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संबंधित पक्ष लेनदेन: सरकार, सेबी दूर करेंगे विसंगति

रुचिका चित्रवंशी / नई दिल्ली March 02, 2020

कंपनी मामलों का मंत्रालय भारतीय प्रतिभूति एïवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के साथ बातचीत कर रहा है ताकि संबंधित पक्ष लेनदेन (आरपीटी) से संबंधित नियमों को लेकर कंपनी अधिनियम और सेबी (सूचीबद्धता दायित्व एवं खुलासा आवश्यकताओं या एलओडीआर) नियमनों के बीच विसंगतियों को दूर किया जा सके। 

सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'अधिनियम और एलओडीरआर के नियमों में कुछ अंतर हैं। इससे ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है, जिसमें किसी सूचीबद्ध कंपनी को दोनों का पालन करना पड़ता है। इससे कंपनी मुश्किल में फंस सकती है।' सरकार कुछ  जटिलताओं को हटाना चाहती है और दोनों के दिशानिर्देशों में तालमेल कायम करना चाहती है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'सेबी के मानकों को प्रमुखता मिल सकती है, लेकिन हमें दोनों के नियमों में तालमेल कायम करने की जरूरत है।' सेबी के नियमों के तहत संबंधित पक्ष का दायरा बहुत बड़ा है।

कंपनी अधिनियम के नियमों के विस्तार के रूप में एलओडीआर में कहा गया है कि ऐसा कोई व्यक्ति या इकाई, जो किसी सूचीबद्ध कंपनी का प्रवर्तक या प्रवर्तक समूह होगा और सूचीबद्ध कंपनी में 20 फीसदी या उससे अधिक हिस्सेदारी रखेगा, उसे संबंधित पक्ष माना जाएगा। 

यह अधिनियम खुद सामान्य व्यवहार में निष्पक्ष तरीका अपनाता है। कंपनी मामलों के मंत्रालय का मानना है कि परिभाषा की तुलना में सिद्धांत आधारित अवधारणा बेहतर है क्योंकि इससे कानून आसान रहता है। वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'अगर किसी व्यक्ति को इस सिद्धांत का उल्लंघन करते पाया जाता है तो उसकी जांच की जा सकती है और अभियोजन चलाया जा सकता है।'

पिछले साल नवंबर में कंपनी मामलों के मंत्रालय ने आदेश जारी कर संबंधित पक्ष लेनदेन के नियमों में संशोधन किया था। इसमें मौद्रिक सीमा को हटाया गया और इसे टर्नओवर का 10 फीसदी रखा गया ताकि कानून को सेबी के कानून के समान बनाया जा सके। कुछ अंतर अब भी बने हुए हैं। सेबी संबंधित पक्ष हिस्सेदारी को समेकित कारोबार के एक हिस्से के रूप में गिनता है, जबकि कंपनी मामलों का मंत्रालय एक वैध कंपनी में हिस्सेदारी पर विचार करता है।

इतना ही नहीं, अधिनियम में आम्र्स लेंथ और ऑर्डिनरी कोर्स ऑफ बिज़नेस पर आधारित लेनदेन के लिए शेयरधारकों की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी, भले ही वे अधिकतम सीमा को पार करें। लेकिन एलओडीआर के मुताबिक ऐसे सभी लेनदेन के लिए शेयरधारकों की मंजू्री जरूरी होगी। कंपनी अधिनियम में अलग-अलग प्रकृति के लेनदेन के लिए अलग-अलग सीमाएं हैं। सूचीबद्धता दायित्व एवं खुलासा आवश्यकता के तहत सभी तरह के लेनदेन के लिए एक सीमा रखी गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिनियम के तहत मौजूदा प्रावधानों में इन कमियों से कंपनियों को मंजूरी से बचने में मदद मिलती है। 

कॉरपोरेेट प्रोफेशनल्स में पार्टनर अंकित सिंघी ने कहा, 'किसी विशेष संबंधित पक्ष लेनदेन के लिए एलओडीआर के तहत शेयरधारकों की मंजूरी की जरूरत हो सकती है, लेकिन अधिनियम के तहत नहीं। इसलिए इनमें समानता लाने की जरूरत है। कंपनी मामलों के मंत्रालय को अधिनियम के तहत बोर्ड और शेयरधारकों की मंजूूरी की प्रक्रिया की वस्तुनिष्ठता के बारे में विचार करना चाहिए।' सेबी ने सूचीबद्ध कंपनियों में संबंधित पक्ष लेनदेन से संबंधित नियमों को सख्त बनाने का प्रस्ताव रखा है ताकि उनका दुरुपयोग रोका जा सके और छोटे शेयरधारकों के हितों को सुरक्षित किया जा सके। नियामक ने संबंधित पक्ष और संबंधित पक्ष लेनदेन की परिभाषा को व्यापक बनाने, संबंधित पक्ष लेनदेन के निर्धारण की सीमा में बदलाव करने और सख्त खुलासे एïवं मंजूरियों का प्रस्ताव रखा है। 

कोटक महिंद्रा कैपिटल के प्रबंध निदेशक रमेश श्रीनिवास की अगुआई वाले नौ सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने संबंधित पक्ष की परिभाषा में बदलाव की सिफारिश की है। समिति ने कहा है कि इसमें उस हर व्यक्ति या इकाई को शामिल किया जाना चाहिए, जिसका कंपनी पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नियंत्रण होता है, भले ही उसकी हिस्सेदारी कितनी भी हो।

Keyword: SEBI, Sales and Exchange Board of India, Regulator, Ajay Tyagi, Chairman, RPT,
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