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फसल बीमा सुधार

संपादकीय /  February 27, 2020

सरकार ने अपनी शीर्ष फसल बीमा योजना, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) में सुधार के उपायों का जो पैकेज घोषित किया है वह किसानों की मदद के बजाय शायद उनका नुकसान अधिक कर दे। इसमें दो राय नहीं कि पैकेज में ऐसे सकारात्मक तत्त्व शामिल हैं जो किसानों को लाभ पहुंचा सकते हैं लेकिन कई अन्य उपाय ऐसे भी हैं जो शायद बीमा कंपनियों अथवा राज्य सरकारों को ठीक न लगें। एक बेहतर बात यह है कि फसल बीमा को सभी किसानों के लिए स्वैच्छिक बना दिया गया है। फिलहाल बैंक ऋण लेने वाले सभी किसानों के लिए यह बीमा अनिवार्य है जबकि अन्य लोगों के लिए यह स्वैच्छिक है। इसका एक अन्य स्वागतयोग्य गुण है नुकसान के आकलन को तयशुदा में पूरा करने की प्रक्रिया को तार्किक बनाना। यदि राज्य सरकार फसल कटाई के अनुभव आधारित आंकड़े तय अवधि में देने में नाकाम रहती है तो बीमा कंपनियों को दावों का निस्तारण प्रारंभिक अनुमान के आधार पर करने की इजाजत देना बेहतर होगा। ऐसा करने से दावों के निस्तारण में होने वाली अनावश्यक देरी कम होगी। इस योजना के खिलाफ दावा निपटाने में होने वाली देरी भी प्रमुख शिकायत है।

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बहरहाल, पीएमएफबीवाई का एक नकारात्मक पहलू ज्यादा चिंतित करने वाला है। नए डिजाइन में इस योजना के उस विशिष्ट गुण को मंद कर दिया गया है जो इसे अन्य कृषि बीमा योजनाओं से अलग करता है। इसमें वे तमाम जोखिम शामिल हैं जिनके बारे में सोचा जा सकता है। इसमें बुआई के पहले से फसल कटाई के बाद तक के सारे नुकसान शामिल थे। राज्यों को यह स्वायत्तता देने का भी प्रस्ताव है कि वे इस योजना के तहत कवर की जाने वाली बीमारियों का चयन करें। ऐसे में उन्हें यह इजाजत होगी कि वे उन किसानों को राहत प्रदान कर सकें जो सूखे के कारण फसल बुआई न कर सके हों या जिनकी खेतों में खड़ी फसल को नुकसान पहुंचा हो। इससे किसानों के लिए योजना की उपयोगिता कम होती है।
 
इसके अलावा नए मानक फसल बीमा प्रीमियम पर केंद्रीय सब्सिडी को असिंचित क्षेत्र में 30 फीसदी और सिंचित क्षेत्र में 25 फीसदी पर सीमित करते हैं। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों के लिए यह 90 फीसदी होगा। केंद्रीय सब्सिडी और बीमा कंपनी द्वारा उल्लिखित वास्तविक प्रीमियम का अंतर पूरी तरह राज्य सरकार द्वारा चुकता किया जाएगा। इससे पहले कुल सब्सिडी केंद्र और राज्य सरकारें समान मात्रा में साझा करती थीं। ऐसे में केंद्र का वित्तीय बोझ कम होगा लेकिन राज्यों पर बोझ बढ़ेगा जो शायद उन्हें स्वीकार्य न हो। बीमा कंपनियां भी उतना ऊंचा प्रीमियम नहीं ले पाएंगी जितना कि वे अब तक वसूल रही थीं। बीमारियों की आशंका वाले शुष्क इलाकों में जहां प्राय: सूखा पड़ता रहता है वहां वे 75 प्रतिशत तक प्रीमियम लेती रही हैं। चूंकि राज्य सरकारें इस उद्देश्य के लिए अधिक राशि देना नहीं चाहेंगी इसलिए बीमाकर्ता को या तो कम प्रीमियम लेना होगा या फिर वह योजना से बाहर हो जाएगी। दूसरे विकल्प की संभावना अधिक है क्योंकि चार निजी बीमा कंपनियां पहले ही पीएमएफबीवाई से बाहर निकल चुकी हैं। उनका कहना है कि कृषि बीमा मुनाफे का सौदा नहीं है। 
 
इसी प्रकार तीन राज्यों ने पीएमएफबीवाई का क्रियान्वयन रोक दिया है। इसके अलावा भी कई राज्यों ने केंद्र को यह नोटिस दिया है कि वे भी ऐसा ही करेंगे। केंद्रीय कृषि मंत्रालय भी इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं नजर आ रहा है। उसने पहले ही यह घोषणा कर दी है कि वह राज्यों के लिए विशेष तौर पर तैयार वैकल्पिक कार्यक्रम पेश करेगी। अब तक जितने भी फसल बीमा मॉडल आजमाए गए हैं उनके कमजोर ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए गैर बीमा आधारित जोखिम बचाव उपायों की आवश्यकता है। 
Keyword: agri, farmer, crop, insurance, PMFBY,
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