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टाले जाएं डेटा सर्वेक्षण

संपादकीय /  February 23, 2020

भारत विभिन्न स्तरों पर डेटा गुणवत्ता की समस्या का सामना करता है और इन आंकड़ों के अक्सर देर से आने से समुचित नीतिगत कदम उठाने में विलंब होता है। विश्वसनीय आर्थिक सांख्यिकी की समस्या अब अधिक गंभीर होने की आशंका है। अभी तक यह समस्या महज सरकार की स्वीकृति और सर्वे के परिणाम जारी करने तक ही सीमित थी लेकिन अब यह वहां तक पहुंच चुकी है जहां खुद डेटा संग्रह ही एक समस्या बनती जा रही है। इस समाचारपत्र में पिछले हफ्ते प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार को सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण टालना पड़ सकता है क्योंकि लोग इन सर्वेक्षणों के दौरान सहयोग नहीं कर रहे हैं। उन्हें डर यह है कि सरकार इस जानकारी का इस्तेमाल नागरिकता-निर्धारण के लिए कर सकती है। नतीजतन, एक विशेषज्ञ समिति ने यह सुझाव देने का फैसला किया है कि राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा घरेलू पर्यटन व्यय एवं अन्य संकेतकों के सर्वेक्षण का काम टाल दिया जाए। निश्चित रूप से सरकार के पास यह विकल्प है कि वह यह सलाह न माने। लेकिन इससे दो बड़ी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। 

 
पहली, परिवारों की समुचित भागीदारी न होने से सर्वे की अपेक्षित गुणवत्ता नहीं रह जाएगी जिससे इसका उद्देश्य ही पूरा नहीं होगा। दूसरी, यह उस जगह पर सर्वेक्षकों की जिंदगी को भी खतरे में डाल सकता है जहां आबादी का एक बड़ा तबका नागरिकता प्रावधानों को लेकर परेशान है। कई राज्यों में सर्वे करने गए फील्ड अफसरों पर हमले की घटनाएं देखी गई हैं। मसलन, पश्चिम बंगाल में आर्थिक जनगणना और समय-समय पर होने वालेे श्रमिक बल सर्वेक्षण रोक दिए जाने की खबरें हैं। इससे भी बुरा यह है कि मौजूदा राजनीतिक स्थिति न केवल इस समय जारी सर्वेक्षणों को प्रभावित कर रही है बल्कि आगामी जनगणना को भी खतरे में डाल सकती है। अगर ऐसा होता है तो इसका निहितार्थ अधिक व्यापक होगा। नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ प्रदर्शन देश की राजधानी दिल्ली समेत अलग-अलग हिस्सों में अब भी जारी हैं। 
 
कई राज्य सरकारों ने यह घोषणा की है कि वे सीएए को लागू नहीं करेंगी और वे राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी को अद्यतन करने के भी पक्ष में नहीं हैं। लोगों के बीच अविश्वास बढऩे और केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच मतभेद से जनगणना की प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। देश के पूर्व मुख्य सांख्यिकी अधिकारी प्रणव सेन ने गत दिनों इंडियन एक्सप्रेस से कहा था कि अगर जनगणना का काम सही ढंग से नहीं किया जाता है तो अगले 10 वर्षों तक होने वाले सारे घरेलू सर्वेक्षण भरोसेमंद नहीं रहेंगे क्योंकि ये जनगणना ढांचे पर ही आधारित रहे हैं। इस तरह डेटा की विश्वसनीयता पर आगे और भी सवाल उठेंगे। इससे न केवल नीति-निर्माण प्रभावित होगा बल्कि यह पहले से ही संदेह में घिरी सांख्यिकीय प्रणाली की समग्र विश्वसनीयता को भी चोट पहुंचाएगा। मसलन, जीडीपी से जुड़े आंकड़े पर कई अर्थशास्त्री सवाल उठा चुके हैं। रोजगार संबंधी आंकड़ों का प्रकाशन टालने और उपभोग सर्वेक्षण बंद करने के सरकार के फैसलों ने भी हालत कमजोर की है। हालांकि मौजूदा समस्या कहीं अधिक बड़ी है और अगर सरकार जरूरी कदम उठाती है तो वह बेहतर होगा।
 
डेटा सर्वेक्षणों को लेकर विश्वसनीयता पैदा करने का दायित्व केंद्र सरकार का है क्योंकि यह समस्या नागरिकता कानून में बदलावों से शुरू हुई है। भारत एक खंडित सांख्यिकीय प्रणाली के साथ आगे बढऩे की हालत में नहीं होगा। अगर असमंजस को जल्द दूर नहीं किया जाता है तो भारत की भी गिनती उन देशों में होने लगेगी जो अपनी आर्थिक स्थिति को वास्तविकता से बेहतर दिखाने के लिए आंकड़ों में फेरबदल करते हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि हमारी सांख्यिकीय प्रणाली में बड़ी समस्याएं हैं और उन्हें दूर करने की जरूरत है। सरकार के लिए यह वक्त नीति को राजनीति के ऊपर रखने का है।
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