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छिटपुट सुधार से परे

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  February 28, 2020

शायद सरकार का यह कहना सही है कि अर्थव्यवस्था उस निम्रतम स्तर पर पहुंच गई है जहां से केवल सुधार की संभावना है। शुक्रवार को जारी आर्थिक वृद्धि के तिमाही आंकड़े इसका समर्थन करते हैं और निवेश बैंकों के अर्थशास्त्री भी मोटे तौर पर इसकी पुष्टि करते हैं। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान भी यह भविष्यवाणी कर चुके हैं कि आने वाले वर्ष में भारत में मामूली सुधार देखने को मिलेगा। इस बात पर सहमति है कि सबसे बुरा दौर बीत चुका है और मंदी भी अपना चरम देख चुकी है। इससे सरकार के प्रवक्ताओं को प्रोत्साहन मिला है और वे यह कह रहे हैं कि अर्थव्यवस्था एक चक्रीय प्रकृति की मंदी से गुजरी और वित्तीय क्षेत्र की समस्याओं ने संकट में इजाफा किया। उनका यह भी कहना है कि यह सिलसिला भी सुधार पर है। 

 
हमें ऐसे अनुमानों को लेकर सतर्क रहना होगा जो प्रमुख तौर पर घरेलू कारकों के आंशिक विश्लेषण पर आधारित है। मसलन शेष विश्व के साथ भारत की आर्थिक संबद्घता चाहे जितनी कमजोर हो, लेकिन उसका आर्थिक प्रदर्शन वैश्विक रुझानों के साथ सुसंगत ही है, हालांकि वह एकदम उसके अनुरूप नहीं है। यानी नई सदी के पहले दशक में भारत की तेज वृद्घि वाले वर्ष अप्रत्याशित वैश्विक वृद्घि को ही प्रतिबिंबित कर रहे थे जो विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 4.2 फीसदी थी। उसकी तुलना में वर्ष 2019 तक के पांच वर्ष में वैश्विक वृद्घि एक तिहाई गिरकर 2.8 फीसदी रह गई। भारत की वृद्घि भी हाल के वर्षों में तेजी से गिरी है। 
 
अन्य ब्रिक्स देशों की कहानी भी काफी हद तक ऐसी ही है, हालांकि वहां ठीक इन्हीं वर्षों में ऐसा नहीं हुआ। रूस की वृद्घि उच्च वृद्घि वाले वर्षों के 7 फीसदी से गिरकर हाल के समय में 1 फीसदी की आधी रह गई। ब्राजील में भारी उतार-चढ़ाव आए और 2013 तक के चार वर्ष में उसने 4 फीसदी वृद्घि हासिल की जबकि उसके बाद वहां वृद्घि ऋणात्मक हो गई। हाल के तीन वर्षों में वह बमुश्किल 1 फीसदी की वृद्घि हासिल कर पाया। चीन में भी धीमापन आया है और वह अपने सर्वश्रेष्ठ समय की तुलना में आधी वृद्घि ही हासिल कर पाया है। अब कोरोनावायरस के कारण इसमें और गिरावट आएगी। अन्य उभरते बाजारों की हालत भी ऐसी ही है। तुर्की में वृद्घि बेहतरीन वर्षों के 8 फीसदी से घटकर 5.5 फीसदी हो गई और अब यह 3 फीसदी से कम वृद्घि दर्ज कर रहा है। हमें अंतरराष्ट्रीय रुझानों पर अधिक ध्यान देना चाहिए, खासतौर पर उभरते बाजारों के रुझानों पर। 
 
यहां चार बातें ध्यान देने लायक हैं। पहली बात है कोरोनावायरस के सर्वव्यापी महामारी बनने के खतरे की। दुनिया भर के बाजार इसे लेकर चिंतित हैं। दूसरी बात है वैश्विक व्यापार वृद्घि में मंदी। विश्व व्यापार संगठन ने वैश्विक वाणिज्यिक व्यापार को आर्थिक वृद्घि की दर के समकक्ष रखा है जबकि करीब दो दशक तक व्यापार वृद्घि की दर विश्व अर्थव्यवस्था से 40 फीसदी तक अधिक रही है। यह बदलाव आंशिक रूप से तो इसलिए है क्योंकि विभिन्न देशों के बीच विवाद उत्पन्न हुए और उसके परिणामस्वरूप संरक्षणवाद लागू किया गया। परंतु इसकी अन्य वजह भी हैं। व्यापार जगत में शीघ्र सुधार की उम्मीद नहीं है।
 
तीसरा कारक वह है जिसे विश्व बैंक उभरते बाजारों की उत्पादकता वृद्घि में कमी के रूप में दर्ज करता है। देश में यह एकदम स्पष्ट रूप से हमारे सामने है क्योंकि आर्थिक वृद्घि निवेश दर की तुलना में तेजी से गिरी है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत को अब समान वृद्घि दर हासिल करने के लिए पहले की तुलना में अधिक निवेश की आवश्यकता है। आखिर में वे जोखिम आते हैं जो वैश्विक कर्ज से संबंधित हैं। इससे मुद्रा बाजारों में असामान्यता आ रही है क्योंकि निवेश दर ऋणात्मक है। एक पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा है कि भारत उन देशों में शामिल है जिन्हें झटके लगने की ज्यादा आशंका है। 
 
इन तमाम बातों के पहले देश में बचत और निवेश दर बढ़ाने की चुनौती है। इसके अलावा मानव संसाधन को बेहतर बनाने, खेतों में उत्पादकता बढ़ाने, राजकोषीय दबाव से निपटने की जुगत करने, सही नीतियों के साथ रोजगार तैयार करने और बाजार में सरकारी हस्तक्षेप को कम करने की चुनौती शामिल है। चक्रीय कारकों के काम करने के बावजूद सुधार की गति और गुणवत्ता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि इन कार्यों को कितनी तवज्जो दी जाती है। इसके बिना वृद्घि कमजोर बनी रहने की आशंका है। यह 6.6 फीसदी के मौजूदा दीर्घावधि के औसत से भी कम रह सकती है। मौजूदा वैश्विक संदर्भ में यह चाहे जितना असंतोषजनक हो लेकिन हमें इसका भी अहसानमंद रहना होगा। 
Keyword: india, economy, GDP,,
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