बिजनेस स्टैंडर्ड - संस्थागत सुधार से बनेगी बात
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संस्थागत सुधार से बनेगी बात

नितिन देसाई /  February 21, 2020

सरकार को अब अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष पेशकदमी से पीछे हटकर बाजार की विसंगतियां दूर करने और सामाजिक विसंगतियां समाप्त करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। विस्तार से समझा रहे हैं नितिन देसाई

 
इन दिनों अक्सर यह सुनने में आता है कि वृद्धि बहाल करने के लिए अहम नीतिगत सुधार करने होंगे। विजय केलकर और अजय शाह ने अपनी शानदार पुस्तक इन सर्विस ऑफ रिपब्लिक: द आर्ट ऐंड साइंस ऑफ इकनॉमिक पॉलिसी (पेंगुइन रैंडम हाउस 2019) में नीति निर्माण की प्रक्रिया को लेकर जबरदस्त दृष्टिकोण पेश किया है जिसे हर नीति निर्माता और टीकाकार को पढऩा चाहिए। केलकर और शाह अपनी पुस्तक में कहते हैं कि जीडीपी वृद्धि पर संस्थागत निर्माण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
 
सन 1950-51 से देश की जीडीपी सन 1969-70, 1987-88, 1999-2000 और 2010-11 में दुगनी होती गई। क्या तत्कालीन घरेलू राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय आर्थिक माहौल के मद्देनजर उस समय नीतियों में भी चार बार बदलाव देखने को मिला? नेहरू युग की नीति अपने समय के हिसाब से ठीक थी क्योंकि उस समय व्यापक उद्यमिता का अभाव था, पूंजी की कमी थी और तकनीकी क्षमताओं का अभाव था। केलकर और शाह उस समय के लिए इस नीति का मूल्य समझते हैं खासतौर पर तकनीकी और प्रबंधकीय क्षमता कायम करने के मामले में (जो आज हमारी मददगार है) और उद्यमिता का आधार बढ़ाने में। परंतु उनके बुनियादी नियम के मुताबिक देखें तो बड़ा नीतिगत बदलाव और संस्थागत सुधार 1960 के दशक के अंत में और 1970 के दशक के आरंभ में हो जाना चाहिए था।
 
उस वक्त कृषि और खाद्य संरक्षा पर जोर दिया गया जो वांछित था। परंतु बैंकों के राष्ट्रीयकरण के रूप में एक समाजवादी नीति वाला बदलाव, खाद्यान्न कारोबार पर राज्य का नियंत्रण और कोयला एवं तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण, मजबूत एकाधिकारवादी प्रतिबंध और गरीब विरोधी नीतियां आदि जल्दी ही खेद की वजह बन गईं। कहा जा सकता है कि यदि वाम रुझान नहीं होता तो देश की पूंजीवादी अर्थव्यवस्था सन 1980 के दशक के अंत में व्यापक उदारीकरण के लिए तैयार होती। संभवत: भ्रमित राजनीति, कांग्रेस के विभाजन, आपातकाल और निष्प्रभावी जनता सरकार के कारण ऐसा नहीं हुआ। सन 1960 के दशक के मध्य के सूखे और 1970 के दशक में तेल के झटकों ने भी आर्थिक संभावनाओं को क्षति पहुंचाई।
 
जो सुधार 1960 के दशक के आखिर में या 1970 के दशक के आरंभ में होने थे वे एक दशक बाद जैसे तैसे शुरू हुए। परंतु वृद्धि अभी भी सरकारी क्षेत्र पर निर्भर थी। सन 1980 के दशक में तयशुदा निवेश में इसकी हिस्सेदारी बढ़कर 50 फीसदी से अधिक हो गई। केलकर और शाह के रुख के अनुरूप नीतिगत सुधारों में बड़े संस्थागत बदलाव की बात करें तो वह सन 1991 में देखने को मिला जब निवेश और व्यापार नियंत्रण समाप्त किया गया। वित्तीय क्षेत्र में ऐसे सुधार किए गए जिन्होंने पूंजी बाजार को उदार बनाया और अर्थव्यवस्था को बहिर्मुखी बनाया। जीवंत वैश्विक अर्थव्यवस्था, स्वस्थ राजनीतिक माहौल प्रभावी नीतिगत नेतृत्व से भी मदद मिली। 1990 के दशक के सुधारों का प्राथमिक उद्देश्य केंद्र सरकार और निजी क्षेत्र तथा पूंजी बाजार के बीच सुसंगतता कायम करना था। यह बदलाव काफी तीक्ष्ण था क्योंकि तयशुदा निवेश में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी। यह 1980 के दशक के 50 फीसदी से बढ़कर 1990 के दशक में 65 फीसदी और नई सदी के पहले दशक में 75 फीसदी हो गई। 
 
केलकर और शाह का नियम सुझाता है कि अब बड़े नीतिगत और संस्थागत बदलावों का वक्त आ गया है और इन्हें सहस्राब्दी की शुरुआत में और पहले दशक के अंतिम वर्षों में अंजाम दिया जाना चाहिए था। बड़े बदलावों और कुछ बुनियादी सुधारों मसलन जीएसटी और आईबीसी को पूरा किया गया लेकिन अभी भी ध्यान केंद्र सरकार और निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र पर ही केंद्रित है। मेरी दृष्टि में हमें जिन संस्थागत और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता है वे कॉर्पोरेट क्षेत्र के नियामकीय दायरे से बाहर हैं। हमें कृषि, सूक्ष्म और लघु उद्यमों, शिक्षा के क्षेत्र में नीतिगत बदलावों और सरकार के संगठन में अहम सुधारों की आवश्यकता है। इस दिशा में कुछ कदम उठाए गए लेकिन उनसे कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। ऐसे में नीति निर्माताओं को कुछ गहन सवालों के जवाब देने होंगे। 
 
क्या एक पूंजीवादी अर्थव्यवस्था उस स्थिति में किफायती तरीके से काम कर सकती है जब अधिकांश वित्तीय संस्थान सरकार द्वारा नियंत्रित हों और उनके प्रबंधन में राजनीतिक हस्तक्षेप होता हो? क्या प्रबंधन में मामूली बदलाव पर्याप्त हैं? या हमें अधिक कड़े उपायों, मसलन निजीकरण की आवश्यकता है? क्या दो मुख्य अनाजों का समर्थन करने वाली कृषि नीति जो सन 1960 और 1970 के दशक में उपयुक्त रही थी वह कृषि आय और वृद्घि की मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए भी पर्याप्त है? क्या सरकार को प्रत्यक्ष भागीदारी से दूर रहना चाहिए? किसानों को कतिपय प्रतिबंधों से किस प्रकार मुक्त किया जा सकता है कि वे अपनी सामग्री कहां और किसे बेचेंगे तथा उन्हें निर्यात समेत उच्च मूल्य उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है?
 
क्या केंद्रीय विनियमन और प्रबध्ंान वाली व्यवस्था उस वक्त उचित मानी जा सकती है जबकि आपूर्ति के स्रोतों में निजी उत्पादन कंपनियां और बड़े पैमाने पर विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा आपूर्तिकर्ता शामिल हों? हम बिजली आपूर्ति और मांग के बाजार में द्विपक्षीय लेनदेन से थोक बाजार लेनदेन का रुख कैसे करेंगे? क्या सरकारी शिक्षा तंत्र में आमूलचूल बदलाव की आवश्यकता है ताकि केंद्र और राज्य सरकारों के नियंत्रण को कम किया जा सके और स्थानीय संस्थाओं, माता-पिता और छात्रों के प्राधिकार मजबूत किए जा सकें। इसके लिए शिक्षा को मिलने वाला सरकारी समर्थन संस्थानों को प्रत्यक्ष अनुदान या छात्रों को प्रत्यक्ष हस्तांतरण के रूप में दिया जा सकता है। उस स्थिति में गुणवत्ता सुधार का दबाव बनाना अधिक आसान होगा। क्या हम छोटे उद्यमों के साथ भेदभाव वाले आचरण की धारणा समाप्त कर सकेंगे और छोटे रहने से जुड़े प्रोत्साहन समाप्त कर सकते हैं?
 
भारत अब उस चरण से आगे निकल चुका है जहां उसे माई-बाप सरकार की जरूरत थी। उसकी अर्थव्यवस्था अब इतनी जटिल और बहिर्मुखी है कि उसका केंद्रीय प्रबंधन करना मुश्किल हो चला है।  देश की जनता और उद्यम अब इतने सक्षम हैं कि उन्हें सरकारी एजेंसियों की सहायता की आवश्यकता नहीं है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को अब अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इसके बजाय उसे बाजार विसंगति दूर करने, पर्यावरण पर प्रभाव या सामाजिक विसंगतियों मसलन बढ़ती असमानता आदि से निपटने की दिशा में काम करना चाहिए। हमें देश में नीतिगत और संस्थागत सुधारों के क्षेत्र में इसी एजेंडे पर काम करने की आवश्यकता है। 
Keyword: india, economy, GDP,,
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