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जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए टिकाऊ समाधान पर हो जोर

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  February 24, 2020

ऐसा लगता है कि जलवायु परिवर्तन के लिए मानव इतिहास में इससे बदतर समय नहीं हो सकता था। यह साफ है कि अब स्थितियां हाथ से निकल रही हैं। हर साल नया वर्ष शुरू होने तक हमें बताया जाता है कि यह सबसे गर्म वर्ष है। इसके बाद नया रिकॉर्ड टूट जाता है। जंगलों में आग से लेकर तूफानों के बार-बार आने और उनकी तीव्रता में इजाफा होने, अत्यधिक ठंडी लहरें और अत्यधिक गर्मी जैसी सभी स्थितियां बदतर होती जा रही हैं। लेकिन हमें इन हालात को काबू में करना होगा। असल तथ्य यह है कि जलवायु परिवर्तन वास्तविक है, यह घटित हो रहा है और यह हमारे विश्व के गरीबों को और हाशिये पर ला रहा है। भूमि पर काम करने वाले और पानी का इस्तेमाल करने वाले किसान, पशुपालक आदि सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। वे जलवायु परिवर्तन के पीडि़त हैं। दुनिया के गरीबों की इस समस्या को पैदा करने में कोई भूमिका नहीं है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी तकलीफ हमारी दुनिया को ज्यादा असुरक्षित बना देगी। हालांकि उनकी तकलीफ और बढऩे जा रही है। यही वजह है कि हमें तत्काल इस पर काम करने की जरूरत है। 

 
इनमें से प्रत्येक प्राकृतिक आपदा नहीं है। ये आपदाएं विकास लाभ को छीन लेती हैं, जिनके लिए सरकार इतनी अधिक मेहनत करती हैं। घर और अन्य व्यक्तिगत संपत्तियां बह जाती हैं, सड़क एवं बुनियादी ढांचा नष्ट हो जाता है और सभी को फिर से बनाना पड़ता है। यह भी साफ है कि बाढ़ या सूखे का केवल जलवायु परिवर्तन या मौसम में बदलाव से ही लेना-देना नहीं है। हकीकत यह है कि सूखे का संबंध जल संसाधनों के कुप्रबंधन से भी है, जहां पर्याप्त बारिश का पानी फिर से जमीन में नहीं डाला जा रहा है या जल का अकुशल एवं असमान उपयोग हो रहा है। बाढ़ की वजह जल निकासी की योजना नहीं बना पाना, ढालू क्षेत्र में वनों की सुरक्षा की चिंता नहीं करना या बाढग़्रस्त क्षेत्र का निर्माण और उसे नष्ट करना आदि शामिल हैं। पहले से ही कुप्रबंधित भूमि और कंगाल राजनीति के अलावा खराब मौसम भी हालात को विकट बनाता है। 
 
मैं इसे दोहरी मार मानती हूं। पहले से ही गर्म और जल के अभाव वाली जमीन के लिए उच्च तापमान स्थितियों को विकराल बना रहा है। हरे-भरे क्षेत्र का अभाव मरुस्थलीकरण की स्थितियां बढ़ाता है। वहीं भूमिजल के अतिदोहन और सिंचाई की अच्छी पद्धतियों को नहीं अपनाए जाने से भूमि खराब होती है। इसके अलावा हम जिस तरह से खेती कर रहे है और हम जो खा रहे हैं, उसकी वजह से भूमि का इस्तेमाल बढ़ रहा है। और हम जिस तरह से उगा रहे हैं, उससे वह उत्पादित हो रहा है, जो हम खाते हैं। 
 
जलवायु परिवर्तन और भूमि पर आईपीसीसी की 2019 की रिपोर्ट में यह सही कहा गया है कि आधुनिक कृषि में रसायनों का इस्तेमाल बढ़ा है और इसका औद्योगीकरण बढ़ा है। इससे ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। रिपोर्ट में खानपान में बदलाव की जरूरत बताई गई है, जिनसे हम पृथ्वी पर आसानी से अपना सफर पूरा कर सकेंगे। अब हमारे खानपान और हमारे जलवायु परिवर्तन फुटप्रिंट को जोड़ा गया है। यह साफ है कि असामान्य मौसम की तीव्रता और बारंबारता में बढ़ोतरी के कारण आपदाओं की संख्या में इजाफा हो रहा है, जिससे गरीब और गरीब होंगे। उनकी गरीबी उन्हें भूमि को छोड़कर जीविका के अन्य विकल्प तलाशने पर मजबूर करेगी। उनके पास एकमात्र विकल्प आप्रवास- किसी शहर या अन्य देेश में जाना होगा। हमारी वैश्विक दुनिया आपस में जुड़ा हुआ और एक-दूसरे पर निर्भर है। इसे हमें पहचानना होगा। 
 
इसमें मौके मौजूद हैं। अगर हम अपने भूमि और जल के प्रबंधन को सुधार लें तो हम जलवायु परिवर्तन  के भयंकर असर से बच सकते हैं। हम सबसे गरीब लोगों के लिए संपत्ति बना सकते हैं और उनकी जीविका सुधार सकते हैं। ऐसा करके हम ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम कर सकते हैं क्योंकि अधिक पेड़ कार्बनडाइऑक्साइड को अवशोषित करेंगे। मिट्टी की सेहत में सुधार से कार्बनडाइऑक्साइड पर अंकुश लगेगा और सबसे महत्त्वपूर्ण कृषि के तरीकों और खानपान में बदलाव से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा। यहीं वास्तविक जवाब छिपा है। 
 
इसलिए हमें गरीबों की अर्थव्यवस्थाओं में निवेश करना होगा। हमें उनकी क्षमताएं बनानी होंगी ताकि वे न केवल अगली आपदा को झेल सकें बल्कि असल में आपदा पर पार पा सकें। इसके लिए हमें उन पारिस्थितिकी परिसंपत्तियों- रेनवाटर हार्वेस्टिंग से लेकर बेहतर खाद्य प्रणालियों पर निवेश करना होगा, जो ज्यादा टिकाऊ हैं। हमें टिकाऊ शब्द को फिर से परिभाषित करना होगा। आम तौर पर अधिक लागत वाली कृषि पद्धतियां उत्पादक होती हैं, लेकिन टिकाऊ नहीं होती हैं। जब किसानों का कर्ज अधिक होता है तो उनके झटका लगने की ज्यादा आशंका होती है। इसलिए हमें छोटी जोत वाली कृषि पद्धतियों को समझने की जरूरत है, जो बहुफसली, कम लागत वाली और झटकों को झेलने के लिए बनी हैं। हमें उन्हें मजबूत करना होगा, न कि उनकी जगह अपनी पद्धतियां लागू करना। गरीब का ज्ञान कम नहीं है। वे निरक्षर हैं, लेकिन साक्षरों के लिए बहुत बड़े संसाधन हैं। हमारा प्रयास सीखना और देना होना चाहिए। 
 
लेकिन आखिर में मैं पूरे दृढ़विश्वास से यह कहना चाहूंगी कि गरीब या अमीर खुद को बढ़ते तापमान के मुताबिक नहीं ढाल सकते, इसलिए विनाश बड़ा और प्रलयकारी होगा। इसलिए अगर हम कारोबारों को भी अलग तरीके से बनाते या निवेश करते हैं तो हमें ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने पर कड़े कदम उठाने होंगे। अभी तक दुनिया ने बहुत कम और बहुत देरी से किया है। इस प्रवृत्ति में बदलाव जरूरी है। हम सब के लिए। 
Keyword: environment, climet change, IPCC,
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