बिजनेस स्टैंडर्ड - कारोबारी फैसलों को टाल नहीं पाएगा भारत
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कारोबारी फैसलों को टाल नहीं पाएगा भारत

आदिति फडणीस /  February 23, 2020

राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की भारत यात्रा से वास्तविक लाभ होने के आसार कम हैं, लेकिन कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनैशनल पीस के सीनियर फैलो और अमेरिका में राजनीतिक मामलों के अंडरसेक्रेटरी ऑफ स्टेट के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार एश्ले टेलिस ने आदिति फडणीस को बताया कि भारत लंबे समय तक अमेरिका के साथ अपने अहम कारोबारी और अन्य फैसलों को नहीं टाल पाएगा। बातचीत के संक्षिप्त अंश: 

 
आपके अनुमान से अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के क्या नतीजे रहेंगे? 
 
राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस यात्रा को अमेरिकी-भारतीय रणनीतिक साझेदारी की ताकत के रूप में दिखाना चाहते हैं। आम तौर पर किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति की राजकीय यात्रा के यही उद्देश्य होते हैं। लेकिन यह यात्रा ट्रंप के कुछ अलग मिजाज का राष्ट्रपति होने और अमेरिका के धनी वर्ग का भारत को लेकर नजरिया बदलने की वजह से विशेष है। ट्रंप के 'अमेरिका फस्र्ट' एजेंडे से भारत की अमेरिका से अधिक सहयोग की उम्मीदें टूट सकती थीं, लेकिन ट्रंप की इस नीति का भारत पर उतना असर नहीं पड़ा, जितना पड़ सकता था। ऐसे में मोदी इस बात से संतुष्ट हो सकते हैं कि उनके ट्रंप के साथ लगातार जुड़ाव का कम से कम अब तक फायदा मिला है। ट्रंप के लिए महत्त्वपूर्ण कारोबारी सौदे पर भारत के सहमत नहीं होने के बावजूद वह भारत आ रहे हैं। उन्होंने खुद इस बात को स्वीकार किया है, 'भारत का हमारे प्रति रुख बहुत अच्छा नहीं रहा, लेकिन मैं प्रधानमंत्री मोदी को बहुत पसंद करता हूं।'
 
ऐसे में क्या ट्रंप की यह यात्रा महज औपचारिकता है? 
 
दोनों नेता अपने-अपने देशों की जनता और अपने विदेशी प्रतिस्पर्धियों को रणनीतिक भागीदारी दिखा रहे हैं। मेरा मानना है कि इस यात्रा में रणनीतिक मुद्दों को लेकर चर्चा पर जोर दिया जाएगा। मेरा मानना है कि भारत ट्रंप को यह दिखाना चाहेगा कि वह अमेरिकी ऊर्जा की खरीद बढ़ाकर और तीसरी दुनिया के देशों में विकास परियोजनाओं में सहयोगी बनकर अमेरिका का अच्छा आर्थिक साझेदार बनना चाहता है, इसलिए केवल औपचारिकता के बजाय कुछ ठोस नतीजे आएंगे। 
 
भारत सरकार के घरेलू राजनीतिक एजेंडे से भारत-अमेरिका के संबंध कितने प्रभावित हुए हैं? 
 
यह एक जटिल सवाल है क्योंकि मोदी सरकार के एजेंडे में आर्थिक और राजनीतिक मुद्दे शामिल हैं। ऐसा लगता है कि मौजूदा भारत सरकार का विदेशी व्यापार को लेकर रुख आयात के विकल्पों और आत्मनिर्भरता की तरफ बढऩा है। इससे ट्रंप काफी नाखुश है। मैं इस बात से अचंभित हूं कि ट्रंप यह जानते हुए भी भारत आ रहे हैं कि कारोबारी सौदे को लेकर अनिश्चितता है। ऐसा लगता है कि मोदी के करिश्मे और राजदूत केन जस्टर की वकालत के बाद वे ऐसा कर रहे हैं। लेकिन ट्रंप अपने लक्ष्यों को नहीं भूले हैं और यदि अमेरिकी प्रशासन जिन छोटे मुद्दों पर आगे बढऩे के लिए कह रहा है, उनका समाधान नहीं हुआ तो यात्रा के बाद की स्थितियां यात्रा जितनी सुखद नहीं होंगी। अगर ट्रंप फिर से चुने जाते हैं तो मोदी सरकार इन मुद्दों के समाधान से बच नहीं पाएगी। हाल में भारत के घरेलू राजनीतिक घटनाक्रमों से भी अमेरिकी प्रशासन में चिंताएं पैदा हुई हैं, लेकिन वरिष्ठ अधिकारी इसे सार्वजनिक रूप से मुद्दा नहीं बनाना चाहते हैं। इस सार्वजनिक चुप्पी को लेकर यह नहीं माना जाना चाहिए कि कोई चिंता नहीं है, लेकिन चिंताएं सभी लोगों में अलग-अलग हैं। कांग्रेस, प्रेस और एनजीओ में भारत सरकार की नीतियों को लेकर नाखुशी जाहिर है। लेकिन मैं इन प्रतिक्रियाओं को फिलहाल भारत-अमेरिकी संबंधों में घातक नहीं मानता हूं। लेकिन कार्यपालिका तथा विधायिका और रिपब्लिकन तथा डेमोक्रेट्स के बीच बढ़ती खाई को अगर कम नहीं किया गया तो दोनों देशों के संबंधों में बेहतरी मुश्किल होगी। हमें अमेरिका में भारत के साथ संबंधों को विवाद का एक नया विषय बनाने की जरूरत नहीं है।
 
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चुनाव के बावजूद भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते से पीछे नहीं हटे। क्या आपको लगता है कि उस बड़े राजनीतिक दांव के बाद भारत और अमेरिका को फायदा मिला? आखिर किसने किसे निराश किया? 
 
इस सौदे को पूरा करने से कुछ बुनियादी उद्देश्य पूरे हुए, जिनकी हमने बुश प्रशासन के दौरान योजना बनाई थी। ये उद्देश्य थे- दशकों पुरानी उस सबसे बड़ी बाधा को खत्म करना, जिसने अमेरिका को लेकर भारत के संदेहों को पक्का किया था। भारत को अपने परमाणु हथियारों को त्यागे बिना अप्रसार संधि में शामिल करना था। प्रतिबंधित तकनीकों को ज्यादा उदार तरीके से साझा करने की मंजूरी देना ताकि चीन को संतुलित करने के लिए भारत की ताकत बढ़ाई जा सके। मैं कहना चाहूंगा कि ये सभी उद्देश्य संतोषजनक रहे हैं। 
 
क्या यह सौदा ज्यादा भारत के पक्ष में था? 
 
निश्चित रूप से, लेकिन यह जानबूझकर किया गया। कम से कम अभी तक हम जिस लक्ष्य में कामयाब नहीं हुए, वह अमेरिकी परमाणु रिएक्टरों की भारत को वाणिज्यिक बिक्री है। अमेरिकी प्रशासन में बहुत से लोगों ने उम्मीद की थी कि भारत बड़ी संख्या में अमेरिकी रिएक्टर खरीदेगा। लेकिन भारत के परमाणु जिम्मेदारी कानून के कुप्रबंधन और फुकुशिमा त्रासदी के बाद यह और मुश्किल हो गया। मेरा अब भी मानना है कि हम भारत को रिएक्टरों की बिक्री करेंगे। जिस चीज में अन्य जगह वर्षों लगते हैं, उसके पूरे होने में भारत में दशकों लगते हैं। लेकिन जब आप अमेरिकी-भारतीय संबंधों पर असर को देखते हैं तो इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हमारे मुख्य उद्देश्य पूरे हो गए। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को संतुलित करने, रक्षा व्यापार में बढ़ोतरी, हिंद महासागर में दोनों देशों के सक्रिय गठजोड़ जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढऩा उस फैसले को सही साबित करता है। 
 
भारत-अमेरिका के बीच कारोबारी सौदा होने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं। भारत पहले ही आरसेप से बाहर हो चुका है। भविष्य में कारोबारी सौदा होने की कितनी संभावनाएं हैं और क्या इसका हमेशा अमेरिका फस्र्ट से टकराव नहीं होगा? 
 
मोदी सरकार का अमेरिकी प्रशासन के साथ कारोबारी विवादों का समाधान नहीं कर पाना निराशाजनक है। यह भारत को महंगा पड़ सकता है। यह ट्रंप प्रशासन के तहत अप्रत्याशित सफल रणनीतिक साझेदारी के तहत एक नकारात्मक पहलू है। अन्य मामलों में ट्रंप ने अमेरिकी कारोबारी संतुलन को सही करने पर ध्यान दिया है। लेकिन इससे इतर ट्रंप ने भारत के साथ जिन मुद्दों को सुलझाने की कोशिश की है, वे बहुत कम हैं और इन्हें मोदी के वृहद उद्देश्यों पर बड़े असर के बिना हल किया जा सकता है। लेकिन आर्थिक मंदी, मोदी सरकार के संरक्षणवादी पहलों और आत्मनिर्भरता के महत्त्वाकांक्षा की तरफ लौटने से भारत संतोषजनक समाधान नहीं ढूंढ पाया है। ई-कॉमर्स और डेटा को स्थानीय स्तर पर भंडारित करने जैसे बड़े मुद्दे भी सामने आ सकते हैं। 
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