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सार्वजनिक उपक्रमों के शेयरों में गिरावट से निवेशक परेशान

कृष्ण कांत और देव चटर्जी / मुंबई February 21, 2020

हाल तक भारत की सबसे मूल्यवान सार्वजनिक उपक्रम (पीएसयू) में से एक ओएनजीसी का शेयर 15 साल के निचले स्तर पर आने के बाद अब नजरें केंद्र सरकार के स्वामित्व वाली फर्मों पर है, जो भारतीय एक्सचेंजों पर सबसे ज्यादा पिछडऩे वाली कंपनी बन गई है। 62 पीएसयू का संयुक्त बाजार पूंजीकरण 15.4 लाख करोड़ रुपये है, जो चार साल के निचले स्तर के करीब है और भारतीय स्टेट बैंक को छोड़ दें तो यह मार्च 2009 के बाद के न्यूनतम स्तर पर आ गया है। पीएसयू का बाजार पूंजीकरण मौजूदा वित्त वर्ष में 17.6 फीसदी नीचे है जबकि बेंचमार्क एनएसई निफ्टी-50 इंडेक्स इस अवधि में 4.3 फीसदी चढ़ा है। भारतीय स्टेट बैंक को छोड़ दें (बाजार पूंजीकरण के लिहाज से सबसे बड़ी पीएसयू) तो पीएसयू इंडेक्स पिछले साल मार्च के आखिर के बाद 21.4 फीसदी टूटा है और पिछले तीन साल में इसमें 28 फीसदी की गिरावट आई है, जो उसे सबसे ज्यादा परिसंपत्ति गंवाने वालों में शामिल करता है। एसबीआई का प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा है और पिछले तीन साल में उसके बाजार पूंजीकरण में सालाना चक्रवृद्धि के हिसाब से 18.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है।
 
पिछले तीन साल में पीएसयू का बाजार पूंजीकरण 7.1 फीसदी घटा है और यह मार्च 2017 के आखिर के 19.2 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले इस साल 18 फरवरी को 15.4 लाख करोड़ रुपये रह गया। इस अवधि में एनएसई-50 इंडेक्स में सालाना 9.7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। ओएनजीसी का शेयर जनवरी 2018 में हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन (एचपीसीएल) के अधिग्रहण के बाद शुरू हुई। विश्लेषकों ने कहा कि ओएनजीसी के शेयर में गिरावट की मुख्य वजह दिसंबर तिमाही में कंपनी का कमजोर प्रदर्शन रही। एक विदेशी ब्रोकरेज के विश्लेषक ने कहा, 37,000 करोड़ रुपये की नकदी में एचपीसीएल का अधिग्रहण निवेशकों को रास नहीं आया। इसी वजह से ओएनजीसी के शेयर में गिरावट का रुख है।
 
कंपनी के कमजोर प्रदर्शन की वजह सुसस्त आय और सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों के इर्द-गिर्द बनी नकारात्मक धारणा रही है। इक्विनॉमिक्स रिसर्च ऐंड एडवाइजरी सर्विसेज के संस्थापक व प्रबंध निदेशक जी. चोकालिंगम ने कहा, पिछले कुछ साल में पीएसयू की आय की रफ्तार काफी उत्साहजनक नहीं रही है, लेकिन निवेशक उन कंपनियों से भी दूर हट रहे हैं जिनकी आय की रफ्तार अच्छी है क्योंंकि सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों के इर्द-गिर्द नकारात्मक धारणा बनी हुई है। पिछले पांच साल में पीएसयू (बैंक व गैर-बैंक समेत) का संयुक्त राजस्व सालाना 4.8 फीसदी चक्रवृद्धि की रफ्तार से बढ़ा है और यह 2013-14 के 23.55 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 2018-19 में 29.74 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। इस अवधि में संयुक्त रूप से उनका शुद्ध लाभ वित्त वर्ष 2014 के 1.5 लाख करोड़ रुपये से घटकर पिछले साल मार्च के आखिर में 60,300 करोड़ रुपये रह गया।
 
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने पिछले पांच साल में लाभ में सबसे बड़ी गिरावट देखी है। सूचीबद्ध एनबीएफसी समेत पीएसयू के लेनदारों का संयुक्त रूप से शुद्ध नुकसान वित्त वर्ष 2019 में 57,000 करोड़ रुपये रहा जबकि वित्त वर्ष 2014 में उनका शुद्ध लाभ 65,500 करोड़ रुपये रहा था। कुल मिलाकर इन लेनदारों ने पिछले पांच साल में 1.34 लाख करोड़ रुपये गंवाए हैं। पीएसयू का संयुक्त नकदी भंडार पिछले साल मार्च के आखिर में 15 साल के निचले स्तर 85,000 करोड़ रुपये पर आ गया, जो मार्च 2014 के आखिर में 1.74 लाख करोड़ रुपये था।
 
कई पीएसयू पूंजीगत खर्च के लिए और अन्य पीएसयू के अधिग्रहण या विशेष लाभांश के लिए उधार लेने को बाध्य हुई है, जिससे उनकी बैलेंस शीट में गिरावट आई है। गैर-वित्तीय पीएसयू का शुद्ध कर्ज-इक्विटी अनुपात पिछले साल मार्च के आखिर में 0.71 गुने के सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई, जो एक साल पहले 0.62 गुना था और मार्च 2014 के आखिर में 0.44 गुना। पीएसयू का शुद्ध कर्ज पिछले पांच साल में दोगुने से ज्यादा हो गया है। उनका कर्ज पिछले साल मार्च के आखिर में 6.02 लाख करोड़ रुपये था, जो एक साल पहले 4.98 लाख करोड़ रुपये और मार्च 2014 के आखिर में 2.96 लाख करोड़ रुपये था। 
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