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ऑडिट की स्वतंत्रता का नया मानदंड

गीतिका श्रीवास्तव और सुदीप्त दे /  February 23, 2020

इस महीने की शुरुआत में ऑडिट व्यवसाय की स्वनियामक संस्था  भारतीय सनदी लेखाकार संस्थान (आईसीएआई) का दिल्ली में 70वां वार्षिक समारोह आयोजित हुआ था जिसमें देश भर से आए सैकड़ों पेशेवरों एवं छात्रों ने शिरकत की थी। इस कार्यक्रम में तमाम मुद्दों पर चर्चा हुई लेकिन कंपनी मामलों के मंत्रालय (एमसीए) की तरफ से हाल ही में जारी एक परामर्श पत्र ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया। दरअसल इस परामर्श पत्र से ऑडिटरों की आजादी  और जवाबदेही को लेकर कई तरह के सवाल खड़े हुए हैं।

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जवाबदेह अंकेक्षक
 
पिछले वर्षों में तमाम जानकार ऑडिटरों की जवाबदेही बढ़ाने की बात करते रहे हैं। इस बार कंपनी मंत्रालय के परामर्श पत्र में इस मुद्दे को अधिक कड़ाई से उठाया गया है। इसके मुताबिक, 'हाल के समय में आईएलऐंडएफएस जैसे मामलों में ऑडिटरों की नाकामी के कई वाकये देखे गए हैं। इसके अलावा ऑडिट रिपोर्टों की गुणवत्ता भी संदेह के घेरे में आई हैं। अधिकांश मामलों में ऑडिटर कंपनी प्रबंधन के साथ मिलकर काम करते नजर आते हैं लिहाजा उनकी स्वतंत्रता एवं जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े होते हैं।' 
 
देश की चार बड़ी ऑडिट फर्मों में से एक के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, 'असल में इस परामर्श पत्र का लहजा चिंता की बात है। इसकी भाषा भी आरोप मढऩे वाली है।' आईसीएआई ने इस परामर्श पत्र का स्वागत करने के साथ ही इस पर अपनी प्रतिक्रिया तय करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बना दी है। लेकिन इस समिति के सुझावों पर ऑडिट जगत में आम सहमति बना पाना काफी मुश्किल होगा। परामर्श पत्र में रखे गए विभिन्न प्रस्तावों में से दो का असर छोटी एवं बड़ी दोनों तरह की ऑडिट एवं सलाहकार फर्मों पर पड़ेगा। पहला प्रस्ताव बिग 4 श्रेणी वाली ऑडिट फर्म के ग्राहकों की संख्या की अधिकतम सीमा तय करने का है। दूसरा प्रस्ताव ऑडिट ग्राहकों को दी जाने वाली गैर-ऑडिट सेवाओं पर पूरी तरह रोक लगाने का है।
 
मंत्रालय ने इस परामर्श पत्र के जरिये घरेलू बाजार में ऑडिट कार्यों की आर्थिक संकेंद्रता और 'प्रतिस्पद्र्धा के अपर्याप्त स्तर' को लेकर अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। ऐसा ऑडिट एवं लेखा क्षेत्र की बिग 4 फर्मों के अल्पाधिकार की वजह से है।  परामर्श पत्र के मुताबिक इस स्थिति से निपटने के दो तरीके हो सकते हैं। पहला, एक समूह की ऑडिटिंग में इस्तेमाल किए जाने वाले फर्मों की संख्या तय की जाए और दूसरा, घरेलू ऑडिट फर्मों को फलने-फूलने का मौका दिया जाए ताकि बिग 4 फर्मों पर उद्योग जगत की निर्भरता कम हो सके।
 
मौजूदा व्यवस्था के तहत एक ऑडिट फर्म 20 से अधिक कंपनियों के खातों का अंकेक्षण नहीं कर सकती है। लेकिन बड़ी ऑडिट फर्में स्थानीय फर्मों के साथ साझेदारी कर लेती हैं और उनके नाम का इस्तेमाल कर अधिक कंपनियों की ऑडिट करने लगती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि निफ्टी में सूचीबद्ध कंपनियों में से 70 फीसदी से भी अधिक कंपनियों का अंकेक्षण बिग 4 फर्मों से जुड़ी इकाइयां करती हैं। यह आंकड़ा प्राइम डेटाबेस का है। कंपनी मंत्रालय का विमर्श पत्र कहता है कि ऐसी स्थिति में ऑडिट की गुणवत्ता के साथ समझौता किया जाता है। यह समूची स्थिति बताती है कि एक समूह से जुडऩे वाली ऑडिट फर्मों की संख्या तय करने की जरूरत है। इसके अलावा एक फर्म में साझेदारों की संख्या भी निर्धारित सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए ताकि उपलब्ध संसाधनों का बेहतर आवंटन हो सके।
 
बिग 4 फर्मों के आकार एवं असर को लेकर ऑडिट जगत में काफी चिंताएं देखी जाती रही हैं लेकिन आम धारणा यही है कि किसी फर्म को उसके आकार की वजह से दंडित करना अनुचित है। बिग 4 में शामिल एक अंकेक्षण एवं लेखा फर्म के पूर्व प्रमुख कहते हैं, 'आर्थिक संकेंद्रण को दुरूस्त करने के लिए बड़े आकार की कई ऑडिट फर्मों की जरूरत है न कि इनका आकार छोटा करना चाहिए।' उनका कहना है कि अगर कोई ऊपरी सीमा रखी जाती है तो वह केवल संक्रमणकालीन उपाय ही होना चाहिए।
 
अधिकतर ऑडिटर इस बात पर एकमत हैं कि छोटी एवं मझोले आकार की ऑडिट फर्मों को बढऩे के लिए उन्हें प्रोत्साहन दिया जाए। खुद आईसीएआई भी अपनी सदस्य ऑडिट फर्मों के लिए नए दिशानिर्देश जारी करने के बारे में सोच रहा है ताकि छोटे एवं मझोले आकार की फर्मों को एक दूसरे के साथ काम करने और आगे चलकर विलय के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। आईसीएआई की नियामक परिषद के एक वरिष्ठ सदस्य कहते हैं, 'हम संदेश प्रसारित करना चाहते हैं कि ऑडिट फर्मों को सीमित देयता भागीदारी (एलएलपी) ढांचे की तरफ कदम बढ़ाने चाहिए।'
 
ऑडिट क्षेत्र से जुड़े कई सदस्यों का मानना है कि ऑडिट ग्राहकों को गैर-ऑडिट सेवाएं देने पर पूरी तरह रोक लगाने का प्रस्ताव सबसे ज्यादा छोटी फर्मों को चोट पहुंचाएगा। अधिकांश ऑडिट फर्में ऑडिट सेवाओं का पूरा पैकेज मुहैया कराती हैं जिनमें कर सलाह और उनके ग्राहकों की अनुपालन संबंधी जरूरतों का ख्याल रखना भी शामिल है। कंपनी मामलों के मंत्रालय के इस विमर्श पत्र में रखी गई सोच को ध्यान में रखते हुए दो बड़ी ऑडिट फर्मों- ग्रांट थॉर्नटन इंडिया और पीडब्ल्यू इंडिया ने यह फैसला किया है कि वे अपने ऑडिट ग्राहकों को इतर सेवाएं नहीं देंगी। ब्रिटेन को छोड़कर कोई भी दूसरा देश ऑडिट ग्राहकों को गैर-ऑडिट सेवाएं देने पर रोक नहीं लगाता है।  कंपनी मामलों के वकील एस एल श्रीराम का सुझाव है कि मंत्रालय को आदर्श रूप में ऑडिट सेवाओं की गुणवत्ता के मानक तय करने चाहिए और हरेक ऑडिट कार्य में लगने वाले कर्मचारियों की न्यूनतम संख्या भी निर्धारित कर देनी चाहिए।
Keyword: company, audiors, corporate fraud,,
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