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हकीकत से बहुत दूर है भारत में हरित ऊर्जा का सपना

श्रेया जय / नई दिल्ली March 01, 2020

दिल्ली के कुतुब इंस्टीट्यूशनल इलाके में उच्च सुरक्षा व्यवस्था से घिरी इमारत में स्थित बिजली व्यवस्था ऑपरेटर पीओएसओसीओ से देश की अक्षय ऊर्जा उत्पादन की स्थिति को समझा जा सकता है।  नए केंद्र से 11 अक्षय ऊर्जा प्रबंध केंद्र (आरईएमसी) जुड़े हुए हैं। यह केंद्र सरकार की अक्षय ऊर्जा को परंपरागत ऊर्जा के साथ बाधारहित तरीके से जोडऩे की कवायद का हिस्सा हैं, जिससे बिजली ग्रिड में स्थिरता आ सके। उत्तरी क्षेत्र के केंद्र का भवन निर्माणाधीन है, लेकिन मौजूदा पीओएसओसीओ केंद्र के पास स्थित पूरक इकाई ने भारत की आरई की निगरानी शुरू कर दी है।  
 
 आरईएमसी में रियल टाइम मौसम भविष्यवाणी की व्यवस्था है, जिसमें बादलों की सैटेलाइट इमेज का इस्तेमाल होता है। इसमें सभी सौर और पवन परियोजनाओं के  लोड प्रोफाइल का लाइव अपडेट होता है। इसमें उत्पादन के आंकड़े, अगले दिन उत्पादन का अनुमान, यहां तक कि सप्ताह के उत्पादन और उसके डिस्पैच की योजना होती है। एक आरईएमसी की स्थापना में 15 से 20 करोड़ रुपये लगते हैं। पश्चिमी क्षेत्र के लिए एक पहले ही काम कर रहा है। निश्चित रूप से ये केंद्र प्रभावी दिखते हैं, लेकिन आंकड़े प्रभावित नहीं करते। दिसंबर में देश भर में हुई 98.76 अरब यूनिट बिजली की आपूर्ति में सौर और पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी महज 9.5 प्रतिशत है। अप्रैल नवंबर 2019 में देश मेंं कुल ऊर्जा उत्पादन में आरई की हिस्सेदारी महज 8.2 प्रतिशत थी। 
 
पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के तहत भारत ने 2040 तक कुल ऊर्जा उत्पादन में गैर जीवाश्म ईंधन स्रोतों से 40 प्रतिशत उत्पादन का लक्ष्य लक्ष्य रखा है। लेकिन इसमें कोयला आधारित बिजली उत्पादन कम करने को लेकर कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई है। भारत के कुल बिजली उत्पादन में ताप बिजली की हिस्सेदारी अभी भी 80 प्रतिशत के करीब है। ग्रिड प्रबंधकों को सबसे पहले इसका सामना करना पड़ता है। पवन ऊर्जा का उत्पादन साल के कुछ महीनों में होता है और सौर ऊर्जा का उत्पादन 6 से 8 महीने होता है। इसके अलावा यह इकाइयां देश के कुछ ही हिस्सों में केंद्रित हैं। कंपनी के स्तर पर अक्षय ऊर्जा की अनिरंतरता की निगरानी भी की जा सकती है। कंपनी की पयिोजनाओं के उत्पादन के ड्रोन से लिए आंकड़े 10 राज्यों से एकत्र किए जा रहे हैं, जिससे बिजली के उत्पादन का अनुमान और उनके शेड्यूलिंग में सहूलियत होती है। 
 
उत्पादकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती नजदीक के स्टेशनों पर बिजली भेजना और अन्य क्षेत्रों में बिजली को भेजना है। इससे निपटने के लिए केंद्र ने हरित ऊर्जा गलियारे (जीईसी) की घोषणा की है, जो अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए समर्पित पारेषण नेटवर्क है। जिस रफ्तार से परियोजनाएं आ रही हैं, उसकी तुलना में परियोजनाओं पर काम की रफ्तार सुस्त है। जीईसी के पहले चरण में करीब 20 जीडब्ल्यू पारेशण क्षमता सरकारी कंपनी पावर ग्रिड कॉर्पोरेशन ने तैयार की। आंकड़ोंं से पता चलता है कि तमिलनाडु और राजस्थान में सिर्फ दो परियोजनाएं आने वाली हैं। वहीं 20 जीडब्ल्यू के लिए निजी कंपनियों ने बोली लगाई है। इसके अलावा और 66 जीडब्ल्यू की परियोजनाओं की योजना बनाई गई है, जिसमें से 28 जीडब्ल्यू की बोली हो चुकी है। 
 
केंद्र ने मेगा सोलर पार्क स्थापित करने का भी फैसला किया है, जिनकी अपनी पारेषण व्यवस्था होगी। प्रमुख फर्में आंतरिक पारेषण व्यवस्था तैयार करेंगी, जिसकी वजह से पार्क के अंदर के संयंत्रों की बिजली 30 प्रतिशत महंगी हो जाएगी। कुछ अक्षय ऊर्जा कंपनियां पारेषण में निवेश कर रही हैं। आपूर्ति में सुधार व उत्पादन बढ़ाने के लिए तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है।  इस क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि अक्षय ऊर्जा, जीवाश्म ईंधन का विकल्प नहीं हो सकता है। कुछ राज्य बिजली नियामक आयोगों द्वारा अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए शुल्क तय करने में देरी की वजह से इस क्षेत्र में अनिश्चितता की स्थिति है। इसके अलावा कुछ बिजली वितरण कंपनियां भुगतान में देरी कर रही हैं। दिसंबर 2019 में अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं पर वितरण कंपनियों का बकाया 9,000 करोड़ रुपये है।  
 
भारत ने 2022 तक 175 जीडब्ल्यू अक्षय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा है, जिसमें महज 2 साल बचे हैं। ऐसे में अक्षय ऊर्जा को लेकर संदेह बना हुआ है। अक्षय ऊर्जा उत्पादन परियोजनाओं में तेज बढ़ोतरी के बावजूद इनमें से ज्यादातर मेंं कुछ साल में रिटर्न मिलना कठिन है। एक तरफ पारेषण नेटवर्क का अभाव है, वहीं राज्य इसके लिए भुगतान करने को भी तैयार नहीं हैं। अब योजनाकारों को हकीकत पर नजर डालनी चाहिए कि अक्षय ऊर्जा ज्यादा है, जबकि पारेषण व्यवस्था कम है, साथ ही इसके लिए मजबूत तंत्र बनाने की जरूरत है। 
 
(नोट: यह खबर स्मितु कोठारी फेलोशिप प्रोग्राम 2019 के सहयोग से प्रकाशित की गई है।)
Keyword: power, electric, solar,,
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