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प्रस्ताव के खिलाफ बढ़ रहा एमएफ का मतदान

ऐश्ली कुटिन्हो / मुंबई February 20, 2020

म्युचुअल फंड अभी भी भारतीय कंपनी जगत के साथ सीधा संघर्ष करने में हिचकते हैं लेकिन शेयरधारक प्रस्तावों के खिलाफ उनके मतदान में पिछले कैलेंडर वर्ष के मुकाबले तेजी आई है। वर्ष 2019 में खिलाफ मतों का प्रतिशत बढ़कर 4.23 फीसदी हो गया जो पिछले पांच वर्षों का सर्वाधिक आंकड़ा है। वर्ष 2018 में यह आंकड़ा 3.4 फीसदी रहा था। विकसित बाजारों में संस्थागत निवेशकों ने आमतौर पर कंपनियों द्वारा लाए गए 5 से 10 फीसदी शेयरधारक प्रस्तावों के खिलाफ मतदान किया। हालांकि शीर्ष 10 फंड हाउस के महज 3.3 फीसदी वोट प्रबंधन के खिलाफ गए। 
 
प्राइमएमएफडेटाबेस के आंकड़ों से पता चलता है कि इनमें से छह फंड हाउसों- आदित्य बिड़ला सन लाइफ, एचडीएफसी एमएफ, आईसीआईसीआई प्रुडेंशियल एमएफ, कोटक एमएफ, आईडीएफसी एमएफ और ऐक्सिस एमएफ- ने इस तरीके से 0.1 फीसदी से भी कम मतदान किया। जबकि अनुपस्थित रहने वाले मतों का प्रतिशत घटकर 10.9 फीसदी रह गया जो एक साल पहले 12.5 फीसदी रहा था। जबकि 2010 के दशक के शुरुआती वर्षों में यह आंकड़ा 80 से 90 फीसदी के दायरे में रहा था। इस लिहाज से इसमें जबरदस्त गिरावट दर्ज की गई।
 
वैल्यू रिसर्च के मुख्य कार्याधिकारी धीरेंद्र कुमार ने कहा, 'पहले आधे से अधिक उद्योग मतदान नहीं करता था। यही कारण है कि अनुपस्थित रहने वाले मतों की संख्या घटकर 11 फीसदी रह गई और प्रस्ताव के खिलाफ मतदान में मामूली तेजी आई है। इसे सकारात्मक तौर पर देखा जाना चाहिए।' आम बैठक में मतदान अल्पांश शेयरधारक के लिए कंपनी के निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित करने का हथियार है। आईआईएएस के संस्थापक अमित टंडन ने कहा, 'महज निशान लगा देने के नजरिये के बजाय अब मतदान के बारे में कहीं अधिक सोच-विचार किया जाने लगा है। फंड हाउस संबंधित कंपनी के निर्णय में भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं।' भारतीय म्युचुअल फंडों कर मतदान करने का तरीका उल्लेखनीय है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों के दौरान उन्हें काफी उतार-चढ़ाव से जूझना पड़ा है। 7.8 लाख करोड़ रुपये से अधिक की इक्विटी पूंजी के साथ म्युचुअल फंड बाजार का रुख तेजी से बदल रहे हैं।
 
पिछले दो वर्षों के दौरान म्युचुअल फंडों का शुद्ध निवेश 1.65 लाख करोड़ रुपये रहा जो विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के कुल 67,098 करोड़ रुपये के मुकाबले करीब 2.5 गुना अधिक है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह केवल प्रतिशत ही नहीं है बल्कि प्रस्ताव के खिलाफ मतों का प्रकार मायने रखता है। इनगवर्न रिसर्च सर्विसेज के संस्थापक एवं प्रबंध निदेशक श्रीराम सुब्रमण्यन ने कहा, 'भारतीय संस्थागत निवेशकों को महत्त्वपूर्ण कंपनी मामलों जैसे निदेशकों एवं ऑडिटरों की नियुक्ति आदि में दखल देनी चाहिए। उसे खुद को शेयर जारी करने अथवा बढ़ते ऋण जैसे पूंजीगत ढांचे में बदलाव से संबंधित मामलों तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए।'
 
म्युचुअल फंड कई कंपनियों के लिए लिक्विड परिसंपत्तियों का प्रबंधन करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे में फंड हाउस प्रबंधन के खिलाफ जाने से हिचकिचाते हैं क्योंकि कंपनियों पर सवाल उठाने से उनके फंड में किए गए निवेश की निकासी की जा सकती है। साथ ही कई कंपनियों में खुद म्युचुअल फंडों का बड़ा निवेश है जिससे मतदान के दौरान हितों का टकराव हो सकता है।
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