बिजनेस स्टैंडर्ड - दंगों की मूल वजह पर चर्चा का वक्त
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दंगों की मूल वजह पर चर्चा का वक्त

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  March 01, 2020

क्या यह सही वक्त है जब हम एक ऐसी समस्या की जड़ों के बारे में चर्चा करें जबकि देश की राजधानी इसकी वजह से जल रही है? और यह भी कि विभाजन के बाद पहली बार हिंदू-मुस्लिम दंगों में शहर में इतनी बड़ी तादाद में मौतें हो चुकी हैं? यह देश का सबसे सुरक्षित शहर है। यह सब राष्ट्रपति भवन से 8-10 किलोमीटर के दायरे में हुआ जो हमारे गणतंत्र का गौरव है और जिसके आसपास साउथ और नॉर्थ ब्लॉक स्थित हैं जहां देश के घरेलू और सैन्य सुरक्षा प्रतिष्ठानों के कार्यालय हैं जो देश और देश की जनता की सुरक्षा के लिए उत्तरदायी हैं। 

 
क्या इस काम को बाद के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है, तब तक जब तक कि यह उबाल शांत नहीं हो जाता और सरकार तथा न्यायपालिका समेत विभिन्न प्रतिष्ठान हालात सामान्य नहीं कर लेते? बौद्धिक बहसें प्रतीक्षा कर सकती हैं, तब तक जब तक यह आग और भावनाएं शांत नहीं हो जातीं। किसी भी तरह के टकराव, जन असंतोष, उपद्रव या आतंकवाद से जुड़ी बहस उस वक्त थम जाती है जब बात उसके पीछे मूल वजह की आती है। बहस में शामिल पक्षकार उसके पक्ष या विपक्ष में अडिग हो जाते हैं और गतिरोध उत्पन्न हो जाता है। पाकिस्तान द्वारा सीमा पार से आतंकवाद भड़काना और उस पर भारत की प्रतिक्रिया इसका उदाहरण है। इस वक्त असहज करने वाले सवाल पूछने के अलग जोखिम हैं। कोई मंत्री या एक मंत्री अथवा सोशल मीडिया के शूरवीरों की टुकड़ी आप पर मनचाहे ढंग से हमला कर सकती है। आप पर भड़काऊ बातें करने से लेकर राजद्रोह तक के इल्जाम लगा सकती है। अदालत भी आपको नोटिस जारी कर सकती है। यही कारण है कि टेलीविजन चैनलों को कड़ी चेतावनी दी गई कि वे प्रसारण संहिता का पालन करें। हालांकि तब तक जो नुकसान होना था, हो चुका था। अब हम इतने भयभीत हैं कि हम सरकार से इस बात के लिए भी नहीं लड़ पा रहे हैं कि वह सत्ता केंद्र से मात्र छह किमी की दूरी पर हालात नहीं संभाल सकी।
 
हालांकि हम इतने कायर भी नहीं हैं कि एक अन्य संस्था से यह कुतर्क करें कि वह भी उन नागरिकों की रक्षा में नाकाम रही। जबकि यह संस्था पीडि़तों से बमुश्किल 5 किमी की दूरी पर थी। ध्यान रहे यहां मामला, मिलीभगत, अक्षमता या विचारधारा का नहीं है। हम आमतौर पर सरकारों पर यही इल्जाम लगाते हैं। यहां मामला उस संस्था द्वारा अपने विवेक का इस्तेमाल न करने और अपनी संस्थागत तथा नैतिक पूंजी को गंवाने का है, जो मौजूदा हालात में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। देश की राजधानी में लगी आग जो पूरे देश में सुलग रही है, उसकी वजह उस संस्था में निहित है जिसे इसके कारणों की बेहतर समझ होगी। जाहिर है सबसे प्रतिष्ठित स्त्री-पुरुष सर्वोच्च न्यायालय चलाने के लिए चुने जाते हैं। जाहिर है वे इन परिणामों से अनभिज्ञ नहीं होंगे।
 
सीएए-एनआरसी का जो जहर आज देश को विषाक्त कर रहा है, दुख की बात है कि उसकी विष बेल देश की सबसे बड़ी अदालत ने उस वक्त बोई थी जब न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और रोहिंटन नरीमन के पीठ ने अपनी निगरानी में असम में राष्टï्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) का काम शुरू करने का आदेश दिया। हमें इस बात को रेखांकित करना होगा कि न्यायाधीशों ने अचानक उत्पन्न किसी समझ से यह निर्णय नहीं लिया होगा। असम और वहां आव्रजन के उलझे हुए इतिहास में विदेशी नागरिक का मुद्दा प्रबल है। सन 1980 के दशक में इस मुद्दे पर एक व्यापक लोकप्रिय आंदोलन ने राज्य को पंगु बना दिया था। वहां तीन साल तक सरकार की कुछ नहीं चली थी। उस दौर में असम में उत्पादित कच्चे तेल की एक बूंद बाहर रिफाइनरी तक नहीं पहुंची। स्थानीय असमी लोगों में गुस्सा इस बात का था कि बांग्ला बोलने वाले घुसपैठिये स्थानीय संस्कृति, राजनीतिक और अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर चुके हैं। जैसा कि ऐसे अवसरों पर होता रहा है, व्यापक शांतिपूर्ण आंदोलन में कुछ उग्रवादी तत्त्व उभर गए। सन 1985 के जाड़ों में हालात तब सामान्य हुए जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने प्रदर्शनकारी नेताओं के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते के प्रावधानों में एक प्रावधान व्यापक एनआरसी, अवैध विदेशी नागरिकों की पहचान करने और उनका नाम मतदाता सूची से बाहर करने और अंतत: उन्हें वापस भेजने का भी था।
 
असम के विशेष संदर्भ में इसकी तारीख तय की गई 25 मार्च, 1971 यानी वह दिन जब पाकिस्तानी सेना ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान पर हमला किया था। इसके पीछे विचार यही था कि सन 1947 के बाद से ही दमन से बचने के लिए लाखों हिंदुओं ने पूर्वी पाकिस्तान से असम में शरण ली। उन्हें भारत में शरण मिलनी चाहिए थी। सरल शब्दों में कहें तो जब तक पूर्वी पाकिस्तान का अस्तित्व था, वहां से आने वाले किसी व्यक्ति से कोई सवाल या उस पर कोई संदेह नहीं किया जाना था। 25 मार्च, 1971 के बाद हिंदू अल्पसंख्यकों की देखरेख की जवाबदेही बांग्लादेश की मित्रतापूर्ण सरकार की थी।
 
यानी उस तय तारीख के बाद देश में आने वाले लोग अवैध विदेशी थे और उन्हें वापस भेजा जाना था। बांग्लादेश ने उन्हें वापस लेने की हां की थी चाहे वे हिंदू हों या मुस्लिम। समझौते में धर्म के आधार पर कोई भेद नहीं किया गया था। न्यायाधीश भी ऐसा नहीं करना चाहते थे। पीठ एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें समझौते के इस अहम प्रावधान को लागू करने की बात कही गई थी और जिसे सभी भुला बैठे थे। आप कानूनी दृष्टि से यह पूछ सकते हैं कि न्यायाधीशों ने भुला दिए गए असुविधाजनक तथ्य की अनदेखी केवल इसलिए की क्योंकि वह राजनीतिक और व्यावहारिक दृष्टि से सुविधाजनक था? बाकी बातें हाल की हैं। सर्वोच्च न्यायालय के पीठ की निगरानी में एनआरसी की प्रक्रिया शुरू हुई।
 
न्यायालय ने एनआरसी के प्रभारी को अपने अधीन रखा और कहा कि वह मीडिया समेत किसी से बात नहीं कर सकता। इससे पूरी प्रक्रिया को लेकर अस्पष्टता और भय का माहौल बना। अदालत ने यह आदेश भी दिया कि अवैध विदेशियों के लिए डिटेंशन सेंटर बनाए जाएं। परंतु जब हकीकत सामने आई तो सबकुछ बदल गया। कुछ लोग सामने आए तथ्यों से नाराज थे लेकिन ताकतवर लोगों को इसमें अवसर नजर आया। जो विदेशी चिह्नित किए गए वे पहले की गई कल्पना की तुलना में नाम मात्र थे। अवैध साबित लोगों में से दो तिहाई बंगाली हिंदू निकले। स्थानीय असमी न तो हिंदुओं को स्वीकार करेंगे और नही सन 1985 के समझौते की दलील अथवा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसके क्रियान्वयन को। क्या भाजपा हिंदुओं को निकाल सकती है?
 
अब हम कहां हैं? भाजपा को इसमें अवसर नजर आया। असम के हिंदू घुसपैठियों को नए सीएए की मदद से सुरक्षित किया जा सकता है और यह मुस्लिमों से निपटने के काम आएगा। अब देश की सबसे बड़ी अदालत ने इसे एक राज्य के लिए वैध कर दिया है और डिटेंशन सेंटर की राह तक सुझा दी है तो इसे पूरे देश में क्यों नहीं लागू किया जा सकता है? यह ध्रुवीकरण का ऐसा मंत्र बन गया जो सबको जीत सकता है। अब हम यहां पहुंच गए हैं। सीएए की संवैधानिकता की नई गेंद उसी पाले में उछल रही है। इस बीच भली मंशा से बोया गया जहर पूरे देश में फैल रहा है। असम में भी अब भाजपा की सरकार कह रही है कि वह एनआरसी से नाखुश है और इसे दोबारा अंजाम देना चाहती है। जिस अधिकारी ने अदालत की निगरानी और संरक्षण में इसे अंजाम दिया, उसे परेशान किया जा रहा है। शायद इसलिए क्योंकि वह सही आंकड़े नहीं जुटा सके। अब तक सर्वोच्च न्यायालय को भी उसका बचाव करते नहीं देख पाए हैं जो उसकी निगरानी में हुआ। उसने यह भी नहीं कहा कि वह दोबारा एनआरसी की प्रक्रिया नहीं होने देगा या अपने इरादों को सीएए के माध्यम से समाप्त नहीं होने देगा। दिल्ली  का दंगा तो एक घटना है। इसमें बंगाल, असम, उत्तर प्रदेश को जोड़ लीजिए तो मृतकों की तादाद बहुत बड़ी नजर आएगी। दुख की बात है कि यह एक लंबे अंधकारमय दौर की शुरुआत हो सकती है। इसलिए अब इसकी जड़ों पर विचार करने का समय आ गया है।
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