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सर्वोच्च अदालत में याचिकाओं की भरमार, उपाय की दरकार

अदालती आईना
एम जे एंटनी /  February 20, 2020

उच्चतम न्यायालय का पूर्व अवतार फेडरल कोर्ट तभी बैठता था जब उसके समक्ष कोई मामला आता था। उसके पास कभी-कभार ही कोई मामला पहुंचता था। जब 1950 में उच्चतम न्यायालय का गठन हुआ तो उसके पास आने वाले मामलों की संख्या बहुत कम थी। वे ऐसे छपते थे जैसे दिल्ली के कुछ अखबारों में आने वाले कार्यक्रमों के विज्ञापन। लेकिन अब समय बदल चुका है। अब मामले सैकड़ों पन्नों में छपते हैं और 16 कमरों में 34 न्यायाधीश सुनवाई करते हैं। वकीलों की संख्या 50 गुना बढ़ गई है। इससे न्यायालय के गलियारों और कमरों में भीड़भाड़ बढ़ गई है। मुख्य न्यायाधीश और अटॉर्नी जनरल ने पिछले सप्ताह सवाल उठाया कि क्या 1958 में बना उच्चतम न्यायालय का मौजूदा परिसर जगह की कमी के दबाव को झेल सकता है। उन्होंने एक नया परिसर बनाने की संभावना पर भी चर्चा की। माना जा रहा है कि न्यायालय एक फर्म से भी सलाह मशविरा कर रहा है जिसे सार्वजनिक इमारतों में भीड़ के प्रबंधन में विशेषज्ञता हासिल है। 

 
शीर्ष न्यायालय पर दबाव के पीछे कई कारण हैं। इसका अधिकार क्षेत्र बहुत व्यापक है। 2019 में दिए गए 1,293 फैसलों के विश्लेषण से इसका संकेत मिलता है। उच्चतम न्यायालय को संवैधानिक अदालत माना जाता है लेकिन उसने पिछले वर्ष जिन मामलों में फैसला सुनाया, उनमें से केवल 43 मामले (3.3 फीसदी) ही प्रत्यक्ष तौर पर संविधान से जुड़े थे। इसकी तुलना में 188 फैसले सरकारी नौकरियों से जुड़े थे। ये चयन, तबादला, प्रोन्नति, पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ जैसे मामूली मुद्दों से जुड़े थे। इनसे निपटने के लिए प्रशासनिक पंचाट और अपील संस्थाएं हैं लेकिन उच्चतम न्यायालय के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। फैसले से असंतुष्टï लोगों के लिए समीक्षा और सुधारात्मक याचिका का भी विकल्प है। सशस्त्र सेनाओं के पंचाटों के खिलाफ अपील भी उच्चतम न्यायालय में दायर की जाती है। उच्चतम न्यायालय ने ऐसे 35 मामलों में फैसला सुनाया जो रक्षा बलों में विषमताओं की ओर इशारा करते हैं। 
 
हालांकि देश में एक व्यापक मध्यस्थता एवं सुलह कानून है जो कई बार संशोधित हो चुका है। लेकिन इस मुद्दे पर भी 53 फैसले दिए गए। ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया कानून ने उच्चतम न्यायालय का अधिकांश बोझ ले लिया है लेकिन शीर्ष न्यायालय ने कंपनी कानून, बैंकिंग और बुनियादी ढांचे से जुड़े 31 मामलों में फैसला सुनाया। इसी तरह 38 फैसलों में श्रम कानून से जुड़े सवालों का निपटारा किया गया। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों से जुड़े फैसलों की संख्या 36 थी। 63 मामलों में भूमि अधिग्रहण, हदबंदी कानूनों और भूमि सुधार कानूनों के तहत विवादों का निपटारा किया गया। 
 
न्यायालय ने साथ ही किरायेदार और मकान मालिक से जुड़े 27 विवादों में फैसला दिया। हरित पंचाटों की स्थापना के बाद पर्यावरण से जुड़े मामलों की संख्या घटकर 20 रह गई है। उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल सबसे अधिक 324 फौजदारी मामलों का निपटारा किया। इनमें से अधिकांश अपील हत्या, घरेलू हिंसा, यौन हमला, किशोरों से जुड़े अपराध, अनुसूचित जाति/जनजाति, भ्रष्टïाचार, एहतियाती हिरासत और जमानत से जुड़े थे। इन अपीलों में तथ्यों से जुड़े सवाल उठाए गए थे और आमतौर पर इन्हें उच्चतम न्यायालय तक नहीं पहुंचना चाहिए लेकिन निचले स्तर पर न्याय की खराब गुणवत्ता और कानूनी पेशे की प्रवृत्ति के कारण ऐसे मामले शीर्ष न्यायालय में पहुंच जाते हैं। विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि जनहित याचिका से अदालत पर बोझ बढ़ा है और व्यक्तिगत याचियों को लंबा इंतजार करना पड़ रहा है क्योंकि बेतहाशा ऐसे मामले दायर किए जा रहे हैं। लेकिन केवल 18 जनहित याचिकाओं में ही फैसले दिए गए जो उनकी धारणा के अनुकूल नहीं है। जनहित याचिकाओं पर फैसलों से समाज के एक बड़े वर्ग को फायदा होता है। 
 
रिट अदालतों में भविष्य में और बोझ पडऩा तय है। इसलिए नहीं कि हर बजट में उनके बुनियादी ढांचे के विकास के लिए पर्याप्त राशि आवंटित नहीं की गई बल्कि इसलिए भी कि साक्षरता और कानून के बारे में जानकारी बढ़ रही है। देश में जारी मौजूदा राजनीतिक माहौल में दुकानों में संविधान की प्रतियों की बिक्री बढ़ गई है। प्रस्तावना और मौलिक अधिकारों को पढऩा विरोध प्रदर्शनों का हिस्सा बन गया है। कई शहरों में विरोध प्रदर्शन की जगहों पर पुस्तकालय बनाए जा रहे हैं। मौलिक अधिकार स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बन गए हैं। व्यावसायिक फिल्मों में कानूनी विषयों को उठाया जा रहा है और सेक्शन 375 जैसी फिल्में बनाई जा रही हैं। जब लोग संविधान पढऩा शुरू करते हैं तो अदालतों में इस पर लंबी बहस होती है। भारत का संविधान दुनिया में सबसे लंबा है जिसमें 395 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियां हैं और 120 से अधिक संशोधन हो चुके हैं। अगर अदालत कार्यवाही के लाइव-स्ट्रीमिंग यानी सीधे प्रसारण की अनुमति दे दे तो भरमार कुछ कम हो सकती है। न्यायाधीश विशेष अनुमति याचिकाओं की संख्या पर भी लगाम लगा सकते हैं जिन्हें आसानी से स्वीकार किया जाता है। कई मामलों में तो उच्च न्यायालय के स्तर पर ही निपटारा हो जाना चाहिए। इससे न्यायालय को कई दशकों से लंबित करीब 60 संवैधानिक मामलों की सुनवाई के लिए कुछ समय मिल जाएगा।
Keyword: supreme court, high court, justice,,
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