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रुपहले पर्दे की उजली चमक में छिपे उम्मीद भरे सबक

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  February 28, 2020

यह अच्छी खबरों का एक टुकड़ा भर है लेकिन इस पर टिके रहने लायक है। भारतीयों ने वर्ष 2019 में फिल्मों के कुल 1.03 अरब टिकट खरीदे। ऑर्मेक्स मीडिया बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट 2019 के मुताबिक यह आंकड़ा वर्ष 2018 की तुलना में नौ फीसदी अधिक है जब 94.5 करोड़ टिकटों की बिक्री हुई थी। यह वृद्धि बहुत अधिक न होते हुए भी तीन कारणों से अच्छी खबर है। पहला, यह भारत के 1.67 लाख करोड़ रुपये के मीडिया एवं मनोरंजन बाजार के लिए खराब रहे साल का इकलौता उजला पहलू है। आर्थिक सुस्ती, टेलीविजन प्रसारण के लिए चैनलों की कीमत तय करने का ट्राई का फैसला और इस उद्योग की वृद्धि एवं रोजगार को प्रोत्साहन देने के लिए किसी भी व्यापक नीति का पूर्ण अभाव होने से वर्ष 2019 इस क्षेत्र के लिए निराशाजनक रहा। विज्ञापन राजस्वों में वृद्धि एक अंक में गिर चुकी है जबकि भुगतान राजस्व के मोर्चे पर संघर्ष करना पड़ रहा है। किसी भी बड़े सूचीबद्ध मीडिया समूह- ज़ी एंटरटेनमेंट, नेटवर्क18, जागरण प्रकाशन या डीबी कॉर्पोरेशन की तिमाही रिपोर्टों को देखें तो खबर अच्छी नहीं है। डिज्नी स्टार और टाइम्स ग्रुप जैसी हरेक बड़ी गैरसूचीबद्ध फर्म को लक्ष्य हासिल करने में जद्दोजहद करनी पड़ रही है। अभी तक के साक्ष्य महज आख्यान हैं लेकिन नौकरियां तो गई हैं। ध्यान रखें कि टीवी एवं प्रिंट माध्यम मीडिया एवं मनोरंजन उद्योग के अगुआ हैं। टेलीविजन अकेले आधा राजस्व जुटाता है जबकि प्रिंट इस उद्योग का 18 फीसदी से अधिक राजस्व जुटाता है। जहां तक फिल्म उद्योग का सवाल है तो वह महज 10 फीसदी राजस्व ही ला पाता है।

 
और इसी बिंदु से हम दूसरे कारण तक पहुंचते हैं। करीब चार वर्षों से टिकटों की संख्या गिर रही थी या स्थिर बनी हुई थी जबकि औसत टिकट मूल्य लगातार बढ़ रहा था। बेचे जाने वाले टिकटों की संख्या आम तौर पर 80 करोड़ से लेकर 90 करोड़ के बीच में थी। लेकिन मार्च 2019 में समाप्त वित्त वर्ष में भारत की शीर्ष तीन मल्टीप्लेक्स शृंखलाओं में तीन वर्षों के बाद टिकट बिक्री में उछाल देखने को मिली। ऑर्मेक्स की रिपोर्ट राष्ट्रीय स्तर पर उछाल की पुष्टि करती है और दिखाती है कि 2019 में पूरे साल यह मजबूत बनी रही। मोटे रुझानों के हिसाब से देखें तो रिपोर्ट अधिक भाषाओं, बेहतर कहानियों और पहले सप्ताहांत पर निर्भरता कम करने पर जोर देती है जिससे यह वृद्धि आगे भी जारी रहे। 
 
इनमें से सबसे अहम वह तरीका है जिससे भारत की विविधता आंकड़ों में नजर आ रही है। एक अरब से अधिक टिकटों की बिक्री और 10,948 करोड़ रुपये का बॉक्स ऑफिस राजस्व संग्रह हिंदी, तमिल, तेलुगू, हॉलीवुड और अन्य फिल्मों के बीच बंटा हुआ था। ऑर्मेक्स मीडिया के मुख्य कार्याधिकारी शैलेश कपूर कहते हैं, 'कुल मिलाकर भाषा काफी अहम होती जा रही है। हिंदी, तमिल और तेलुगू भाषाओं में रिलीज हुई फिल्म साहो का 60 फीसदी से अधिक बॉक्स ऑफिस राजस्व हिंदी संस्करण से आया। इसी तरह हिंदी फिल्म वॉर का कुछ कारोबार तेलुगू संस्करण से भी आया। हम एक ऐसे परिदृश्य की तरफ बढ़ रहे हैं जिसमें शीर्ष दस में शामिल कई फिल्में बहु-भाषाई हैं।'
 
हॉलीवुड फिल्मों का ही उदाहरण लेते हैं। इनकी राजस्व हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2018 में कुल बॉक्स ऑफिस संग्रह में हॉलीवुड फिल्मों का योगदान 12.5 फीसदी रहा था जो 2019 में बढ़कर 15 फीसदी हो गया। लेकिन इसकी वजह यह है कि हॉलीवुड फिल्मों को अब एक साथ हिंदी, तमिल, तेलुगू और कुछ अन्य भाषाओं में भी डब कर रिलीज किया जा रहा है। इस बारे में कपूर कहते हैं, 'अवेंजर्स फिल्म का 40-45 फीसदी राजस्व हिंदी, तमिल एवं तेलुगू संस्करणों से आया। यह बात सभी फ्रैंचाइजी या बड़ी फिल्मों के लिए सही है जिनका औसतन 35 फीसदी राजस्व भारतीय भाषाओं से आता है।'
 
दूसरी भारतीय भाषाओं में डब या रीमेक हुई हिंदी फिल्मों के बारे में भी यही स्थिति है। यही हाल हिंदी में डब या रीमेक होने वाली गैर-हिंदी फिल्मों का है। बहुभाषाई फिल्में के टिकट अधिक बिक रहे हैं जो बॉक्स ऑफिस राजस्व में शीर्ष पर हैं। इस रिपोर्ट के अच्छी खबर होने का तीसरा कारण यह है कि अब अधिक लोग फिल्में देखने के लिए सिनेमाघरों का रुख करने लगे हैं। फिल्म उद्योग के राजस्व का 70 फीसदी से अधिक राजस्व टिकट बिक्री से आने की वजह से यह काफी अहमियत रखता है। निश्चित रूप से फिल्मों की पहुंच एवं प्रभाव एक अरब टिकटों की बिक्री से बहुत आगे तक जाता है। कुल टीवी दर्शकों में से एक चौथाई लोग अपने घरों में फिल्में देखते हैं। भारत में स्ट्रीमिंग वीडियो ब्रांड फिल्मों एवं फिल्म-संबंधी सामग्रियों पर असंगत रूप से अधिक वक्त देते हैं। लेकिन फिल्म उद्योग तो बुनियादी तौर पर बॉक्स ऑफिस से अपना पैसा कमाता है। बॉक्स ऑफिस पर कामयाबी का यह मतलब है कि फिल्मों को स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और टीवी चैनलों से भी बढिय़ा सौदा मिलता है। 
 
लेकिन हमें याद रखना होगा कि यह अच्छी खबर का एक फलक भर है। इसके जरिये समूचे परिदृश्य को खुशनुमा दिखाने की कोशिश बरगलाने वाली मानी जाएगी। जैसा कि एक मंत्री ने हाल ही में किया था। कई लोग यह दलील दे सकते हैं कि अधिक लोगों के फिल्म देखने सिनेमाघर जाने का मतलब यह है कि देश में कोई आर्थिक सुस्ती नहीं है। यह एक दोषपूर्ण तर्क है। इसका कारण यह है कि अगर टिकट बिक्री ही देश की वृहद-आर्थिक सेहत का पैमाना है तो फिर हम इसके पहले के चार वर्षों में भारी मंदी के दौर से गुजर रहे थे। 
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