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सही काम के लिए सही व्यक्ति का हो चयन

जैमिनी भगवती /  March 02, 2020

भारत की आर्थिक प्रगति में जारी सुस्ती की वजह से लोगों के लिए नए मौके पैदा करने और नौकरियों के सृजन में भारी कमी आई है। इसके अलावा पिछले कई साल से वस्तुओं के व्यापार में आ रही गिरावट प्रतिस्पद्र्धा-भाव में पतन को दर्शाती है। परेशान करने वाले इन रुझानों के कारणों एवं परिणामों पर सार्वजनिक चर्चा गत 1 फरवरी को बजट पेश होने के पहले और बाद में भी हुई है।

निजी बातचीत में लोग अक्सर यह चिंता जाहिर करते हैं कि निर्णय निर्माण से जुड़े तमाम वरिष्ठ नियामकों एवं अधिकारियों के पास ठोस शख्सियत, प्रासंगिक कार्य-अनुभव या उससे जुड़ी जटिलताओं की समझ नहीं है। यह संभव है कि महत्त्वपूर्ण पदों पर बैठे कुछ लोगों ने चुप्पी साध ली और बेहतर समझ रखते हुए भी बोलने के लिए खड़े नहीं हुए। या फिर 1970 के दशक के मध्य में आपातकाल के दौरान सरकार में वरिष्ठ पदों पर आसीन कई लोगों के बारे में जैसा कहा जाता है, इन लोगों से भी जब झुकने को कहा गया तो वे रेंगकर चलने से भी अधिक के लिए राजी हो गए।

नई दिल्ली में बैठी सरकार पर नजर रखने वाला कोई भी व्यक्ति मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति (एसीसी) से परिचित होगा। एसीसी से अनजान लोगों के लिए बता दूं कि इस मंत्रिमंडलीय समिति के अगुआ प्रधानमंत्री होते हैं और गृह मंत्री एïवं संबंधित मंत्रालय के मंत्री इसके दो अन्य सदस्य होते हैं। सभी संवैधानिक पदों, नियामकीय संस्थाओं के प्रमुखों, केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के पदों के लिए एसीसी ही नियुक्तियों को मंजूरी देती है और उस नियुक्ति का कार्यकाल भी तय करती है। मसलन, चुनाव आयुक्तों, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी), भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई), प्रतिस्पद्र्धा आयोग एवं केंद्रीय विद्युत नियामकीय आयोग के प्रमुखों, सूचना आयुक्तों, केंद्र सरकार के सचिवों, आरबीआई गवर्नर, भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी), भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण और पेंशन कोष नियमन एवं विकास प्राधिकरण और वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार जैसे पदों पर नियुक्ति मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ही करती है।

फिलहाल संवैधानिक, नियामकीय एवं केंद्र में सचिव स्तर के लगभग सारे पदों पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के सेवानिवृत्त या जल्द ही सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारी तैनात हैं। सैद्धांतिक तौर पर यह संभव है कि इन बेहद अहम पदों पर उपयुक्त लोगों को ही नियुक्त किया गया है। हालांकि यह भी मुमकिन है कि केवल एक सेवा के ही अधिकतर सेवानिवृत्त अफसरों को ही इन वरिष्ठ पदों पर नियुक्त करने से राष्ट्रीय हित पूरा नहीं होता है। केंद्र एवं राज्य सरकारें अक्सर कम योग्य शख्स का ही चयन करती हैं लिहाजा ऐसा लगता है कि नियुक्ति की मौजूदा परंपराएं भारतीय राजनीतिक कार्यपालिका के हितों को पूरा करती है। 

वित्त मंत्रालय के सीमित संदर्भ में मुझे इस समाचारपत्र के एक संपादक के साथ हुई बातचीत याद है। संपादक का यह मानना था कि मुख्य आर्थिक सलाहकार या आरबीआई गवर्नर जैसे पदों पर सरकार को यह चाहिए कि जरूरी होने पर देश के बाहर से भी बेहतरीन प्रतिभा वाले लोगों की तरफ देखे। सरकार ने कुछ मौकों पर ऐसा किया भी है और विदेश से नियुक्त किए गए लोग इसके लिए पूरी तरह योग्य थे। हालांकि मैं इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हूं कि इन लोगों को अपने कार्यशील जीवन वाले देश की सरकार या नियामकों में काम करने का कोई अनुभव था या नहीं। वैसे उनके लिए यह कोई प्रतिकूल बात नहीं थी क्योंकि वे जल्द सीख सकते हैं। हालांकि आर्थिक सलाहकार या आरबीआई गवर्नर जैसे अधिकारियों को भारत में सरकार के भीतर रहते हुए आगे बढऩे का मौका भी होता है। 

कभी-कभी यह दलील दी जाती है कि भारत के भीतर इस काम को करने के लिए एक भी सुयोग्य व्यक्ति मौजूद नहीं था। सरकार से जुड़े अधिकांश पदों के लिए यह बात तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हो सकती है। इस बात की संभावना है कि विश्वविद्यालयों, विशेषज्ञता वाले संस्थानों और निजी कंपनियां अपने प्रोफेसरों, विशेषज्ञों एवं कार्यकारियों को सरकार या किसी नियामकीय संस्था में पांच साल तक काम करने के लिए मुक्त कर दें। ऐसे लोग वापस अपने संस्थान में लौटने के बाद उनके लिए एक परिसंपत्ति होंगे। 

शासकीय कामकाज के बारे में जानकारी उस समय खो जाती है जब विदेश से बुलाए गए विशेषज्ञ अपने देश लौट जाते हैं। हालांकि विदेशी इंजीनियरों एवं वैज्ञानिकों को वित्तीय रूप से व्यवहार्य होने पर एक तय अवधि वाली नियुक्ति के लिए रियायतें दी जानी चाहिए ताकि रेलवे, पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन या डीआरडीओ जैसे संस्थानों में उनकी सेवाएं ली जा सकें।

केंद्र सरकार चयन प्रक्रिया को समय पर शुरू करने के लिए आम तौर पर अधिक सक्रियता नहीं दिखाती है। किसी पदस्थ अधिकारी का कार्यकाल पूरा होने वाला होता है लेकिन आखिर तक यह साफ नहीं होता है कि उसे सेवा-विस्तार मिलेगा या नहीं। वरिष्ठ पदों पर चयन प्रक्रिया पद रिक्त होने के छह महीने पहले ही शुरू हो जानी चाहिए। यह काम किसी अपवाद के बगैर होना चाहिए और न्यूनतम शैक्षणिक योग्यताएं एवं समुचित कार्य-अनुभव का उल्लेख होना चाहिए। मसलन, वित्तीय क्षेत्र के पदों पर काम करने की इच्छा रखने वालों के पास किसी प्रतिष्ठित संस्थान से अर्थशास्त्र या वित्त में न्यूनतम एक डिग्री जरूर होनी चाहिए। उसके बाद पांच सदस्यीय चयन समिति को संबंधित क्षेत्र का अनुभव रखने वाले तीन उम्मीदवार छांटे जाने चाहिए। चयन समितियों में विभिन्न सेवाओं से दो सेवानिवृत्त सचिव और तीन विषय विशेषज्ञों को जगह देनी  चाहिए। इनमें से एक विशेषज्ञ के पास बड़ी निजी कंपनियों में न्यूनतम 30 साल का कार्य-अनुभव होना चाहिए। पांच सदस्यों की इस समिति को उस पद के लिए शॉर्टलिस्ट किए गए तीन उम्मीदवारों के नाम मंत्रिमंडलीय समिति के पास भेजने चाहिए। 

अतीत में आजमाए जा चुके विकल्पों से बड़ा अंतर होगा अगर किसी भी उम्मीदवार के उपयुक्त पाए जाने पर एसीसी खुद अपने स्तर पर ही नाम रखने के बजाय चयन समिति से दोबारा बैठकर तीन नए नाम भेजने को कहे। ऐसा होने पर किसी को भी चुनने को लेकर एसीसी के लचीलेपन में निश्चित तौर पर कमी आएगी। लेकिन ऐसा नहीं होगा कि इस सुझाई गई प्रक्रिया से कमतर लोगों का चयन हो जाए जबकि मौजूदा परंपरा यही है कि सभी वरिष्ठ पदों पर नियुक्तियां राजनीतिक कार्यपालिका के व्यक्तिनिष्ठ निर्णय पर छोड़ दी जाती है।

मैं उन लोगों से सहमति जताऊंगा जो कहते हैं कि सुझाई गई यह प्रक्रिया पिछले प्रशासनिक सुधार आयोग के सुझावों जैसी ही है। निश्चित तौर पर एक उदासीन रवैये का यही मतलब होगा कि हम अहम पदों पर नियुक्ति के बारे में मौजूदा नीतियों को ही जारी रखे हैं। राजनीतिक कार्यकारी उसी संदेश को सुनते हैं जो उच्च स्वर में बोला जाए। उनके लिए मतदाताओं की अहमियत है और अगर एक बड़े तबके की यह राय बन जाती है तो भारत की सरकारें अपने लिए लाभकारी नीतियों को भी बदल देती हैं।

(लेखक पूर्व राजदूत और विश्व बैंक के पूर्व अधिकारी हैं)
Keyword: RBI, SEBI, CAG, TRAI, Appointment, IAS, Officer, Government, Pension Fund,
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