बिजनेस स्टैंडर्ड - कारोबारी सुगमता में हुआ सुधार लेकिन बढ़ सकती है असहजता
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कारोबारी सुगमता में हुआ सुधार लेकिन बढ़ सकती है असहजता

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  February 26, 2020

हाल के वर्षों में कारोबारी सुगमता सूचकांक में भारत का प्रदर्शन खासा बेहतर रहा है। विश्व बैंक द्वारा अक्टूबर 2019 में तैयार सूचकांक में भारत को 190 देशों की सूची में 63वें स्थान पर रखा गया था। यानी एक वर्ष में भारत ने 14 स्थानों का सुधार किया था। जबकि इससे पिछले वर्ष उसने 23 स्थानों की प्रगति की थी। विश्व बैंक ने 2019 की अपनी रिपोर्ट में कहा कि बीते कुछ वर्ष के दौरान किए गए सतत कारोबारी सुधारों ने भारत की मदद की है। उसने कहा कि लगातार तीसरे वर्ष भारत शीर्ष 10 सुधारक देशों में शामिल रहा। सूचकांक में भारत की स्थिति बेहतर करने वाले सुधारों में कारोबार शुरू करने के मानक सहज करना, निर्माण परमिट में बेहतरी, सीमा पार व्यापार सहज बनाना और ऋणशोधन के मामले हल करना शामिल है। विश्व बैंक की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ क्षेत्र गंभीर चिंता का विषय हैं। मसलन, अनुबंध प्रवर्तन के मामलों में भारत को 190 देशों में 163वां स्थान दिया गया है जबकि परिसंपत्ति पंजीयन में 153वां। बैंक के अनुसार परिसंपत्ति पंजीयन में औसतन 58 दिन और परिसंपत्ति मूल्य का 8 फीसदी व्यय होता है। यह उच्च आय वाले देशों से बहुत ज्यादा है। इसी तरह देश में निचली अदालत में वाणिज्यिक विवाद का मामला निपटने में 1,445 दिन लगते हैं जो विकसित देशों से करीब तीन गुना है। कारोबारी सुगमता सूचकांक में देश के विश्वसनीय प्रदर्शन के साथ यह देखना होगा कि क्या देश का मौजूदा आर्थिक नीति के माहौल से आने वाले वर्षों में और सुधार हो सकता है। हाल के दिनों में कुछ परेशान करने वाली घटनाएं घटी हैं जो कारोबारी सुगमता को प्रभावित कर सकती हैं। देश के दूरसंचार सेवा प्रदाता अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। सरकार उनसे और अधिक राजस्व की मांग कर रही है और न्याय व्यवस्था राजस्व दावे पर निर्णय सुनाने के पहले मौजूदा बाजार ढांचे को पहचानने से इनकार कर रही है।

 
सरकार और दूरसंचार कंपनियों के बीच समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) का आकलन कई वर्ष पिछड़ गया है। शुरुआत 2003 में हुई थी जब कंपनियों ने कहा था कि एजीआर में केवल दूरसंचार राजस्व शामिल किया जाना चाहिए जबकि सरकार का कहना था कि एजीआर में दूरसंचार और गैरदूरसंचार दोनों तरह के राजस्व शामिल होने चाहिए। एजीआर का आकलन सरकार को चुकता की जाने वाली लाइसेंस फीस के निर्धारण के लिए होना था। सन 1999 में यह एजीआर का 15 फीसदी थी और 2013 में इसे एजीआर का अधिकतम 8 फीसदी कर दिया गया। शुरुआती दौर में अदालती फैसले दूरसंचार कंपनियों के पक्ष में आए। दूसरे शब्दों में अदालत ने सरकार की उच्चतर एजीआर की मांग ठुकरा दी। उस वक्त तक कंपनियों ने दावे का 80 फीसदी चुका दिया था। सरकार ने राशि रिफंड करने के बजाय अपील में न केवल समूची राशि बल्कि ब्याज और जुर्माने की भी मांग की। अपील की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय ने की और सरकार जीत गई। अधिवक्ताओं संजय हेगड़े और प्रांजल किशोर ने बिज़नेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित एक आलेख में दलील दी थी कि दूरसंचार कंपनियों से मूलधन के अलावा ब्याज और जुर्माना चुकाने को कहना गलत है क्योंकि निचली अदालत में वे जीत गई थीं। यदि सरकार ने ब्याज और जुर्माने पर जोर नहीं दिया होता तो सबसे बड़ी अदालत के निर्णय पर कंपनियों की प्रतिक्रिया अलग होती। 
 
दूरसंचार कंपनियों से की जा रही 1.3 लाख करोड़ रुपये की कुल मांग का बमुश्किल एक-चौथाई हिस्सा मूल धन है, शेष राशि ब्याज और जुर्माने की है। ऐसा लगता है कि सरकार ने ब्याज और जुर्माने की राशि इसलिए नहीं जाने दी क्योंकि ऐसे निर्णय नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नजर में आ जाते हैं और बाद में ऐसे राजनीतिक विवादों को जन्म देते हैं कि निजी दूरसंचार कंपनियों का पक्ष लिया गया। सरकार द्वारा जुर्माने और ब्याज पर जोर देने की एक वजह यह भी है कि उसे अतिरिक्त राजस्व की जरूरत है ताकि राजस्व कमी दूर की जा सके। 
 
ब्याज और जुर्माने सहित समूची राशि चुकाने पर जोर देने का अर्थ यह भी है कि वोडाफोन आइडिया जैसी दूरसंचार कंपनियों पर दो अन्य बड़ी कंपनियों की तुलना में अधिक असर होगा। कंपनी का सकल बकाय 50,000 करोड़ रुपये से अधिक होगा। कंपनी कह चुकी है कि इतनी बड़ी राशि चुकाना उसके बस की बात नहीं है और उसे अपना कारोबार समेटना पड़ेगा। क्या सरकार ने इस निर्णय के नफा-नुकसान का आकलन किया है? जबकि इसका बोझ देश की तीन सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनियों में से एक को उठाना पड़ेगा? क्या उसे दूरसंचार बाजार ढांचे पर इस निर्णय के असर का आकलन करना चाहिए था? अंत में क्या सरकार ने यह समझा कि वोडाफोन आइडिया को इससे गहरा झटका लगेगा। यह कंपनी देश में 55 अरब डॉलर से अधिक का निवेश कर चुकी है। सरकार दूरसंचार क्षेत्र के लिए बेल आउट पैकेज ला सकती है ताकि वह मौजूदा भुगतान संकट से उबर सके। परंतु देश के निजी क्षेत्र पर इसका गहरा असर होगा।
 
मई 2019 के आम चुनाव में सत्ता में वापसी के बाद मोदी सरकार विदेशी निवेशकों के साथ दो बड़े मामलों में संबद्घ रही। एक मामला एमेजॉन के जेफ बेजोस से संबंधित है, जिनकी विदेशी निवेश संबंधी प्रतिबद्घताओं का सरकार के प्रतिनिधियों ने उपहास उड़ाया था। दूसरा मामला वोडाफोन आइडिया का है जिसका विदेशी साझेदार ब्रिटेन का वोडाफोन समूह एजीआर के बोझ तले दबा है। तीसरा मामला आने वाले महीनों में सुर्खियां बटोर सकता है। यह मामला है केयर्न एनर्जी और भारत सरकार के बीच 1.6 अरब रुपये के कर विवाद का जिस पर निर्णय आना है। किसी को नहीं पता कि यह मामला क्या मोड़ लेगा। परंतु कारोबारी सुगमता में सुधार पर गर्व करने वाले देश के लिए तीन बड़ी विदेशी कंपनियों एमेजॉन, वोडाफोन और केयर्न को प्रभावित करने वाला घटनाक्रम शायद भविष्य में इस सूचकांक में सुधार की संभावनाओं को प्रभावित करे। 
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