बिजनेस स्टैंडर्ड - डिजिटल अर्थव्यवस्था पर करारोपण की चुनौतियां
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डिजिटल अर्थव्यवस्था पर करारोपण की चुनौतियां

पार्थसारथि शोम /  February 24, 2020

इलेक्ट्रॉनिक तरीके से सेवाएं देने के ऑनलाइन कारोबार पर करारोपण की राह में कई तरह की चुनौतियां हैं। इन समस्याओं पर विस्तार से रोशनी डाल रहे हैं पार्थसारथि शोम

 
डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कर लगाने का तरीका एक ऐसा मसला है जो अंतरराष्ट्रीय नीति-निर्माताओं की चिंता का विषय बना हुआ है। गत अगस्त में आईटीआरएएफ1 के शोधकर्ताओं ने इस प्रत्यक्ष एवं परोक्ष कराधान से जुड़ी सीमाओं का जिक्र किया था। कुछ दिन पहले प्रकाशित एक संस्करण में इस रिपोर्ट के नतीजे रखे गए हैं जो अंतरराष्ट्रीय कराधान पर वार्षिक शृंखला का चौथा संस्करण है। शिखा मेहरा और रोहित रॉय ने ब्लॉकचेन और उसकी कर चुनौतियों के बारे में लिखा है। कंपनी आयकर में लाभ को आधार के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि वीवर्क और उबर जैसी बड़ी मूल्य वाली इंटरनेट कंपनियों का आधुनिक कारोबारी मॉडल मुनाफे के बजाय परंपरागत कर नेटवर्क को बाइपास करते हुए वृद्धि-केंद्रित मॉडल की तरफ खिसकता जा रहा है। इसके जवाब में कर-आधारित क्षरण एवं लाभ स्थानांतरण (बीईपीएस) से निपटने के लिए आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी), संयुक्त राष्ट्र और देशों के स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं।
 
ओईसीडी की अंतरिम रिपोर्ट के मुताबिक, वेब 2.0 के दौर में तकनीकी प्रगति ने फेसबुक, उबर और एमेजॉन जैसे डेटा एग्रीगेटरों पर सक्रिय कंपनियों के मुनाफे में खासी बढ़ोतरी की है। इसके उलट डेटा के मौलिक यानी उपयोगकर्ताओं को शायद ही कोई आय होती है। इसके अलावा इन कंपनियों की उन देशों में मौजूदगी बहुत कम या नदारद है जहां से ये डेटा जुटाती हैं। इसके उलट वेब 3.0 तकनीक उपयोगकर्ताओं को अपने डेटा का स्वामित्व देती है और वे इस डेटा को इन कंपनियों को बेचकर कमाई कर सकते हैं। अगर इसे लागू किया जाए तो इससे कर क्षेत्राधिकार तय हो सकेगा जहां से उपयोगकर्ता-जनित डेटा जुटाया गया है ताकि अपने स्रोत पर ही ऐसे डेटा की बिक्री को चिह्निïत किया जा सके। ब्लॉकचेन जैसी तकनीकों की मदद से डेटा बाजार स्थल का सृजन कर क्षेत्राधिकार को यह अधिकार देगा कि ऐसे डेटा की बिक्री पर स्रोत पर ही कर लगा दिया जाए। भारतीय कर नियम ऐसे तकनीकी बदलावों के साथ तारतम्य बिठाने की अपनी क्षमता बढ़ाने वाले  प्रावधान लेकर आ रहे हैं।
 
डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कर लगाने के तीन बुनियादी अवयवों का जिक्र आलोक प्रसन्न कुमार और विनती अग्रवाल ने किया है। इनमें आय का चरित्र तय करना, डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़े गठजोड़ की पहचान और एक स्थायी प्रतिष्ठान (पीई) का वजूद मान लिए जाने के बाद लाभ निर्धारण के नियम बनाना शामिल हैं। कर संधियों में लाभ पर करारोपण का अधिकार दिया जाता है, अगर एक पीई या कारोबारी गठजोड़ स्थापित हो जाए। कारोबारी आय पर 40 फीसदी और रॉयल्टी पर 10 फीसदी कर लगाने का प्रावधान है। कर अधिकारी जहां कारोबारी आय की प्रकृति तय करने को तरजीह देते हैं, वहीं कारोबारी प्रतिष्ठान रॉयल्टी को प्राथमिकता देते हैं। स्पष्ट है कि ग्राहक शुल्क से हुई आय के प्रकृति निर्धारण को लेकर विवाद पैदा होते हैं। भले ही एक पीई का भौगोलिक संबंध होता है लेकिन एक डिजिटल उद्यम को स्थानीय कर्मचारियों की जरूरत नहीं भी पड़ सकती है। इस तरह निष्पादित कार्यों पर आधारित आर्म-लेंथ कीमत पीई जैसी गणनाओं के लिए चुनौती बनी रहती है।
 
ओईसीडी की अंतिम रिपोर्ट 2020 में आने की संभावना है। यह तीन विकल्पों- समान शुल्क (ईएल), कर कटौती और महत्त्वपूर्ण आर्थिक मौजूदगी (एसईपी) की अवधारणा को स्वीकृति पर गौर करता है। गठजोड़ एवं पीई के साक्ष्य-निर्धारण के लिए गठित एक कार्यबल ने एसईपी अवधारणा का विकास किया था। इस तरह यह भौतिक उपस्थिति से अलग है। एसईपी के तहत राजस्व-आधारित, उपयोगकर्ता-आधारित और डिजिटल कारक शामिल हैं। डिजिटल कारक का आशय स्थानीय डोमेन नेम, स्थानीय डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्थानीय भुगतान विकल्प से है और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर कर लगाने के माध्यम हैं।
 
भारत का ईएल एक अस्पष्ट प्रकृति और उससे जुड़ी अनिश्चितताओं से ग्रसित है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू होने के बाद ईएल का स्वतंत्र वजूद नहीं रहना चाहिए। ईएल की कटौती आयकर के बरक्स नहीं की जाती है लिहाजा यह दोहरे कराधान का स्रोत हो जाता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की डेटा स्थानीयता जरूरत उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा के लिए भुगतान प्रणाली ऑपरेटरों के लिए भारत में ही डेटा भंडारण अनिवार्य करती है। फिर भी यह प्रावधान इन कारोबारों को परोक्ष रूप से पीई में तब्दील कर देता है और उन्हें भारतीय कराधान व्यवस्था में शामिल करता है।
 
अमेरिका और अन्य उन्नत अर्थव्यवस्थाएं इसे डिजिटल अर्थव्यवस्था के इर्दगिर्द घेराबंदी के तौर पर देखते हैं। लिहाजा इस कर एवं दुनिया में इसके इतर स्वरूपों का भावी पथ अनिश्चित बना हुआ है। कृपा वेंकटेश अप्रत्यक्ष कर, इसके राजस्व संग्रह और मूल्य-वद्र्धित कर या जीएसटी और सीमा शुल्क के गतिरोधों पर गौर करती हैं। जीएसटी उपभोक्ताओं पर लगने वाला ऐसा कर है जिसका सरकार के एजेंट के तौर पर संकलन कारोबार करते हैं। कारोबारों पर ही इसका बोझ डालना इसका मकसद नहीं है लेकिन असल में उन्हें ही कर के संग्रह और बार-बार कर रिटर्न जमा करने की लागत उठाने और रिफंड के लिए इंतजार करने, ऑडिट एवं समीक्षा का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इस तरह कारोबारों पर बोझ अभी तक कम नहीं हुआ है।
 
वस्तुओं के सीमापार कारोबार पर कर लगाना सेवाओं की तुलना में कहीं अधिक आसान है। वस्तुओं के आयात पर लगा जीएसटी कस्टम सीमा पर संग्रह किया जाता है और निर्यात पर कर की दर शून्य है। इस तरह आयातित उत्पादों पर भी घरेलू उत्पाद जितना ही कर लगता है जबकि निर्यात में इनपुट पर कोई कर नहीं लगता है क्योंकि उस पर इनपुट टैक्स क्रेडिट मिलता है। हालांकि सीमापार सेवाओं खासकर इलेक्ट्रॉनिक ढंग से दी जाने वाली सेवाओं (ईएसएस) पर कराधान एक चुनौती ही है क्योंकि यह अधिक आसानी से कर से बच सकता है। ईएसएस के कारोबारी मॉडल में टिकटिंग सेवा, सॉफ्टवेयर डाउनलोड, रेडियो एवं टीवी प्रसारण और दूरसंचार जैसी 'ऑर्डर को मुकाम तक पहुंचाने वाली' सेवाएं आती हैं।
 
यह एक हाईब्रिड श्रेणी है, मसलन, ऑनलाइन खुदरा एवं होटल बुकिंग ऑनलाइन ऑर्डर को ऑफलाइन तरीके से पूरा करना। उनकी संरचना जटिल होती है जिसमें विभिन्न सेवा प्रदाताओं का स्तर है। आईजीएसटी अधिनियम की धारा 2(17) में उल्लिखित डिजिटल सेवाओं की एक विस्तृत सूची है जबकि हाईब्रिड उत्पादों का समरूप करारोपण एक चुनौती बनी हुई है। आपूर्ति एवं उपभोक्ताओं का एक अजीब मेल मसलन, बी2बी या बी2सी भी चिंता का मुद्दा है। अगर उस कारोबार का पंजीकरण नहीं हुआ है तो वह उपभोक्ता यानी सी की ही तरह कर-योग्य है। 'समकक्ष से समकक्ष' श्रेणी में भी दोनों पक्ष गैर-पंजीकृत होते हैं और इसमें एकबारगी या पुराने सामान की बिक्री भी शामिल है। किसी सेवा का ऐसा चरित्र-चित्रण और कराधान के न्याय-क्षेत्र की दृढ़ता चुनौतियां पैदा करती है। संग्रह का असली आधार ही बताता है कि आपूर्तिकर्ता उस क्षेत्र में है या नहीं।
 
हाईब्रिड मॉडल, खासकर डिजिटल आपूर्ति को निर्धारित करने में कर संग्रह खासा जटिल हो जाता है। वेंकटेश अंतरराष्ट्रीय अदालत में आए मामलों के जरिये अप्रत्यक्ष कराधान की जटिलता को दिखाते हैं। उबर के खिलाफ दायर एक मामले में यह फैसला आया कि उबर की तरफ से दी गई सेवा उसकी प्रमुख सेवा परिवहन का ही हिस्सा है लिहाजा उसे ई-कॉमर्स में नहीं शामिल कर सकते हैं। ईएसएस पर कराधान में न्याय-क्षेत्र का मसला बढ़ जाता है क्योंकि कारोबार निम्न कराधान वाले देशों में पंजीकरण पर जोर देते हैं। लिहाजा विदेशी ईएसएस की जांच या ऑडिट कर पाना मुश्किल है। ओईसीडी और यूरोपीय संघ ने जीएसटी के प्रभावी संग्रह की व्यवस्था पर मार्गदर्शन दिया है। यहां आपूर्तिकर्ता उस देश का नहीं है जहां पर कर लगना है जबकि आपूर्ति का स्थान ही सेवा पाने वाले की जगह होनी चाहिए।
 
ध्यान रखें कि इस प्रक्रिया में नीति-निर्माता डिजिटल अर्थव्यवस्था की सामाजिक उत्पादकता को गंवा रहे हैं। मंदी की तरफ बढ़ते वैश्विक आर्थिक परिवेश में सरकारी व्यय से अधिक आकार होने के बावजूद इसकी चिंता कम ही है। विडंबना की बात है कि अमेरिकी नीति-निर्माता इस प्रक्रिया पर लगाम लगा सकते हैं।
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