बिजनेस स्टैंडर्ड - मौजूदा माहौल में खत्म हो रहा अराजनीतिक कंपनी का दौर
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मौजूदा माहौल में खत्म हो रहा अराजनीतिक कंपनी का दौर

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  February 23, 2020

मौजूदा दौर में भारतीय कॉर्पोरेट जगत की उस स्थापित परंपरा को कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ रहा है जिसमें वह किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी की विचारधारा से जुड़े विवाद में नहीं पडऩा चाहता है। ये गतिविधियां मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा समाज की वैचारिक लामबंदी का ही नतीजा हैं। हाल की तीन घटनाएं दिखाती हैं कि गहन राजनीतिक उपदेशवाद की इस प्रक्रिया का उपभोक्ताओं एवं सेवा-प्रदाताओं के आपसी संबंधों पर असर डालने के अनचाहे नतीजे रहे हैं। इस वजह से उन्हें अपने वैचारिक रंग दिखाने (या न दिखाने) के लिए मजबूर होना पड़ा है।

 
पहली घटना पिछले साल अगस्त की है। मध्य प्रदेश में जबलपुर के निवासी अमित शुक्ला ने ट्विटर पर बताया था कि फूड डिलिवरी कंपनी जोमैटो की तरफ से एक गैर-हिंदू शख्स को डिलिवरी के लिए भेजे जाने पर उसने ऑर्डर लेने से मना कर दिया था। जोमैटो ने इस ऑर्डर का रिफंड करने से मना करते हुए कहा था कि 'भोजन का कोई धर्म नहीं होता है, यह खुद एक धर्म है।' जोमैटो के संस्थापक दीपिंदर गोयल ने इस कदम को राजनीतिक तौर पर सही संदेश के साथ उचित बताया था। गोयल ने भारत की विविधता का जिक्र करते हुए कहा था, 'अपने मूल्यों की राह में आने वाले किसी भी कारोबार को खोने का हमें अफसोस नहीं है।' इस चतुराई भरे बयान से गोयल ने इसे पसंद करने या नकारने का जिम्मा ग्राहकों पर ही छोड़ दिया था।
 
शायद जोमैटो खुशकिस्मत थी कि यह वाकया एक गैर-भाजपा  शासित राज्य में हुआ था। पुलिस ने फौरन शुक्ला को 10,000 रुपये का बॉन्ड भरने का फरमान जारी कर दिया। पुलिस ने कहा था कि शुक्ला का ट्वीट जबलपुर जैसे संवेदनशील शहर में शांति को बाधित कर सकता था। लेकिन कैब सेवा कंपनी उबर को इस महीने की शुरुआत में मुंबई की पुलिस से ऐसा साथ नहीं मिला। उबर के एक ड्राइवर ने अपनी टैक्सी में बैठे एक सवारी की शिकायत पुलिस से सिर्फ इसलिए कर दी थी कि वह नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ बातें कर रहा था। ड्राइवर ने अपनी सवारी की बातें रिकॉर्ड कर ली थीं और उसे 'राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों' में लिप्त बता रहा था। टैक्सी में बैठे सवारी की निजता का हनन करने वाले इस काम पर कार्रवाई करने के बजाय पुलिस ने उस युवक को ही पूछताछ के लिए बिठा लिया और इस चेतावनी के साथ छोड़ा कि ऐसे 'खराब समय' में लाल स्कार्फ न पहने। इस घटना पर उबर की प्रतिक्रिया नरम रही। उसने दोषी ड्राइवर को 72 घंटों के लिए सेवा से निलंबित कर दिया और बाद में बहाल करते हुए उसे फिर से प्रशिक्षण कार्यक्रम में भेज दिया। उबर के साथ जुडऩे पर हरेक ड्राइवर को अपने सवारियों के साथ बरताव के तौर-तरीके सिखाने के लिए इस क्लास में हिस्सा लेना जरूरी होता है।
 
उबर के इस कदम से कई सवाल खड़े होते हैं। पहला, क्या उबर को यह बात आपत्तिजनक नहीं लगी कि एक सेवा-प्रदाता किसी ग्राहक की बातचीत उसकी अनुमति के बगैर कैसे रिकॉर्ड कर सकता है? दूसरा, इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में क्या सिखाया जाता है? क्या एक यात्री की जासूसी न करना और अपने काम से मतलब रखना ड्राइवरों के बुनियादी प्रशिक्षण का हिस्सा नहीं है? अगर ऐसा प्रशिक्षण दिया जाता है तो निश्चित तौर पर इस ड्राइवर ने पहली बार इस सबक को नहीं सीखा था। क्या इस बार ऐसा होने की संभावना है, वो भी ऐसे वक्त में जब स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओं ने एक 'जागरूक नागरिक' होने के लिए उसका सम्मान किया हो? अगर यही घटना अमेरिका में हुई रहती तब भी क्या उबर की प्रतिक्रिया यही रहती? गत जनवरी में भी ओला का एक ड्राइवर फोन पर हो रही बातचीत में मोदी सरकार की आलोचना करने वाले ग्राहक से झगड़ बैठा था।
 
जब सवारी ने ओला से इसकी शिकायत की तो प्रबंधन ने इस पर 'सुधारात्मक कदम' उठाने की बात कही लेकिन 'भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों के सम्मान और विचारों के स्वस्थ आदान-प्रदान को प्रोत्साहन' का हवाला देते हुए आरोपी ड्राइवर को सेवा से नहीं हटाया। सच है कि यह घटना ड्राइवर को हटाने लायक नहीं थी और भारत में हरेक को अपने विचारों की अभिव्यक्ति का अधिकार भी होना चाहिए। ओला ने वर्ष 2018 में बड़े गर्व से अपने प्लेटफॉर्म के धर्मनिरपेक्ष चरित्र का जिक्र किया था जब एक हिंदू सवारी ने एक मुस्लिम ड्राइवर की कैब में जाने से मना कर दिया था।
 
इस बीच कॉमेडियन कुणाल कामरा के मामले में निजी विमानन कंपनियों के रवैये से कई सवाल खड़े होते हैं। कामरा ने इंडिगो की एक उड़ान के दौरान भाजपा का यशोगान करने वाले चैनल के एक मशहूर ऐंकर से कई व्यंग्यपूर्ण सवाल किए थे। इसके बाद कामरा को छह महीने के लिए फौरन प्रतिबंधित कर दिया गया। नागरिक उड्डïयन मंत्री के एक ट्वीट ने दूसरी निजी एवं सार्वजनिक एयरलाइंस को भी ऐसा ही कदम उठाने के लिए प्रेरित किया। एक निजी एयरलाइन और उसके यात्रियों के बीच के विवाद में एक राजनीतिक नेता का दखल समझ से परे है।
 
जल्द ही साफ हो गया कि कामरा पर पाबंदी लगाने वाली सभी एयरलाइंस हद से ज्यादा सख्ती बरतने की दोषी हैं। ऐसी हरकत पर अधिकतम तीन माह की ही पाबंदी लगाने का प्रावधान है। वैसे यह हरकत नजरअंदाज नहीं की जा सकती है लेकिन उन्होंने विमान सेवा में बाधा नहीं डाली और न ही उड़ान में उनकी वजह से देर हुई जैसा कि कुछ नेता अभी हाल में कर चुके हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि उस विमान के पायलट ने कोई कदम उठाने के पहले सलाह नहीं लिए जाने पर नाखुशी जताई। उड्डïयन महानिदेशालय ने भी उसका साथ देते हुए कहा कि इस घटना में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उसके बाद कामरा ने एयरलाइन पर 'मानसिक प्रताडऩा' का मुकदमा कर दिया है। ये सभी घटनाएं दर्शाती हैं कि नीरस एवं अराजनीतिक कंपनी के दिन बड़ी तेजी से खत्म हो रहे हैं। उनके रुख से ही आने वाले दिनों में राजनीतिक एवं कारोबारी गतिशीलता तय होगी।
Keyword: corporate, zomato, food, hindu, politics,,
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