बिजनेस स्टैंडर्ड - सीएए का साया : टल सकता है सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण
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सीएए का साया : टल सकता है सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण

सोमेश झा / नई दिल्ली 02 20, 2020

जनवरी में शुरू हुआ था सर्वेक्षण का काम

78वां चरण : घरेलू पर्यटन व्यय एवं विविध संकेतक सर्वेक्षण
अवधि : जनवरी-दिसंबर 2020
उद्देश्य : पर्यटन व्यय और टिकाऊ विकास लक्ष्य, 2030 के लिए विकास संकेतकों के बारे में जानकारी एकत्र करना
दायरे में शामिल विषय : खाद्य असुरक्षा, परिवारों में सुविधाएं, शिक्षा, कौशल, प्रवास, आवासीय संपत्तियों की खरीद या निर्माण, जन्म प्रमाण पत्र, मोबाइल/इंटरनेट का इस्तेमाल
स्थिति : सीएए और एनआरसी को लेकर हो रहे विरोध को देखते हुए विशेषज्ञ समिति ने सर्वेक्षण को टालने की सिफारिश की है

बिजनेस स्टैंडर्ड सीएए का साया : टल सकता है सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षणनागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शनों के कारण एक अहम सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण स्थगित हो सकता है। इस सर्वेक्षण का काम जनवरी में शुरू हुआ था लेकिन इसमें शामिल अधिकारियों को लगातार लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ रहा है। लोगों को संदेह है कि इसके जरिये नागरिकता तय करने के लिए आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के 78वें दौर के सर्वेक्षण को स्थगित करने का फैसला बुधवार को विशेषज्ञ समिति की बैठक में लिया गया। यह सर्वेक्षण घरेलू पर्यटन खर्च और कई संकेतकों के लिए किया जा रहा है।

एक सूत्र ने कहा कि एक विशेषज्ञ समूह की बुधवार को बैठक हुई जिसमें सर्वेक्षण के काम में लगे अधिकारियों के समक्ष देश के विभिन्न हिस्सों में पेश आ रही चुनौतियों के मद्देनजर सर्वेक्षण को टालने का सुझाव दिया गया। अब इस पर सरकार को अंतिम फैसला लेना है। सर्वेक्षण में शामिल अधिकारियों के सामने एक बड़ी चुनौती यह आ रही है कि उन्हें लोगों से सहयोग नहीं मिल रहा है। उन्हें घर से भगा दिया जाता है या उन पर हमले किए जा रहे हैं। इससे उनके जीवन को खतरा पैदा हो गया है। लोगों को डर है कि सर्वेक्षण के काम में लगे अधिकारी जो आंकड़े एकत्र कर रहे हैं, उनका इस्तेमाल नागरिकता के निर्धारण में किया जा सकता है। 

78वें दौर के सर्वेक्षण का काम इस साल जनवरी से दिसंबर के बीच किया जाना है। इसका मकसद देश में पहली बार संयुक्त राष्ट्र के 2030 के सतत विकास लक्ष्यों के कई संकेतकों की मैपिंग करना है। साथ ही इससे लोगों के पलायन और मकान खरीदने की प्रवृत्ति के आंकड़े एकत्र किए जा रहे हैं। सर्वेक्षण के इस दौर में जिस तरह के प्रश्न पूछे जा रहे हैं, उसने मामले को और जटिल बना दिया है। इसमें कुछ इस तरह के प्रश्न शामिल हैं जैसे, क्या आप कम से कम छह महीने से इसी जगह पर हैं? आप इससे पहले कहां रहते थे? क्या परिवार के सदस्यों की कहीं और जाने की योजना है? परिवार के सदस्य इससे पहले किस देश में रहते थे?

फिर कुछ ऐसे बुनियादी सवाल हैं जिन्हें लोग शक की नजर से देखते हैं? उदाहरण के लिए धर्म से जुड़ा सवाल या क्या आपके पास जन्म प्रमाण पत्र है या 31 मार्च, 2014 के बाद खरीदे गए मकान के बारे में। एनएसओ को उत्तर प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक सहित कई राज्यों से शिकायत मिली है। लेकिन इनमें सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य पश्चिम बंगाल है जहां अभी कोई सर्वेक्षण नहीं हो रहा है।  पश्चिम बंगाल में एनएसओ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, '78वें दौर का सर्वेक्षण कुछ स्थानों पर शुरू हुआ था लेकिन इसका विरोध बढ़ता गया और इस काम में लगे अधिकारियों की सुरक्षा को खतरा हो गया। उन पर हमले हुआ और उनका घेराव किया गया। जिला प्रशासन का भी कहना है कि यह किसी भी सर्वेक्षण के लिए उचित समय नहीं है।'

पश्चिम बंगाल के फील्ड ऑफिस ने बुधवार की बैठक में इस बारे में तस्वीरें और अखबारों में आई खबरों को साझा किया। अधिकारी ने कहा, 'शुरुआत में हमने सोचा कि पलायन से जुड़े कुछ सवाल चिंता का विषय हैं। लेकिन लोग नाम और धर्म से जुड़े बुनियादी सवालों पर भी नाराज हो रहे हैं।'  पश्चिम बंगाल में कई अन्य सर्वेक्षण में रोक दिए गए हैं। इनमें सातवीं आर्थिक गणना, साविधिक श्रम बल सर्वेक्षण और असंगठित क्षेत्र उद्यम सर्वेक्षण भी शामिल हैं। राज्य में केवल कृषि, उद्योग और बाजार मूल्य के आंकड़ों से जुड़े सर्वेक्षणों का काम ही चल रहा है। 

बिहार में भी यही स्थिति है जहां सीमावर्ती इलाकों खासकर उत्तरी इलाके में एनएसओ के सर्वेक्षणों में समस्या हो रही है। बिहार में एनएसओ के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, 'लोग सर्वेक्षण के सवालों और सीएए में संबंध खोजने की कोशिश कर रहे हैं। लोगों की रिहाइश और पलायन से संबंधित सवालों से स्थिति विकट हो रही है।' मुख्य सांख्यिकीविद् प्रवीण श्रीवास्तव ने इस बारे में बिज़नेस स्टैंडर्ड द्वारा भेजे गए सवालों का जवाब नहीं दिया।

आगे का रास्ता क्या है? पूर्व मुख्य सांख्यिकीविद् प्रणव सेन ने कहा, 'अभी ज्यादा कुछ नहीं किया जा सकता है। सबकुछ राष्ट्रीय जनसंख्या पंजिका पर निर्भर करता है।' सेन आर्थिक सांख्यिकी पर स्थायी समिति के भी अध्यक्ष हैं। उन्होंने कहा कि अगर बड़ी संख्या में लोग सवालों का जवाब नहीं देते हैं, तो इससे सर्वेक्षण के नतीजों पर फर्क पड़ेगा। 

सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण को टालने का सुझाव देने का विशेषज्ञ समिति का फैसला ऐसे वक्त आया है जब सरकार 2020-21 और 2021-22 में उपभोक्ता व्यय पर लगातार दो सर्वेक्षण करने की योजना बना रही है। देश में रोजगार और बेरोजगारी की थाह लेने के लिए साविधिक श्रम बल सर्वेक्षण भी 2017-18 से नियमित रूप से हो रहा है। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने पिछले साल नवंबर में खुलासा किया था कि 2011-12 से 2017-18 के बीच उपभोक्ता खर्च में चार दशक में पहली बार 3.7 फीसदी की गिरावट आई है जो गरीबी का स्तर बढऩे का संकेत है।

इसके बाद सरकार ने एनएसओ द्वारा 2017-18 में किए गए आधिकारिक सर्वेक्षण से पल्ला झाडऩे का फैसला किया था। इस रिपोर्ट को कार्यकारी दल ने जून, 2019 में मंजूरी दी थी लेकिन प्रतिकूल निष्कर्षों के कारण इसे रोक दिया गया। सीएसएस जनवरी 2019 में कानून बना था। इसके तहत तीन पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए गैर मुस्लिमों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है। इस कानून के खिलाफ देशभर में व्यापक प्रदर्शन हुए हैं। 

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