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ब्रिटेन के एनआईसी जैसे निकाय की जरूरत

विनायक चटर्जी /  February 27, 2020

भारतीय ढांचागत क्षेत्र में नई ऊर्जा भरने के लिए ब्रिटेन के एनआईसी जैसे नियामकीय संस्थान के गठन की जरूरत है। इसकी अहमियत को रेखांकित कर रहे हैं विनायक चटर्जी

 
तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 10 जुलाई, 2014 को संसद में अपना पहला बजट भाषण देते हुए खंड पांच के पैराग्राफ 110 में ढांचागत क्षेत्र का जिक्र किया था। जेटली ने कहा था, 'भारत दुनिया में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) का सबसे बड़ा बाजार बनकर उभरा है। इस समय 900 से अधिक परियोजनाएं विकास के विभिन्न चरणों में हैं। पीपीपी के जरिये हवाईअड्डों, बंदरगाहों और राजमार्गों के कुछ शानदार ढांचे तैयार किए गए हैं। लेकिन हमने पीपीपी प्रारूप में कुछ खामियां देखी हैं, अनुबंध प्रावधानों में कठोरता, अनुबंध बनाने के परिष्कृत एवं उन्नत मॉडल तैयार करने और विवाद निपटान की त्वरित व्यवस्था के विकास की जरूरत को महसूस किया है। भारत में पीपीपी करारों को मुख्यधारा में लाने के लिए 500 करोड़ रुपये के कोष से 3पी इंडिया नाम का संस्थागत आधार तैयार किया जाएगा।'
 
26 मई, 2015 :
 
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने पूर्व वित्त सचिव विजय केलकर की अध्यक्षता में एक नौ सदस्यीय समिति का गठन किया। इस समिति ने 19 नवंबर, 2015 को 'ढांचागत विकास के पीपीपी मॉडल की समीक्षा एवं पुनर्जीवन' पर केंद्रित अपनी रिपोर्ट पेश की। समिति ने 3पी इंडिया के गठन की पुरजोर वकालत करते हुए कहा कि यह संस्था पीपीपी में उत्कृष्टता केंद्र के तौर पर काम करने के अलावा क्षमता निर्माण से जुड़े शोध, समीक्षा एवं गतिविधियों का खाका पेश करेगी। केलकर समिति ने पीपीपी ढांचे के तीन प्रमुख स्तंभों- शासन, संस्थान और क्षमता को और मजबूत करने की जरूरत बताई ताकि क्रियान्वयन के नए दौर के लिए मजबूत ढांचा खड़ा किया जा सके।
 
31 दिसंबर, 2019 : 
 
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2019-25 के लिए राष्ट्रीय ढांचा पाइपलाइन (एनआईपी) पर गठित कार्यबल की रिपोर्ट जारी की। उन्होंने कहा, 'वर्ष 2024-25 तक पांच लाख करोड़ रुपये का जीडीपी लक्ष्य हासिल करने के लिए भारत को इस अवधि में ढांचागत क्षेत्र पर करीब 1.4 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की जरूरत है। चुनौती ढांचागत निवेश पर सालाना खर्च बढ़ाने की है ताकि ढांचे का अभाव भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि पर बाध्यकारी अवरोध न बने।' काफी पहले यह माना जा चुका है कि आर्थिक वृद्धि के प्रमुख वाहक के तौर पर ढांचागत एजेंडे को जोर-शोर से बढ़ाया जाए। एक दूरदृष्टि वाली एक परियोजना-पाइपलाइन की रूपरेखा और उसका वित्तपोषण करना ही काफी नहीं है, जरूरी संस्थागत क्षमता भी होनी चाहिए। ब्रिटेन में अक्टूबर 2015 में गठित राष्ट्रीय ढांचागत आयोग (एनआईसी) भी भारत के लिए कुछ सबक समेटे हुए है।
 
ब्रिटेन के एनआईसी का चार्टर क्या है?
 
ब्रिटेन के वित्त विभाग के मातहत एक स्वतंत्र एजेंसी के तौर पर संचालित होने वाली एनआईसी देश की दीर्घावधि ढांचागत प्राथमिकताओं पर केंद्रित थिंक-टैंक के तौर पर काम करती है। यह ढांचागत क्षेत्र से जुड़ी चुनौतियों और रणनीति पर सरकार को सलाह एवं अनुशंसा भी देती है। इसका अपना एक सचिवालय है जिसमें करीब 50 कर्मचारियों का नेतृत्व मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) करता है। एनआईसी लंबी अवधि का नजरिया लेकर चलता है। यह हरेक संंसद का कार्यकाल खत्म होने पर राष्ट्रीय ढांचागत आकलन प्रकाशित करता है और देश को 30 वर्ष तक की अवधि में पडऩे वाली ढांचागत जरूरतें तय करने के साथ ही इन जरूरतों को पूरा करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों की अनुशंसा भी सरकार को करता है।
 
लेकिन यह आयोग तात्कालिक जरूरतों पर भी नजर रखता है। विशुद्ध रूप से दीर्घकालिक नजरिया रखने में जोखिम यह है कि अगले 30 साल नहीं, बल्कि पांच साल को केंद्र में रखने वाली सरकार इसके सुझावों को नजरअंदाज ही कर दे। इसी वजह से आयोग तात्कालिक रूप से अहम ढांचागत जरूरतों पर क्षेत्र-केंद्रित रिपोर्ट जारी करता है। यह एक संकीर्ण क्षेत्र केंद्रण से परे है। मसलन, परिवहन क्षेत्र में यह बहुआयामी संदर्भों में समाधानों का परीक्षण करता है जिसमें सड़क, रेल और मेट्रो परिवहन के बीच अंतर्निर्भरता पर ध्यान दिया जाता है।
 
एनआईसी चार्टर सरकार के साथ संबंध, अधिकार और उत्तरदायित्व स्पष्ट करता है। सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह एनआईसी के दिए सुझावों पर कदम उठाए और कारण सहित यह बताए कि किस सुझाव को स्वीकार करना है और किसे खारिज? एनआईसी इन सुझावों पर प्रगति की निगरानी करता है। यह एक वार्षिक निगरानी रिपोर्ट प्रकाशित करता है जो इसके पुराने सुझावों पर हुई सरकारी प्रगति पर नजर रखती है। इस तरह से यह आकांक्षाओं एवं वास्तविक उपलब्धियों के बीच के फासले पर एक वस्तुस्थिति परीक्षण के तौर पर काम करता है। यह दूसरे संस्थानों के साथ पुल के तौर पर भी काम करता है। एनआईसी के चार्टर में कहा गया है कि इसे नीति-निर्माताओं, ढांचागत विशेषज्ञों और क्षेत्र नियामकों जैसे दूसरे हितधारकों के संपर्क में भी रहना चाहिए। यह अहम है क्योंकि भारत में एनआईसी से मिलते-जुलते संस्थानों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि मंत्रालय के कर्ताधर्ता अपनी जमीन बचाए रखने के लिए बाहरी संस्थानों से मिले सुझावों को स्वीकार करने में आनाकानी करते हैं।
 
एनआईसी को आम जनता से संवाद रखना होगा। इसका चार्टर के मुताबिक आयोग को अपनी रिपोर्ट तैयार करते समय आम लोगों से संपर्क करना होगा। जनता के ही सबसे बड़ा उपभोक्ता और अधिकांश ढांचागत परियोजनाओं का उपयोगकर्ता होने से यह कार्य सहमति-निर्माण के लिए बेहद अहम है। एनआईसी वित्तीय रूप से स्वतंत्र संस्था है। भले ही यह तकनीकी तौर पर वित्त विभाग के अधीन है लेकिन सरकार के साथ 'बहुवर्षीय वित्तीय समाधान' के जरिये इसे फंड मिलता है। ऐसा होने से आयोग को हर साल बजट में अपने लिए प्रावधान की फिक्र करने के बजाय एक साथ कई वर्षों के लिए फंड मिल जाता है।
 
इसी तरह इसकी परिचालनात्मक स्वतंत्रता का मुद्दा है। इसका चार्टर यह स्पष्ट करता है कि 'इसे स्वतंत्र ढंग से कार्यक्रम बनाने, कार्य-प्रणाली और अनुशंसाएं करने का पूर्ण विवेकाधिकार है। इसके अलावा अपनी रिपोर्ट एवं सार्वजनिक बयानों की सामग्री में भी उसे स्वतंत्रता होती है।' एनआईसी को प्रतिभाशाली लोगों को साथ जोडऩे की क्षमता है। भारतीय संस्थानों की एक कमजोरी यह रही है कि वे सेवानिवृत्त अफसरशाहों के लिए शरणगाह बनकर रह गए हैं। एनआईसी न केवल लोकसेवकों बल्कि ढांचागत क्षेत्र, स्थानीय सरकारों और नियामकों से भी पेशेवरों को अपने साथ जोड़ता है। भारतीय ढांचागत क्षेत्र में नई ऊर्जा भरना ब्रिटेन के एनआईसी जैसे संस्थान के गठन पर काफी हद तक निर्भर करता है। ब्रिटेन का एनआईसी जिन सिद्धांतों पर बना था वह इसकी राह दिखाता है।
 
(लेखक ढांचागत परामर्श फर्म फीडबैक इन्फ्रा के चेयरमैन हैं)
Keyword: Britain, railway, infra, arun jaitley,,
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