बिजनेस स्टैंडर्ड - महंगाई के दौर में सस्ते घर पर टिकी नज़र
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महंगाई के दौर में सस्ते घर पर टिकी नज़र

सुशील मिश्र /  03 03, 2020


मुंबई महानगर में लक्जरी के बजाय किफायती मकानों का दौर चल रहा है और डेवलपर भी कीमत बढ़ाने से गुरेज कर रहे हैं। मंदी के दौर में सभी का जोर सस्ते मकान देने पर है

आर्थिक मंदी के बावजूद पिछले कुछ महीनों से रियल एस्टेट सेक्टर में सुधार देखने को मिला है। पिछले साल घरों की कीमतों में गिरावट आई या फिर वे काफी हद तक स्थिर बनी रहीं। मंदी में फंसी रियल एस्टेट की गाड़ी को रफ्तार देने की कोशिश सरकार भी कर रही है। खरीदारों के बदले रुख को भांपते हुए अब डेवलपरों और निवेशकों की भी नजरें सस्ते किफायती घरों पर हैं। मांग में सुधार की आहट से डेवलपर पहले से चल रही परियोजनाओं को पूरा करने के साथ साथ नई परियोजनाएं भी लेकर आ रहे हैं। आर्थिक तंगी का सामना कर रहे बिल्डर फिलहाल घरों की कीमतें बढ़ाने का जोखिम मोल लेना नहीं चाह रहे हैं। इसलिए घर खरीदारों और निवेशकों के लिए सस्ती आवासीय परियोजनाओं में पैसा लगाने का यह अच्छा अवसर माना जा रहा है।
बढ़ती शहरी आबादी, बढ़ती कीमतें और शहर में सस्ते लैंडबैंक के अभाव से आवास की मांग और आपूर्ति के अंतर को जानना मुश्किल हो गया है। समाधान के रूप में, डेवलपर उपनगरीय क्षेत्रों की तरफ रुख कर रहे हैं और इन्हीं इलाकों की परियोजनाओं में खरीदारों व निवेशकों की दिलचस्पी भी देखने को मिल रही है। डेवलपर किफायती आवास परियोजनाओं पर ही ध्यान दे रहे हैं, क्योंकि यही वह क्षेत्र है जो मंदी के बावजूद रफ्तार पकड़ रहा है। बिल्डर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रवक्ता आनंद गुप्ता कहते हैं कि रियल एस्टेट सेक्टर अभी भी अपने बुरे दौर से गुजर रहा है। सरकार द्वारा किए गए उपाय नाकाफी हैं। सरकार यह तो चाहती है कि अर्थव्यवस्था में सुधार आए और इसके लिए रियल एस्टेट सेक्टर में तेजी आनी जारी है, लेकिन इस संबंध में जरूरी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। मुंबई महानगरीय क्षेत्र में पिछले छह महीनों में मांग और कीमत की बात की जाए तो लक्जरी परियोजनाओं के फ्लैटों की कीमत करीब 10 फीसदी और किफायती मकानों की कीमतें करीब पांच फीसदी नीचे आई हैं।
गुप्ता कहते हैं कि पिछले कुछ महीनों से हालात में थोड़ा सुधार दिख रहा है, लेकिन वह किफायती और मुंबई से बाहर की परियोजनाओं में है। 45 लाख रुपये से कम कीमत वाले मकानों की मांग में सुधार हुआ है, लोग घर खरीदना चाह रहे हैं, लेकिन उनका बजट उन्हें रोक रहा है। इस सेक्टर में सुधार के लिए सरकार को बैंकों की नीति लचीली बनानी होगी, साथ ही एनबीएफसी उद्योग में सुधार लाना होगा। निवेशकों के मन में भय बना हुआ, इसलिए वे रियल एस्टेट से दूरी बनाए हुए हैं। लेकिन यह समय निवेश के लिए बेहतर है। रेरा जैसे कानून की वजह से अब धोखाधड़ी होना आसान नहीं रह गया है। मुंबई सहित पूरे राज्य में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अगले छह महीनों में बहुत कुछ बदलाव होने वाला नहीं है यानी कीमतें लगभग स्थिर रह सकती हैं।

कीमतों में ज्यादा तेजी नहीं
तेजी से विकास कर रहे मीरा रोड, नायगांव, विरार, पालघर, कल्याण, बदलापुर जैसे उपनगरीय इलाकों में सीमित प्रतिस्पर्धा के कारण रियल एस्टेट कंपनियों को अब तमाम कारणों से सस्ती आवासीय श्रेणी में अधिक संभावनाएं दिख रही हैं। आईएमसी के अध्यक्ष एवं आशीष रियल्टी के प्रबंध निदेशक आशीष वैद्य कहते हैं कि देश के अन्य महानगरों के मुकाबले मुंबई में कहीं अधिक झुग्गी-झोपडिय़ां हैं और इससे खुद ग्राहक बेहतर आधुनिक आवास के लिए प्रेरित होते हैं। इसके अलावा नौकरीपेशा युवा वर्ग भी अपना आशियाना चाहता है, लेकिन इन सबका बजट एक करोड़ रुपये के अंदर का है। इस समय सबसे ज्यादा 40 से 60 लाख रुपये के बीच कीमत वाले घरों की मांग है और इनके लिए खरीदारों की भी कमी नहीं है। वैद्य के मुताबिक रियल्टी का बुरा दौर खत्म हो रहा है, मांग में सुधार हो रहा है, लेकिन कीमतों में फिलहाल बहुत तेजी नहीं दिख रही है। अगले छह महीनों तक घरों की औसत कीमतें लगभग स्थिर रहने का अनुमान है।
पिछले साल तक बाजार में कई दिक्कतें थीं, लेकिन धीरे धीरे हालात में सुधार आ रहा है। बिक्री और कीमत में भी कई जगह सुधार देखने को मिला है। हीरानंदानी गु्रप के प्रबंध निदेशक और नारेडको के अध्यक्ष निरंजन हीरानंदानी कहते हैं कि 90 फीसदी सस्ती आवासीय परियोजनाएं मुंबई, पुणे, बेंगलूरु और चेन्नई जैसे महानगरों के आसपास हैं। किफायती आवास क्षेत्र काफी बेहतर प्रदर्शन कर रहा है क्योंकि सस्ते आवास के लिए जीएसटी की दर महज 1 फीसदी है। इसके अलावा उसे ब्याज में छूट और कम स्टांप शुल्क का फायदा भी मिलता है। जानकारों का कहना है कि सस्ते आवास पर अधिक मार्जिन देखकर भी डेवलपर इस ओर आकर्षित हो रहे हैं।
कर्ज मिले तो बात बढ़े
मुंबई और आसपास के इलाकों में म्हाडा और झोपड़पट्टी पुनर्वसन प्राधिकरण (एसआरए) द्वारा कई परियोजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण इन परियोजनाओं के पूरी होने में समय लग रहा है। महाराष्टï्र में आर्थिक तंगी के कारण वर्षों से अटकी पड़ी गृहनिर्माण परियोजनाएं जल्द पूरी की जाएंगी। राज्य सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के प्रयास शुरू किए हैं। गृह निर्माण करने वाली सरकारी संस्था म्हाडा अगले तीन साल में पांच लाख घरों का निर्माण करने वाली है। राज्य में अटकी परियोजनाओं को जल्द पूरा कराने के लिए राज्य सरकार ने कर्ज दिलाने के लिए बैंकों पर दबाव बनाना शुरु कर दिया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अधिकारियों से मिलकर आर्थिक सहायता (कर्ज) देने का आदेश दिया है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि आम लोगों के घर का सपना पूरा हो, इसके लिए सरकार प्रयासरत है। इसलिए घरों के निर्माण में तेजी लाना जरूरी है जिसके लिए परियोजनाओं को कर्ज मिलना आवश्यक है। यह ऐसा क्षेत्र है जहां राज्य के आर्थिक विकास को गति मिलने के साथ रोजगार के अवसर भी पैदा होते हैं। इसलिए राज्य सरकार इस क्षेत्र के विकास के लिए प्रयास कर रही है। मुख्यमंत्री के आदेश के बाद बैंकों के प्रतिनिधियों ने महाराष्ट्र गृहनिर्माण और क्षेत्र विकास प्राधिकरण द्वारा शुरू की गई परियोजनाओं को कोष उपलब्ध कराने का वादा किया है।
रियल एस्टेट के साथ बैंक और एनबीएफसी की भी हालात ज्यादा बेहतर नहीं है। सरकारी दबाव के बावजूद बैंक जांच परख कर कर्ज दे रहे हैं। हालांकि पहले से अब काफी सुधार आया है। देश में चल रही रियल एस्टेट परियोजनाओं में सबसे ज्यादा भरोसेमंद परियोजनाएं मुंबई महानगर क्षेत्र में चल रही हैं, इसलिए बैंकों ने इनको सबसे ज्यादा कर्ज दिया। एनारॉक कैपिटल के प्रबंध निदेशक शोभित अग्रवाल के अनुसार मुंबई महानगरीय इलाके के डेवलपरों को परियोजनाएं पूरी करने के लिए 3,500 करोड़ डॉलर का कर्ज मंजूर हुआ है जिसमें से 870 करोड़ डॉलर (25 फीसदी) की रकम बिल्डर परियोजनाओं में लगा भी चुके हैं। पुणे में चल रही परियोजनाओं को भी बैंक और एनबीएफसी से कर्ज मिलने लगा है। दरअसल, केंद्र और राज्य सरकारें बैंकों पर दबाव बना रही हैं कि वह अटकी परियोजनाओं को पूरा करने में बिल्डरों की मदद करें। एनबीएफसी क्षेत्र से बैंकों को कर्ज मुहैया कराने वाली संस्थाओं का कहना है कि पिछले छह महीनों से बैंकों के रुख में बदलाव आना शुरू हुआ है, जिसकी सबसे बड़ी वजह रेरा है। जिन परियोजनाओं के कागजात सही हैं उन्हे कर्ज मिल रहा है, लेकिन बैंक अभी भी कागजात के साथ जमीनी हकीकत देखकर ही मंजूर किए गए कर्ज की रकम दे रहे हैं।

किफायती मकानों की चाह 
आवासीय परियोजनाओं की मांग, आपूर्ति और कीमत के बारे में जानकारों का कहना है कि सरकार सबको घर देने के वादे को पूरा करने चाहती है तो घरों की कीमतों पर लगाम लगानी होगी। के्रडाई का कहना है कि यदि वर्ष 2022 तक सबको आवास उपलब्ध कराना है तो सरकार को अफोर्डेबल हाउस की परिभाषा बदलनी चाहिए, ताकि सरकार इस सपने को साकार कर सके। रियल एस्टेट क्षेत्र को उद्योग का दर्जा देने की मांग पुरानी है, लेकिन अभी तक उसे यह दर्जा नहीं मिला है। यदि इस क्षेत्र को उद्योग का दर्जा मिल जाए तो इसे भी अन्य क्षेत्र की तरह वित्तीय समस्याओं का सामना नही करना पड़ेगा। पूरे देश में रेरा लागू हो चुका है जिसके कारण रियल एस्टेट उद्योग में पारदर्शिता आई है। अब इसका फायदा ग्राहकों को मिल रहा है। इस समय रेरा ने महानगरों में 60 वर्ग मीटर के कारपेट एरिया वाले मकानों को जबकि अन्य जगहों पर 90 वर्ग मीटर के कारपेट एरिया के मकानों को 'अफोर्डेबल हाउसÓ का दर्जा दिया है। अगर सरकार इस नियम में बदलाव करती है तो इसका फायदा हर घर खरीदार को मिल सकेगा और डेवलपर को भी फायदा होगा।
संकट से जूझ रहे रियल एस्टेट क्षेत्र को राहत देने के लिए बजट और भारतीय रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति में कदम उठाए हैं। बजट में उन हालात में खरीदारों और विक्रेताओं को राहत दी गई है जब रियल एस्टेट सौदे के लिए घोषित कीमत सर्किल दर की तुलना में कम हो। शुरू में, यदि यह घोषित कीमत सर्किल दर की तुलना में 5 प्रतिशत से ज्यादा कम होती थी, तो इस अंतर पर खरीदार और विक्रेता दोनों पर कर लगता था। अब यह अंतर 10 प्रतिशत के पार होने की स्थिति में कर लगेगा। सर्किल दर वह न्यूनतम दर है जिस पर रियल एस्टेट सौदे को पंजीकृत कराया जा सकता है। यह दर राज्य सरकार के राजस्व विभाग द्वारा निर्धारित की जाती है। रिजर्व बैंक ने वाणिज्यिक रियल एस्टेट क्षेत्र के लिए परियोजना ऋण के वाणिज्यिक परिचालन (डीसीसीओ) को शुरू करने की तारीख को एक साल और बढ़ा दिया है, जिसका फायदा परियोजनाओं को मिलेगा।
इसके अलावा हाल में सरकार ने रियल एस्टेट क्षेत्र को रफ्तार देने के लिए 25,000 करोड़ रुपये के प्रोत्साहन पैकेज की घोषणा की है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि इस पहल से 1,600 अटकी आवासीय परियोजनाओं के तहत 4.58 लाख मकान तैयार होंगे। अटकी परियोजनाओं के पुनरुद्धार के लिए सरकार रियल एस्टेट बाजार में 10,000 करोड़ रुपये डालेगी जबकि एलआईसी और एसबीआई 15,000 करोड़ रुपये का योगदान करेंगे। रकम का इस्तेमाल प्राथमिकता के आधार पर ऋण आवंटन में होगा ताकि सस्ते और मझोले आवासीय क्षेत्र में अटकी परियोजनाएं पूरी की जा सकें।
रियल एस्टेट के जानकारों का कहना है कि वर्ष 2019 रियल एस्टेट क्षेत्र के लिए उतार-चढ़ाव का दौर था और नकदी संकट के बीच वर्ष के दौरान 2.58 लाख घरों की बिक्री के साथ 4-5 फीसदी वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई। पिछले साल सरकार द्वारा अफोर्डेबल हाउसिंग में कई रियायतें दिए जाने से हालात में सुधार दिखा। पीएमएवाई योजना के तहत 90 लाख से अधिक घरों को मंजूरी दी गई है, जिसमें से लगभग 30 फीसदी घर बनाए गए हैं और 60 फीसदी से अधिक स्वीकृत आवासों का काम चल रहा है। 90 फीसदी से अधिक संपूर्ण परियोजनाएं उपभोक्ताओं को सौंपी गई हैं। हालांकि जिस गति से मकान बनाए जा रहे हैं, वह लक्ष्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि कई परियोजनाएं अब भी मंजूरी के विभिन्न चरणों में अटकी हुई हैं। नई निर्माण प्रौद्योगिकियों के मध्यम उपयोग के साथ त्वरित स्वीकृतियां सभी के लिए आवास के लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद कर सकती हैं। कुल मिलाकर रियल एस्टेट में छाया संकट धीरे धीरे खत्म हो रहा है, मांग सुधरी है, कीमतें स्थिर हैं। इसलिए खरीदारों और निवेशकों के लिए सस्ती आवासीय परियोजनाएं फायदे का सौदा हो सकती हैं।
बिजनेस स्टैंडर्ड महंगाई के दौर में सस्ते घर पर टिकी नज़र

 

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