचकांक भी 0.9 फीसदी चढ़ गया था।
इस बीच एफएओ ने 2019 में वैश्विक अनाज उत्पादन के लिए नया पूर्वानुमान भी जारी किया है जिसके मुताबिक दुनिया भर में 271.5 करोड़ टन अनाज पैदा होने का अनुमान है जो एक साल पहले की तुलना में 2.3 फीसदी अधिक है। इसी के साथ एफएओ ने यह भी कहा है कि 2019-20 में वैश्विक स्तर पर अनाज उपभोग 1.2 फीसदी बढ़कर 271.4 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। यह पूर्वानुमान खान-पान में मक्के के उपयोग पर अमेरिकी सरकार के आकलन से मेल ही खाता है। अनुमान है कि वर्ष 2020 में फसल सत्र पूरा होने पर वैश्विक अनाज भंडार 86.33 करोड़ टन रह सकता है जो शुरुआती स्तरों से थोड़ा कम है। इस वजह से वैश्विक अनाज के भंडार एवं उपयोग का अनुपात 30.9 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया है जो पिछले पैमानों को देखते हुए सजह स्तर है। वर्ष 2019-20 में अनाज का वैश्विक व्यापार 2.3 फीसदी बढ़कर 42.02 करोड़ टन रहने की संभावना जताई गई है जो दूसरा उच्चतम स्तर है। इसके पीछे यूरोपीय देशों और यूक्रेन से एशियाई देशों को भेजी जाने वाली गेहूं की खेप बढऩे का असर बताया जा रहा है।

अनिश्चितता गहराई
दुनिया भर में कोरोनावायरस को लेकर फैली हुई आशंका के कारण अनिश्चितता का माहौल देखा जा रहा है। हालांकि इस खतरनाक वायरस के प्रसार को रोकने में चीन की सरकार के प्रयास और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की गंभीरता ने सारी दुनिया को इसे लेकर खासा सतर्क कर दिया है। विशेषज्ञों को लगता है कि कोरोनावायरस की समस्या पर जल्द ही काबू पा लिया जाएगा।
कोरोनावायरस की समस्या पर काबू पाने के बाद दुनिया भर में व्यापार में आई कमी की भरपाई के लिए कृषि जिंसों के दोबारा भंडारण पर जोर दिया जाएगा। इसका मतलब है कि निर्यात मांग आने के साथ घरेलू मांग में भी अचानक उछाल देखी जाएगी। ऐसा होने पर कृषि जिंसों की कीमतें फिर से रफ्तार पकडऩे लगेंगी।
केडिया कमोडिटी के केडिया कहते हैं, 'शुरुआत में हमने सोचा था कि कृषि जिंसों की कीमतें इस सत्र में कमजोर पैदावार के चलते मजबूत बनी रहेंगी। लेकिन जिंसों की कीमतें कम होने पर वे अपेक्षा से कहीं पहले वापसी कर पाएंगे।'
इस साल भारत में कृषि जिंसों की पैदावार अधिक रहने की उम्मीद है, लेकिन वह पिछले साल की तुलना में कम होगी। हालांकि इस साल  फसलों के बुआई के रकबे में कमी आई है लेकिन उनकी प्रति एकड़ उपज बेहतर होने से कुल पैदावार में बढ़त की संभावना है। इसके अलावा बेहतर मॉनसूनी बारिश से मिट्टïी में नमी के उच्च स्तर ने किसानों को इस साल एक साथ कई फसलें उगाने के लिए प्रोत्साहित किया है। इस वजह से इस
साल कुल कृषि पैदावार में खासी वृद्धि देखी जा सकती है।
इसके साथ ही फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि होने के बाद कृषि जिंसों की कीमतें इस साल ऊंचे स्तर पर ही बने रहने की संभावना है।
बिजनेस स्टैंडर्ड कृषि जिंसों पर कोरोनावायरस की मार

 

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