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परमाणुओं की अंत:क्रिया संबंधी नए प्रयोग से जगी उम्मीद

तकनीकी तंत्र
देवांशु दत्ता /  March 01, 2020

न्यूजीलैंड की ओटागो यूनिवर्सिटी के एक शोध दल ने एक असाधारण प्रयोग करते हुए आणविक संयोजन की प्रक्रिया में तीन अलग-अलग परमाणुओं की अंत:क्रिया के पृथक्करण एवं निरीक्षण में कामयाबी हासिल की है। यह रासायनिक गतिविधि एक विशेष कैमरे पर रिकॉर्ड की गई थी और इससे आणविक प्रक्रियाओं के बारे में अप्रत्याशित विवरण सामने आते हैं। शीत परमाणु त्रिमूर्ति में संघटनकारी गतिशीलता के प्रत्यक्ष मापन के तौर पर परिभाषित इस प्रयोग में रुबिडियम के तीन परमाणुओं को फंसाकर उन्हें परम शून्य तापमान तक ठंडा किया गया। रुबिडियम के अणु में दो परमाणु होते हैं लेकिन आणविक संयोजन की रासायनिक प्रक्रिया के लिए कम-से-कम तीन परमाणुओं की जरूरत होती है। जब एक अणु बनता है तो सभी तीनों परमाणुओं में 'ऊर्जा का प्रस्फुटन' होता है जिसे त्रिपिंडीय पुनर्संयोजन कहा जाता है।

 
इस प्रयोग के पहले वैज्ञानिक  आणविक गठन की प्रक्रिया समझने के लिए अक्सर परमाणुओं के विशाल 'बादलों' की अंत:क्रिया का मॉडल अपनाते रहे हैं। लिहाजा इस प्रक्रिया का सांख्यिकीय संदर्भों में अध्ययन किया गया है और कई परमाणुओं की अंत:क्रिया के आंकड़े भी हैं। लेकिन न्यूनतम तीन परमाणुओं की अंत:क्रिया के इस अध्ययन में नई जानकारियां सामने आईं।  एक टोस्टर के आकार वाले एक निर्वात चैंबर के भीतर तीन शीत परमाणुओं पर लेजर किरणें डाली गईं। अत्यधिक केंद्रित लेजर प्रकाश-पुंज का उपयोग सूक्ष्मदर्शी वस्तुओं को गिरफ्त में लेने और उनके दोहन के लिए होता है। 
 
लेजर किरणें डालने से एक क्षेत्र बनता है जिसमें लक्षित कण भी मौजूद होता है। लेजर की तरंगदैध्र्य जितनी कम होती हैै उतने ही छोटे वस्तु का इस्तेमाल परमाणु को पकड़ में लेने के लिए किया जा सकता है। ऑप्टिकल ट्वीजर का इस्तेमाल अलग-अलग अणुओं को गिरफ्त में लेने के लिए होता रहा है और जैव-अणुओं के अध्ययन में इनका इस्तेमाल भी आम बात है। उदाहरण के तौर पर ऑप्टिकल ट्वीजर का इस्तेमाल विषाणुओं को चिह्निïत करने और उनके अध्ययन में होता रहा है। छोटे पदार्थों को इंगित करने के लिए लेजर किरणों के इस्तेमाल की इस परिघटना की खोज 1970 के दशक के शुरुआत में आर्थर एशकिन ने की थी। उस समय बेल प्रयोगशाला में कार्यरत एशकिन और उनकी टीम ने 1986 में पहली ऑप्टिकल ट्वीजर बनाने में कामयाबी हासिल की थी। इन उपलब्धियों के एवज में एशकिन को 2018 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 
 
यह प्रयोग वह पहला मौका था जब अलग-अलग परमाणुओं को फंसाया गया और कुछ के साथ अंत:क्रिया के लिए बाध्य किया गया। परमाणुओं को परम शून्य के करीब तापमान तक ठंडा कर दिए जाने के बाद तीन अलग फंदों का इस्तेमाल निर्वात चैंबर के भीतर तीनों परमाणुओं को पृथक करने के लिए किया गया। फिर इन तीनों फंजों को एक-दूसरे के इतना करीब लाया गयाा कि ये परमाणु एक-दूसरे से क्रिया कर सकें। दो फंदों को हटा लिए जाने के बाद तीनों परमाणु उस अकेले फंदे में ही टकराते रहे।
 
इस प्रक्रिया को कई बार दोहराया गया और हरेक बार टकराव की गतिशीलता को देखा गया। इसके परिणाम त्रिपिंडीय पुनर्संयोजन से अलग थे क्योंकि तीसरे अणु को दो-परमाणु वाले अणु की ऊर्जा नहीं मिलने से बिना जोड़े वाला परमाणु जाल में फंस गया। इस प्रयोग में अपेक्षा से अधिक पुनर्संयोजन दर भी दर्ज की गई। आंकड़े बताते हैं कि इसने एक अणु बनाने में सैद्धांतिक गणनाओं की तुलना में अधिक वक्त लिया। इस असंगति की व्याख्या नहीं की जा सकती है जिसका मतलब है कि इसमें आगे शोध करने की काफी गुंजाइश मौजूद है।
 
रुबिडियम एक क्षारीय धातु है जिसकी परमाणु संख्या 37 है। यह अत्यधिक क्रियाशील, वायुमंडल में आग पकडऩे वाली धातु है। इसका मतलब है कि यह धातु प्रकृति में कभी भी पृथक रूप में नहीं पाई जाती है। इसका सर्वाधिक स्थायी समस्थानिक रुबिडियम-85 भरपूर मात्रा में पाया जाता है। यह क्वांटम मैकेनिक से जुड़े प्रयोगों का पसंदीदा अवयव है। रुबिडियम पर बोस-आइंस्टीन कंडेंसेट्स (बीईसी) में विस्तृत अध्ययन हो चुका है। बीईसी पदार्थ की वह खास अवस्था है जब बोसॉन को अत्यंत कम तापमान पर ठंडा किया जाता है। बोसॉन कण का नामकरण सत्येंद्र नाथ बोस के नाम पर किया गया था।
 
बीईसी के वजूद के बारे में सबसे पहले बोस एवं आइंस्टीन ने 1924 में संकल्पना पेश की थी लेकिन इसके स्वतंत्र अस्तित्व की पुष्टि 1995 में ही हो सकी जब रुबिडियम-87 समस्थानिक का एक बीईसी पहली बार बनाया गया। इसी खोज को आधार बनाते हुए 2001 का भौतिकी नोबेल पुरस्कार दिया गया था। बोस-आइंस्टीन आंकड़ों के मुताबिक  एक बीईसी कई कणों को एक साथ कम ऊर्जा की समान स्थिति में गिरते हुए देखता है। 1995 के बाद रुबिडियम से संबंधित बीईसी आचरण का विस्तार से अध्ययन किया गया है। इससे इस अवयव की संलिप्तता वाली बहुल-पिंडी आïणविक प्रक्रिया की एक समझ पैदा हुई है। लेकिन ओटागो यूनिवर्सिटी का नया शोध-पत्र कहता है कि एक ऑप्टिकल ट्वीजर जाल में त्रि-पिंडीय प्रक्रियाओं की संख्यात्मक व्याख्या को लेकर कोई भी विश्वसनीय सिद्धांत नहीं है। शोध टीम ने त्रि-पिंडीय अंत:क्रिया को देखकर यह समझा कि परमाणु उतनी तेजी से एकसूत्र में नहीं बंधते हैं जितना सैद्धांतिक मॉडल बताते हैं। इसे संभवत: क्वांटम प्रभाव माना जाता है लेकिन इसकी संतोषजनक व्याख्या के लिए नई अंतर्दृष्टि विकसित करने की जरूरत है।  इस प्रयोग के सैद्धांतिक निहितार्थों और अंतर्दृष्टि से अलग इस परीक्षण से पता चलता है कि अलग-अलग परमाणुओं के साथ छेड़छाड़ कर पाना संभव है। भविष्य में इसका नैनो-तकनीक पर बड़ा असर देखा जा सकता है। 
Keyword: atomic, BEC,,
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