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नव निकाय के पांच साल

संजीव मुखर्जी /  February 21, 2020

लाल किले के प्राचीर से अपना पहला भाषण देते समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दशकों पहले गठित योजना आयोग को खत्म करने और उसकी जगह नीति आयोग नाम से एक नई संस्था बनाने की घोषणा की थी। यहां पर नीति शब्द 'नैशनल इंस्टीट्यूशन फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया' का कूटनाम है। नीति आयोग के गठन का औपचारिक फैसला 1 जनवरी 2015 को हुई मंत्रिमंडल बैठक में लिया गया था। मशहूर अर्थशास्त्री अरविंद पानगडिय़ा को नीति आयोग का पहला उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया जबकि अफसरशाह अमिताभ कांत को इसका मुख्य कार्याधिकारी (सीईओ) बनाया गया।

 
नीति-निर्माता शुरू से ही एकदम साफ थे कि योजना आयोग की तरह नीति आयोग के पास फंड आवंटित करने की शक्तियां नहीं होंगी और यह सरकार के लिए महज थिंक-टैंक के तौर पर काम करेगा। इसके जरिये केंद्र एवं राज्यों के बीच सहकारी संघवाद की धारणा को मजबूत बनाने की सोच भी रही है। गठन के बाद के कुछ महीने तो आंतरिक व्यवस्था दुरुस्त करने में ही लग गए लेकिन इसे पटरी पर आने में अधिक देर नहीं लगी। आयोग की शासकीय परिषद की बैठक प्रधानमंत्री की अगुआई में हुई और उसमें कई राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल हुए। इस बैठक में कई बहुमूल्य सुझाव सामने आए जिनमें केंद्र-प्रायोजित योजनाओं (सीएसएस) को तर्कसंगत बनाने के लिए मुख्यमंत्रियों का एक पैनल बनाने का प्रस्ताव भी शामिल था। इस पैनल को सरकारी व्यय में होने वाले नुकसान पर काबू पाने के सुझाव देने को कहा गया। 
 
नोटबंदी का फैसला लागू होने के बाद आयोग ने देश भर में डिजिटल मुहिम को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाई और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के साथ सलाह-मशविरे के बाद उसने डिजिटल भुगतान परिदृश्य को लेकर कई अहम सुझाव दिए। नीति आयोग ने नेहरू युग की विरासत कही जाने वाली पंचवर्षीय योजनाओं की जगह लेने के लिए तीन-वर्षीय दृष्टिकोण पत्र भी तैयार किया था। लेकिन इन सभी घटनाओं के बीच यह बात साफ हो गई कि नीति आयोग केंद्र एवं राज्य दोनों जगहों पर नीति-निर्माण को प्रभावित करने के मामले में योजना आयोग की धुंधली छाया ही रह गया है। वित्तीय रूप से भी कमजोर होने से आयोग के कामकाज में शुरू से ही रुकावट आती रही।
 
योजना आयोग के पूर्व सदस्य-सचिव एन सी सक्सेना कहते हैं कि एक संकल्पना के स्तर पर नीति आयोग बहुत ही अच्छा है लेकिन अपनी सोच को लागू कराने के स्तर पर यह निष्प्रभावी है। वह कहते हैं, 'नीति आयोग की संकल्पना सरकारी कार्यक्रमों के स्वतंत्र मूल्यांकनकर्ता और वित्तीय बोझ के बगैर नीतिगत सुझाव देने वाले थिंकटैंक के तौर पर की गई है। लेकिन उसके सुझाए विचारों को लागू करने का सवाल आता है तो यह खेदजनक है।' उनका कहना है कि जब सरकारी कार्यक्रमों के स्वतंत्र मूल्यांकन का वक्त आता है तो कई बार नीति आयोग के प्रमुख पूरी तरह सरकार-समर्थक नजर दिखाई देते हैं। ऐसी स्थिति में भला उनके मातहत यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि मूल्यांकन पूरी तरह स्वतंत्र एवं तार्किक ही होगा? सक्सेना कहते हैं, 'नीति आयोग ने संधारणीय विकास लक्ष्यों (एसडीजी) पर कुछ परिणाम रिपोर्ट पेश की हैं लेकिन उनमें गुणवत्ता की कमी नजर आती है। इनमें दी गई रैंकिंग किसी गिरावट या सुधार के असली कारण नहीं बताती है। इसके अलावा इन रिपोर्टों में दिए गए अधिकांश आंकड़े पुराने और अप्रचलित हो चुके हैं। कुल मिलाकर मैं नीति आयोग से बहुत खुश नहीं हूं।'
 
पानगडिय़ा की विदाई, आयोग को झटका
 
वर्ष 2017 के मध्य में नीति आयोग को पहला बड़ा झटका लगा था जब उसके पहले उपाध्यक्ष अरविंद पानगडिय़ा ने तीन साल का कार्यकाल पूरा होने के पहले ही पद छोड़ दिया। उन्होंने कहा था कि वह कोलंबिया यूनिवर्सिटी में अपना अधूरा शैक्षणिक कार्य आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन इस इस्तीफे में साजिश देखने वालों का मानना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के साथ रिश्तों में आई नरमी ही इसकी असल वजह थी। कहा गया कि संघ परिवार के कुछ घटकों को पानगडिय़ा अधिक पसंद नहीं थे। उनकी विदेशी पृष्ठभूमि के अलावा नीति आयोग को दी गई सीमित शक्तियां भी संघ परिवार को रास नहीं आ रही थी।
 
कुछ मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि पानगडिय़ा नवंबर 2016 में लागू की गई नोटबंदी से इत्तेफाक नहीं रखते थे और इस बारे में भले ही उन्होंने खुलकर कुछ नहीं बोला था लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को यह नागवार गुजरा था। बहरहाल, पानगडिय़ा के इस्तीफे के कुछ दिनों के भीतर ही सरकार ने वित्त मंत्रालय के पूर्व आर्थिक सलाहकार और चर्चित अर्थशास्त्री राजीव कुमार को नीति आयोग का अगला उपाध्यक्ष नियुक्त कर दिया। उस समय यह कहा गया कि राजीव अरविंद पानगडिय़ा के शायद माकूल विकल्प हैं। इससे विदेश में उच्च शिक्षा लेकर लौटने वाले अर्थशास्त्रियों के घरेलू आर्थिक परिवेश को ठीक से नहीं समझ पाने को लेकर जारी चर्चा पर भी लगाम लग गई। 
 
इस घटना के कुछ महीनों बाद नीति आयोग के काफी चर्चित सदस्य विवेक देवरॉय को प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद का प्रमुख बना दिया गया। इस सलाहकार परिषद का कार्यालय नीति आयोग में ही है।  राजीव चाहते हैं कि नीति आयोग को सहकारी संघवाद के एक असरदार उपकरण के तौर पर देखा जाए। उन्होंने बिज़नेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहा, 'नीति आयोग केंद्र सरकार में नए विचार और रूपांतरकारी पहल ले आने के प्रयास करेगा। हम चाहेंगे कि आयोग को आने वाले वर्षों में सहकारी संघवाद के एक प्रभावी साधन के तौर पर देखा जाए।'
 
2018 के बजट में मिला प्रोत्साहन 
 
नीति आयोग के गठन के बाद पहली बार वित्त वर्ष 2018-19 के बजट में उसकी अहमियत को स्वीकार किया गया। उस बजट में कई जगह आयोग की सिफारिशों का हवाला दिया गया था। तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट भाषण में की गई छह बड़ी घोषणाओं में नीति आयोग की भूमिका रही थी। किसानों को उनकी उपज का समुचित मूल्य दिलाने के लिए राज्यों के साथ चर्चा कर एक व्यवस्था बनाने से लेकर कृत्रिम मेधा (एआई) पर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम का खाका तय करने तक हर बड़ी घोषणा में नीति आयोग नजर आ रहा था। 
 
पिछले कुछ वर्षों में कृषि क्षेत्र में उठाया गया एक बड़ा कदम यह है कि आयोग गैर-वन क्षेत्रों में पैदा होने वाले बांस को प्रतिबंधित सूची से बाहर कर दिया गया है। 2018-19 के बजट में बांस उत्पादन को बढ़ाने के लिए कई प्रावधान किए गए थे। जेटली ने बजट में राष्ट्रीय बांस अभियान शुरू करने के साथ ही उसके लिए 1,290 करोड़ रुपये का प्रावधान भी रखा था। पट्टे पर खेती करने वाले किसानों को वाजिब अधिकार देने के लिए राज्यों को भूमि पट्टा कानूनों में बदलाव के लिए भी कहा गया। वित्त मंत्री ने आयोग से एक ऐसी व्यवस्था विकसित करने को कहा था जिसमें पट्टेदार किसानों को भी कर्ज लेने की इजाजत दी जा सके। यह व्यवस्था राज्यों के साथ परामर्श के बाद तैयार की जानी थी। 
 
इसके अलावा आयोग ने बजट में उल्लिखित आयुष्मान भारत योजना का खाका तैयार करने में भी अहम भूमिका निभाई थी। इस महत्त्वाकांक्षी योजना के तहत केंद्र सरकार करीब 10 करोड़ परिवारों को स्वास्थ्य देखभाल बीमा मुहैया कराएगी। इस योजना को प्रभावी बनाने के लिए नीति आयोग इस पर नए सिरे से गौर कर रहा है।  नीति आयोग कृत्रिम मेधा को बढ़ावा देने के लिए एक राष्ट्रीय कार्यक्रम भी शुरू करेगा। एआई के अनुप्रयोग के लिए शोध एवं विकास को भी बढ़ावा दिया जाएगा। इसके अलावा आयोग एयर इंडिया समेत कई केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में रणनीतिक विनिवेश को सफल बनाने पर भी काम कर रहा है।
 
सूत्रों के मुताबिक, सोने को एक परिसंपत्ति श्रेणी के तौर पर एक समग्र स्वर्ण नीति लाना और आसानी से स्वर्ण जमा खाता खोलने के लिए स्वर्ण मुद्रीकरण योजना में संशोधन की कवायद भी नीति आयोग के ही दिमाग की उपज है। नीति आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि देश के अग्रणी थिंकटैंक के तौर पर आयोग सहकारी एवं प्रतिस्पद्र्धी संघवाद को बढ़ावा देने के साथ ई-वाहन और एआई जैसे नवाचारी क्षेत्रों में नीतिगत दिशा देने के लिए अधिकृत है। वह कहते हैं, 'पिछले पांच वर्षों में आयोग ने संपोषणीय विकास लक्ष्यों, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा, नवाचार और आकांक्षी जिला कार्यक्रम जैसे क्षेत्रवार सूचकांकों के जरिये राज्य सरकारों के बीच प्रतिस्पद्र्धा की भावना जगाई है।'
 
मोदी 2.0 में समस्या
 
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती कुछ महीनों में केंद्र के साथ नीति आयोग के संबंधों में थोड़ा बदलाव दिखा है। प्रेक्षकों को लगता है कि आयोग कुछ मुद्दों पर कुछ ज्यादा ही मुखर रहा है जिससे उसे कई बार केंद्रीय मंत्रियों की आलोचना भी झेलनी पड़ी है। गत वर्ष अगस्त में केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने यह कहते हुए आयोग की खिल्ली उड़ाई थी कि उसे वाहन प्रौद्योगिकी के बारे में फैसला लेने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि यह पूरी तरह से उनके मंत्रालय का क्षेत्राधिकार है। खुलकर अपनी बात रखने के लिए जाने जाने वाले गडकरी ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए आईसीई इंजनों से लैस वाहनों का पंजीकरण रोकने संबंधी नीति आयोग के रुख पर यह टिप्पणी की थी। 
 
प्रदूषण में कमी लाने और स्वच्छ पर्यावरण को बढ़ावा देने की मुहिम में इलेक्ट्रिक वाहनों की भूमिका अहम मानी जा रही है। इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए कई प्रोत्साहनों की घोषणा करने वाली फेम योजना के पीछे भी नीति आयोग की ही भूमिका रही है। सूत्र बताते हैं कि आयोग के वरिष्ठ सदस्यों और प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों के बीच हुई एक बैठक में तनातनी की स्थिति बन गई थी। दरअसल आयोग इलेक्ट्रिक वाहनों को पेश करने की समयसीमा पर सख्ती बरत रहा था। आयोग आईसीई इंजनों वाले वाहनों की बिक्री पर चरणबद्ध रोक लगाने के भी पक्ष में था।
 
बड़ी वाहन निर्माता कंपनियों ने आईसीई इंजनों का पंजीकरण रोकने की किसी भी पहल पर आपत्ति जताई। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि इलेक्ट्रिक वाहनों के एक रोडमैप पर चलना जारी रखेंगी। इसके कुछ दिनों बाद केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने एक सेमिनार में कहा कि कई मुद्दों पर नीति आयोग की राय हमेशा सरकार का ही रुख नहीं प्रदर्शित करते हैं क्योंकि यह लगातार नए समाधान लेकर आने वाला एक स्वतंत्र थिंकटैंक है। वह आरएसएस से जुड़े श्रमिक संगठन भारतीय मजदूर संघ द्वारा नौकरियां खत्म करने और सरकारी संपत्तियों की बिक्री के लिए आयोग को जिम्मेदार ठहराए जाने पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे। 
 
इसके कुछ हफ्ते पहले नीति आयोग और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के बीच इस बात को लेकर खींचतान हो गई थी कि सरकार द्वारा प्रस्तावित कृत्रिम मेधा केंद्र पर मालिकाना हक किसका होगा? आयोग ने एआई नेटवर्क बनाने के लिए तीन वर्षों के भीतर 7,500 करोड़ रुपये की मांग की थी जबकि आईटी मंत्रालय ने इस पर 470-480 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया था। मंत्रालय ने नागरिकों के लिए एआई के इस्तेमाल का आकलन करने के लिए 2018 में चार पैनल गठित किए थे। इन पैनल को डेटा प्लेटफॉर्म का गठन, कौशल विकास, शोध एवं विकास और कानूनी, नियामकीय, नैतिक एवं साइबर-सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों को परखना था। इनकी रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है। 
 
नीति आयोग भी गत जून में कृत्रिम मेधा पर राष्ट्रीय रणनीति विषय पर एक विमर्श-पत्र लेकर आया था। वैसे एआई जैसे नई प्रौद्योगिकी इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्रालय के दायरे में आती है लेकिन नीति आयोग ने इस मसले पर कई चर्चाएं की हैं। आयोग की तरफ से जून में पेश विमर्श-पत्र की इस बात के लिए प्रशंसा हुई थी कि इसमें एआई के जरिये हल किए जा सकने वाले मसलों का बढिय़ा खाका पेश किया गया है। लेकिन इसमें एक क्रियान्वयन का कोई व्यापक रोडमैप नहीं दिया गया था। इसके अलावा नीति आयोग का कई अन्य बिंदुओं पर भी सरकार से अलग रुख रहा है। यहां तक कि खुद आयोग के भीतर भी कई महत्त्वपूर्ण मसलों पर विरोधाभासी विचार रहे हैं। 
 
नैसर्गिक खेती को सरकारी प्रोत्साहन इसकी एक बानगी है। सुभाष पालेकर द्वारा विकसित शून्य-बजट नैसर्गिक खेती तकनीक के जरिये सरकार इस खेती तकनीक को बढ़ावा देना चाहती है। नीति आयोग के प्रमुख राजीव कुमार इस तकनीक के घोषित समर्थक हैं लेकिन आयोग के वरिष्ठ सदस्य रमेश चंद को लगता है कि नैसर्गिक खेती खाद्य उत्पादों में रसायनों से बचाव का एकमात्र समाधान नहीं है। हालांकि तमाम जानकारों का कहना है कि एक स्वतंत्र विचार-समूह होने से नीति आयोग से यह अपेक्षित है कि वह सरकार के रुख से अलग राय रखने वाले मुद्दों पर अपने विचार रखे। लेकिन अगर यह मतभेद टकराहट में तब्दील हो जाता है तो हालात बिगड़ सकते हैं। 
 
कुछ रिपोर्टों ने कहा कि उद्योग की हालत सुधारने के लिए उपायों पर आयोग के सख्त रुख के चलते ही सरकार ने पिछले कुछ महीनों में कई कदम उठाए हैं। सवाल यह है कि ये तमाम कदम व्याख्या के लिए कितने सही हैं? पहला, पिछले पांच वर्षों में नीति आयोग को आरएसएस के विभिन्न अनुषंगी संगठनों से होने वाली तमाम आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है। स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक अश्विनी महाजन कहते हैं, 'मेरे हिसाब से इधर-उधर किए गए तमाम बदलावों के बावजूद नीति आयोग वह भूमिका नहीं निभा रहा है जिसके लिए उसका गठन हुआ था। न तो वह राज्यों के बीच सहकारी संघवाद की भावना को मजबूती दे रहा है और न ही वह आर्थिक मसलों पर समुचित नीतिगत सलाह ही दे पा रहा है। ऐसा लगता है कि आयोग बाहरी सलाहकारों पर कुछ ज्यादा ही आश्रित हो गया है।'
 
महाजन बीपीसीएल के विनिवेश का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि नीति आयोग ने लगातार इस विनिवेश प्रस्ताव का समर्थन किया है लेकिन इस मसले के सभी घटकों पर उसने शायद ही ध्यान दिया है। महाजन कहते हैं, 'मुझे लगता है कि भारतीय संदर्भ में किसी मुद्दे को परखने के बाद ही उस पर अंतिम सलाह देनी चाहिए।' बहरहाल नीति आयोग को मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में उस मुकाम से आगे बढऩा होगा जहां वह पहले पहुंच चुका है। अगर वह मौजूदा मुश्किल आर्थिक परिवेश में ऐसा कर पाता है तो भारत के वृद्धि पथ पर गहरा असर डाल सकता है।  
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