बिजनेस स्टैंडर्ड - एक बड़ा समझौता छह बड़े लाभ
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एक बड़ा समझौता छह बड़े लाभ

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  February 23, 2020

भारत-अमेरिका परमाणु समझौता वह सबसे बड़ी उपलब्धि है जिसने दोनों देशों के रिश्तों को बदल दिया। आजादी के बाद के शुरुआती 53 वर्ष में केवल तीन अमेरिकी राष्ट्रपति भारत की यात्रा पर आए: ड्वाइट आइजनहावर (1959), रिचर्ड निक्सन (1969) और जिमी कॉर्टर (1978)। सोमवार को भारत पहुंच रहे डॉनल्ड ट्रंप बीते 20 वर्ष में भारत की यात्रा पर आने वाले पांचवें अमेरिकी राष्ट्रपति हैं। दो बड़े देश जो आधी सदी तक सामरिक दृष्टि से विपरीत मोड़ पर रहे वे अब उस गंवाए समय की भरपाई कर रहे हैं।

 
यह संयोग ही है कि शीतयुद्ध का समापन और सोवियत संघ का विभाजन लगभग उस समय हुआ जब नरसिंह राव और मनमोहन सिंह ने देश में आर्थिक सुधारों तथा भारत में आर्थिक वृद्धि के 25 वर्ष के चरण की शुरुआत की। ऐसे में भारत और अमेरिका के बीच नए रिश्तों की शुरुआत स्वाभाविक थी। परंतु यदि आपसे पूछा जाए कि रिश्तों में बदलाव से जुड़े एक तथ्य या एक उपलब्धि की बात की जाए तो आप क्या कहेंगे? मैं कहूंगा कि यह था भारत-अमेरिका परमाणु समझौता। मुझे पता है कि इसे लेकर दो अतिरंजित प्रतिक्रियाएं सुनने को मिलेंगी। पहली प्रतिक्रिया, इसमें बड़ी बात क्या है, यह तो सबको पता है। दूसरी ओर ऐसा भी कहा जाएगा कि तब से अब तक एक मेगावॉट की परमाणु बिजली क्षमता भी शामिल तैयार नहीं हुई है और अमेरिकी रिएक्टर अगले 15 वर्ष तक कोई बिजली नहीं उत्पन्न करने वाले। यह सोचना कि भारत-अमेरिका परमाणु समझौता द्विपक्षीय रिश्तों से संबंधित है या इसका संबंध केवल बिजली से है, गलत होगा। मनमोहन सिंह को इस संधि को अंजाम देने में जितनी कठिनाई हुई उससे पता चलता है कि यह कितना जटिल था और इसके कितने व्यापक निहितार्थ थे। आइए ऐसे छह बिंदुओं के बारे में बात करते हैं: 
 
इस समझौते की पहली और सबसे बड़ी वजह वैचारिक थी। यह पहला मौका था जब भारत ने अमेरिका के साथ किसी ऐसी द्विपक्षीय संधि पर हस्ताक्षर किए थे जिसके गहरे सामरिक निहितार्थ थे। इससे न केवल शीतयुद्ध के बाद के भारत में 180 डिग्री का बदलाव आया बल्कि एक बड़े सार्वजनिक प्रश्न की परीक्षा भी हुई कि क्या दशकों की आशंका के बाद हम अमेरिकियों को मित्र मान सकते हैं? इस सीमा तक तो यह उस वैचारिक राष्ट्रवाद के खिलाफ था जो कांग्रेस और वाम बौद्धिकों ने चतुराईपूर्वक तैयार किया था। यही कारण है कि वाम दलों के साथ-साथ तकरीबन समूची कांग्रेस इसके खिलाफ थी। इसके अलावा मुस्लिमों की नाराजगी जैसी मूर्खतापूर्ण बातें तो हो ही रही थीं।
 
चूंकि मनमोहन सिंह इसे प्रधानमंत्री के अपने कार्यकाल की उपलब्धि बनाना चाहते थे इसलिए उन्होंने अपनी सावधानीपूर्वक संजोई राजनीतिक पूंजी भी दांव पर लगा दी। उन्होंने अनिच्छुक सोनिया गांधी को इस पर सहमत किया भले ही पुराने सिपहसालार अनिच्छुक थे। इसके बाद 2009 में हुए आम चुनाव ने साबित किया कि भारतीय मतदाता समझदार हैं और भारत के राष्ट्रीय हितों को बेहतर समझते हैं। वे पुराने वाम और दक्षिणपंथी धड़े से अधिक ईमानदार भी हैं। भाजपा जिसे पश्चिम समर्थक माना जाता रहा उसने इस संधि का और अधिक विरोध किया। वाम का विरोध सैद्धांतिक और दक्षिण का राष्ट्रवादी आधार पर था। दोनों की हार हुई। संप्रग पहले से बेहतर सीटों के साथ सत्ता में आई और अमेरिका विरोध का वैचारिक भूत इतने गहरे दफन हुआ कि फिर नहीं उभरा। शीतयुद्ध के बाद के भारत का उदय हो चुका था।
 
दूसरा लाभ सामरिक सिद्धांत से जुड़ा था। हालांकि योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने हाल ही में मुझसे बातचीत के दौरान इसे शीर्ष पर रखा। उन्होंने कहा कि मनमोहन सिंह इस बात को लेकर गहरे तक चिंतित थे कि भारत को परमाणु भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है। क्योंकि परमाणु हथियार क्षमता संपन्न होने के बावजूद उसे परमाणु कारोबार और तकनीकी हस्तांतरण व्यवस्था में शामिल होने लायक नहीं समझा जाता था। यह भेदभावकारी व्यवस्था भेदभाव वाली अप्रसार संधि से उपजी थी।
 
परमाणु संधि ने भारत को इसे तोडऩे का अवसर दिया। वह दौर इस लिहाज से भी बेहतर था कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति और चीनी राष्ट्रपति के बीच रिश्ते अच्छे थे और वह उन्हें भारत के साथ सहजता के लिए प्रेरित कर सकते थे। भारत को अब परमाणु हथियार शक्ति के रूप में मान्यता प्राप्त है बल्कि पाकिस्तान के उलट उसे एक जवाबदेह अप्रसार वाला देश माना जाता है।
 
तीसरा लाभ घरेलू महत्ता का है। अब तक भारत पर ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं थी कि वह खुद को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा उपायों और पारदर्शिता मानकों का विषय बनाए। क्योंकि असैन्य और सैन्य परमाणु कार्यक्रम एक दूसरे में घालमेल वाले थे। ऐसा जानबूझकर था ताकि वे एक दूसरे का आवरण बने रहें। पारदर्शिता और निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसमें संसद भी शामिल थी। इसके साथ ही चूंकि सैन्य और असैन्य कार्यक्रम मिलेजुले थे इसलिए देश की प्रयोगशालाओं के परमाणु वैज्ञानिक खुलकर काम नहीं कर पाते। उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समकक्षों की समीक्षा का माहौल भी नहीं मिल पाता था। हर चीज को संदेह की नजर से देखा जाता था। ऐसे में परमाणु समझौते का एक बड़ा फायदा यह था कि देश का परमाणु कार्यक्रम, उसकी फंडिंग और उसका प्रदर्शन सब पारदर्शिता के दायरे में आ गए। इससे ज्यादा जवाबदेह और सुरक्षित कामकाज को बढ़ावा मिला।
 
अगला लाभ सामरिक और वैज्ञानिक क्षेत्र में हासिल हुआ। इसे असैन्य समझौता कहा गया लेकिन हकीकत में यह गहरी सैन्य और सामरिक संधि थी। इससे अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान की पुरानी आशंका तेजी से कम हुई और भारत को संवेदनशील सैन्य तकनीक और उपकरण मिलने की राह आसान हुई। सन 1980 के दशक के मध्य में भारत और अमेरिका के बीच इतना भी भरोसा नहीं था कि वह मॉनसून की संभावनाओं का पता लगाने के लिए भारत को सुपर कंप्यूटर बेचे। ऐसा तब था जबकि राजीव गांधी और रोनाल्ड रीगन के बीच बहुत अच्छे संबंध थे। अब सर्वाधिक संवेदनशील सैन्य तकनीक, डेटा और खुफिया जानकारी साझा होने लगी है। इस सौदे ने जिसने दोनों देशों के रिश्तों की बुनियाद बदल दी, उसके बिना यह संभव नहीं था।
 
पांचवां लाभ क्षेत्रीय भू राजनीति से संबंधित है। शीतयुद्ध के समापन के बाद 15 वर्ष तक भारत के साथ अपनी नीति को पाकिस्तान से अलग करने की दिशा में बढ़ता रहा। परमाणु समझौते के बाद इसमें नाटकीय बदलाव आया। पहली बार अमेरिका ने भारत के साथ ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसकी पेशकश उसने पाकिस्तान से नहीं की थी। यदि आप इसे पाकिस्तान और भारत को एक तराजू पर तौलने के अंत के रूप में नहीं देखते तो किसी पाकिस्तानी रणनीतिकार से बात कीजिए। इस संधि के बाद अमेरिका ने पाकिस्तान को वापस साथ लेने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया। केवल हम, खासतौर पर मोदी सरकार के अधीन उस पुराने झांसे के बार-बार शिकार बन रहे हैं। हमारी आंतरिक राजनीति में पाकिस्तान गैर जरूरी रूप से महत्त्वपूर्ण हो गया है।
 
छठा और अंतिम लाभ वह है जिसे मैं डरते-डरते अपना पसंदीदा कह रहा हूं। यह लाभ हमारी घरेलू राजनीति में अत्यधिक महत्त्व रखता है। परमाणु संधि ने और जिस तरह हमारे राजनीतिक वाम ने इसका विरोध किया और मुंह की खाई उसने हमारी राजनीतिक अर्थनीति के एक अभिशाप को समाप्त किया जिसका नाम है वामपंथ। सन 2008 में उसके पास लोकसभा की 60 से अधिक सीट थीं लेकिन आज वह दो अंकों में पहुंचने के लिए भी संघर्ष कर रहा है। मनमोहन सिंह की सरकार गिराने के लिए वाम ने संसद में भाजपा से हाथ मिलाया लेकिन पराजित हुआ। इससे सच सामने आया। वाम का अंध अमेरिका विरोध और राजनीतिक हिंदुत्व से साथ मिलाना दोनों सामने आए। जल्दी ही पश्चिम बंगाल से भी उसका पत्ता हमेशा के लिए साफ हो गया। यह लाभ पीढिय़ों तक संभालकर रखने लायक है। भले ही इसे हासिल करने में थोड़ा सा विदेशी हाथ (अमेरिकी) शामिल था। 
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