बिजनेस स्टैंडर्ड - जीएसटी न बढ़ाएं
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जीएसटी न बढ़ाएं

संपादकीय /  March 02, 2020

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह लगातार चौथे महीने एक लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर गया। सरकार ने फरवरी में 1.05 लाख करोड़ रुपये जुटाए जो पिछले वर्ष की समान अवधि से 8.3 फीसदी अधिक है। हालांकि यह राशि उससे पिछले महीने संग्रहीत 1.1 लाख करोड़ रुपये से कुछ कम थी। जीएसटी संग्रह के एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के स्तर पर स्थिर होने की बात उत्साहजनक है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च संग्रह की एक वजह इनपुट क्रेडिट न देना भी हो सकती है। ऐसे में यह देखना अहम है कि आने वाले महीनों में यह रुझान बरकरार रहता है या नहीं। खासतौर पर वित्त वर्ष के अंत के बाद। 

सुधार के बावजूद संग्रह में वृद्घि पहले जताए गए अनुमानों से काफी कम है। परिणामस्वरूप राज्यों को होने वाली कमी की भरपाई की आवश्यकता पड़ रही है और यह केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच विवाद का विषय बन सकता है। केंद्र सरकार का कहना है कि कानून के मुताबिक राज्यों को दी जाने वाली क्षतिपूर्ति केवल क्षतिपूर्ति फंड से ही दी जा सकती है। 

हाल ही में अग्रेजी समाचार पत्र 'द इंडियन एक्सप्रेस' के साथ बातचीत में केंद्रीय राजस्व सचिव अजय भूषण पांडेय ने कहा, 'यदि कमी, क्षतिपूर्ति फंड द्वारा दी जाने वाली राशि से ज्यादा है, तो जीएसटी परिषद को यह देखना होगा कि वह क्षतिपूर्ति उपकर या दरें बढ़ाने के लिए क्या उपाय कर सकती है?' जैसा कि इस समाचार पत्र ने हाल ही में लिखा, विभिन्न वर्षों का अधिशेष इस्तेमाल करने के बावजूद चालू वर्ष में क्षतिपूर्ति में करीब 28,000 करोड़ रुपये की राशि कम पड़ी। 

चूंकि क्षतिपूर्ति उपकर का संग्रह पर्याप्त नहीं है इसलिए जीएसटी परिषद उपकर या दरों में इजाफा करने पर विचार कर सकती है। उसके लिए बेहतर यही होगा कि वह फिलहाल दरों में इजाफा न करे। आर्थिक गतिविधियों में वृद्घि कमजोर बनी हुई है और जीएसटी दरों में इजाफा या उपकर में बढ़ोतरी से मांग और कमजोर होगी और सुधार की संभावना कमजोर होगी। चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में देश की अर्थव्यवस्था 4.7 फीसदी की दर से बढ़ी। जबकि पिछली तिमाही का संशोधित अनुमान 5.1 फीसदी था। इसके अलावा यह समझना भी आवश्यक है कि जीएसटी संग्रह में 14 फीसदी वृद्घि के लिए राज्यों को क्षतिपूर्ति देना शुरू से ही हकीकत से दूर था। 

ऐसे में परिषद यदि हर्जाने का नए सिरे से आकलन करे तो बेहतर होगा। इस बात की संभावना बहुत कम है कि ऐसे वक्त में खपत व्यय 14 फीसदी की दर से बढ़ेगा जबकि महंगाई समायोजित किए बगैर भी अर्थव्यवस्था के केवल 7.5 फीसदी की दर से बढऩे की बात कही जा रही है। इसके अलावा तमाम अन्य मौकों की तरह परिषद को दरों में कमी भी नहीं करनी चाहिए। कम से कम तब तक कि जब तक राजस्व और व्यवस्था स्थिर नहीं हो जाती। काफी संभव है कि राज्य कम क्षतिपूर्ति स्वीकार न करें क्योंकि इसका असर उनके बजट पर पड़ेगा। आर्थिक मंदी ने केंद्रीय करों में राज्यों की हिस्सेदारी तथा अन्य अप्रत्यक्ष कर संग्रह को भी प्रभावित किया है। परंतु इस मोड़ पर कर दरों में इजाफा करने से फायदा कम, नुकसान ज्यादा होगा। 

इसके बजाय परिषद को जीएसटी तंत्र की खामियां दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इससे राजस्व बढ़ाने में मदद मिलेगी। क्षतिपूर्ति को हकीकत के करीब लाने से भी राज्यों को यह प्रोत्साहन मिलेगा कि वे राजस्व जुटा सकें। इस बीच राज्यों के बजट को भी नई आर्थिक वास्तविकता के अनुरूप करना होगा।

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