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कोरोनावायरस का खतरा मगर शोध एवं विकास का मौका

तकनीकी तंत्र
देवांशु दत्ता /  February 25, 2020

कोरोनावायरस महामारी कोविड-2019 से अब तक 2,600 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और 75,000 से अधिक संक्रमित हुए हैं। इसे रोकने का कोई भी उपाय सफल नहीं हुआ है। संकट का एक सकारात्मक पहलू यह हो सकता है कि इससे टीके पर शोध और इसके विकास की प्रक्रियाओं की समीक्षा हो सकती है। इससे नए टीकों का विकास और इस्तेमाल तेजी से होगा। अमूमन, किसी नए टीके को प्रयोगशाला से दुकानों तक पहुंचने में दस साल का समय लगता है। इसमें प्रीक्लीनिकल डेवलपमेंट, क्लिनिकल विकास के तीन चरण, प्रीरजिस्ट्रेशन, रजिस्ट्रेशन और फिर इसे बाजार में उतारने की प्रक्रिया होती है। नई प्रौद्योगिकी, त्वरित क्लीनिकल परीक्षणों और त्वरित नियामकीय मंजूरियों से कोविड-2019 के मामले में यह प्रक्रिया 12 से 18 महीने में निपट सकती है। 

 
सामान्य कोशिकाओं के उलट वायरस आरएनए या डीएनए के छोटे अंश होते हैं जो अपनी संख्या बढ़ाने के लिए किसी इंसान, जानवर या पक्षी की कोशिकाओं पर हमला करते हैं। उनके आकार तरह-तरह के होते हैं। कोविड-2019 जैसे कोरोनावायरस आरएनए आधारित होते हैं। कोविड-2019 खुद को किसी कोशिका से जोडऩे के लिए प्रोटीन की कुंडलित स्पाइक का इस्तेमाल करती है। जब यह स्पाइक कोशिका से जुड़ जाती है तो यह एकदम सीधी हो जाती है और कोशिका में घुसने के लिए छेद करती है। इसके बाद वायरस अपना प्रतिरूप बनाने के लिए मेजबान शरीर को चकमा देता है और उसे लगता है कि वायरस वैध आनुवंशिक निर्देश दे रहा है। 
 
शरीर वायरस के विशेष आकार को पहचानकर उससे लडऩे के लिए ऐंटीबॉडी विकसित करता है। अगर शरीर विशेष आकार के वायरस के एक हिस्से की भी पहचान करता है तब भी ऐंटीबॉडी काम करती हैं। लेकिन वायरस आकार बदलने में माहिर होते हैं ताकि प्रतिरोधक क्षमता को धोखा दे सकें। टीके शरीर को वायरस की पहचान करने में मदद करते हैं और ऐंटीबॉडीज को प्रोत्साहित करते हैं। इस तरह एक टीका वायरस के एक हिस्से को रोक सकता है। सब-यूनिट टीके वायरस के एक हिस्से को काबू करते हैं। अमूमन फ्लू शॉट्स और हैपेटाइटिस बी में इसका इस्तेमाल होता है। कुछ हल्के किस्म के टीके कमजोर किस्म के जीवित वायरस के खिलाफ कारगर होते हैं। खसरे का टीका इसी तरह का है। इसी तरह कुछ निष्क्रिय टीके भी होते हैं जो मृत वायरस को काबू करते हैं। रैबीज का टीका इसी श्रेणी का है। वर्ष 2017 में दावोस में कोएलिशन फॉर एपिडेमिक प्रीपेयर्डनेस इनोवेशंस (सीईपीआई) की शुरुआत हुई। यह एक निजी-सार्वजनिक अंतरराष्ट्रीय संस्था है जिसका मुख्यालय नॉर्वे में है। सार्स, इबोला और जीका जैसे खतरनाक वायरस के उभार से निपटने के लिए इसका गठन किया गया। इसका मिशन टीके के विकास की गति तेज करना और इसकी पहुंच व्यापक बनाना है। सीईपीआई अब कोविड-19 के खिलाफ नए टीके के विकास के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ सहयोग कर रहा है। इसमें कुछ दवा कंपनियों के साथ कार्यक्रम और क्वींसलैंड विश्वविद्यालय तथा यूएस नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी ऐंड इनफेक्शस डिजिजेज के साथ शोध कार्यक्रम शामिल है। 
 
सीईपीआई संभावित टीकों को तेजी से क्लीनिकल परीक्षण के लिए भेजेगी। उसका लक्ष्य मात्र 16 सप्ताह में वायरस की जीन सीक्वेंसिंग से लेकर क्लीनिकल परीक्षणों को प्रक्रिया को पूरा करना है। क्वींसलैंड विश्वविद्यालय में शोध इस दिशा में एक अहम कदम हो सकता है। वहां वैज्ञानिकों के एक दल ने एक नई तकनीक विकसित की है जिसे मोलेक्यूलर क्लैंपिंग नाम दिया गया है। इसमें किसी वायरस के जीवित नमूने के बजाय आधुनिक आनुवांशिक अनुक्रमण के जरिये सीधे जेनेटिक कोड का अध्ययन किया जाता है। 
 
कोविड-2019 का जीन अनुक्रमण 11 जनवरी को चीन में प्रकाशित हुआ था। क्वींसलैंड की टीम ने 'स्पाइक' के लिए कोड पर जोर दिया। इसे तैयार करने के लिए उन्हें पूरा वायरस बनाने की जरूरत नहीं होगी। 3डी में स्पाइक को मापने के लिए क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी का इस्तेमाल किया गया था। यह बायोमोलेक्यूल को समझने के लिए ठंडे कक्षों में इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप का उपयोग करने के लिए यह नई तकनीक है। इसके लिए 2017 में रसायन का नोबेल पुरस्कार दिया गया था।  इसके पीछे सोच यह है कि एक ऐसा कारगर टीका तैयार किया जाए जो कुंडलीकृत स्पाइक को कोशिकाओं में घुसने और उन्हें नुकसान पहुंचाने से पहले ही पहचान सके। अगर स्पाइक वायरस के मुख्य शरीर से अलग हो जाती है तो यह सीधी हो जाती है और यही वजह है कि इसके कुंडलीकृत आकार को पहचानना मुश्किल हो जाता है। यहीं पर मोलेक्यूलर क्लैंपिंग काम आता है। यह प्रोटीन के छोटे क्लैंप का इस्तेमाल करके स्पाइक को उसके निर्धारित कुंडलीकृत आकार में रखता है। क्वींसलैंड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इसे सात साल पहले विकसित किया था। 
 
पिछले सप्ताह विश्वविद्यालय के एक दल ने घोषणा की कि वह इसकी क्लैंप आकृति का पता लगाने में सफल रहे हैं और एक सप्ताह के भीतर जानवरों पर इसका क्लीनिकल परीक्षण शुरू होने की उम्मीद है। इसके तहत क्लैंप आकृतियों के बड़े जत्थे बनाए जाएंगे और इससे संभावित टीके का निर्माण किया जाएगा। अगर यह प्रयोग जानवरों में सफल रहता है तो फिर इंसानों पर इसका क्लीनिकल परीक्षण किया जाएगा। इन तरीकों से एक सफल टीके का विकास किया जा सकता है। अलबत्ता, सीईपीआई का मानना है कि इंसानों के लिए टीका विकसित होने से पहले इसे करीब 21 परीक्षणों से गुजरना पड़ सकता है। उम्मीद है कि इस संकट से पंजीकरण और नियामकीय मंजूरियों की रफ्तार बढ़ेगी और फिर बड़े पैमाने पर टीकों का उत्पादन शुरू होगा। यदि यह प्रक्रिया काम करती है तो अगली बार कोई नया वायरस आया तो उसके खिलाफ ज्यादा तेजी से कार्रवाई हो सकती है।
Keyword: Corona virus, china, india,,
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