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अर्थव्यवस्था की स्थिति और बाजार के संकेत

नीलकंठ मिश्रा /  February 20, 2020

भारतीय अर्थव्यवस्था के भविष्य के रुख के अनुमानों की बात करें तो यह कहा जा सकता है कि संकीर्ण शेयर बाजार सूचकांक इन अनुमानों से कहीं दूर हो सकते हैं। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं नीलकंठ मिश्रा 

 
व्यापक तौर पर यह माना जाता है कि शेयर बाजार अर्थव्यवस्था का एक अग्रगामी संकेतक है। हालांकि ऐसा व्यक्ति तलाश करना मुश्किल है जो भविष्य को लेकर संपूर्ण दृष्टि रखता हो। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि बाजार कई व्यक्तियों का एक 'न्यूट्रल नेटवर्क' होता है। ये तमाम लोग शेयरों के सामूहिक क्रय-विक्रय के आधार पर आर्थिक रुझान को परिलक्षित करते हैं। ये रुझान कई बार वास्तविक घटनाक्रम के महीनों या वर्षों पहले भी देखने को मिल सकते हैं। लोग मानते हैं कि यह सामूहिक सबक, व्यक्तिगत प्रतिभागियों से कहीं अधिक बेहतर होता है। 
 
यह बात बहुत आकर्षक प्रतीत होती है और हममें से जिन लोगों ने बाजार में लंबा समय बिताया है, उनके दिमाग में ऐसे कई उदाहरण आएंगे जहां शेयर कीमतें बुनियादी बदलावों से आगे चलती रहीं और लोगों को अंदाजा भी नहीं था कि ऐसा होने वाला है। इसके साथ ही पुराने लोगों को यह भी याद होगा कि कई बार कीमतें असंगत रूप से ऊंची या नीची हो जाती हैं, लोगों में हड़बड़ी भी देखने को मिलती है। प्रश्न यह है कि कमजोर आर्थिक गति और शेयर कीमतों में इजाफे की मौजूदा असंगति को किस प्रकार देखा जाए? क्या बाजार का इशारा आर्थिक सुधार की ओर है या फिर वे जल्दी आर्थिक कमजोरी दर्शाने लगेंगे और उनमें सुधार होगा? 
 
फिलहाल यह याद रखना उचित होगा कि शेयर बाजार का गठन अर्थव्यवस्था से अलग है। इसे दर्शाने के लिए हम शीर्ष 500 शेयरों को चार श्रेणियों में बांटते हैं: वैश्विक, वृहद, पहुंच और बाजार हिस्सेदारी। वैश्विक शेयरों की बात करें तो बुनियादी शेयर वैश्विक रुझान से संचालित होते हैं। उदाहरण के लिए धातु, तेल रिफाइनरी, औषधि निर्यातक, और भारत में सूचीबद्घ वैश्विक वाहन कंपनियां आदि। वृहद श्रेणी के शेयर वे शेयर हैं जिन पर घरेलू आर्थिक वृद्घि का सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। इनमें औद्योगिक कंपनियों के शेयर, सरकारी बैंकों के शेयर, सीमेंट और अन्य उपयोगी वस्तुओं के शेयर शामिल हैं। पहुंच वाली श्रेणी में वे कंपनियां हैं जो बेहतर वितरण तथा अन्य कारकों के कारण औपचारिक अर्थव्यवस्था की तुलना में तेजी से विकसित होती हैं। मसलन बीमा और वातानुकूल संयंत्रों की मांग कमजोर आर्थिक स्थिति के बावजूद बेहतर बनी रही। बाजार हिस्सेदारी की बात करें तो निजी बैंक बैंक ऋण न बढऩे के बावजूद दो अंकों में बढ़ रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकारी बैंकों से बाजार हिस्सेदारी छिन रही है। इससे पता चलता है कि बाजार पूंजीकरण के पांचवें हिस्से से भी कम वृहद श्रेणी में है। यह बात शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था की असंगतता को रेखांकित करती है। 
 
पूंजी की आवक भी शेयर कीमतों पर असर डालती है। सैद्घांतिक तौर पर ऐसा लंबे समय तक नहीं होना चाहिए और अग्रगामी आय की भी भूमिका होनी चाहिए। बाजार प्रतिभागियों का फंड का इस्तेमाल करने या न करने का निर्णय भी बाजार से जुड़े अनुमानों से प्रभावित होना चाहिए। ऐसे में घरेलू म्युचुअल फंड में तेज आवक के अलावा विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। बीते 12 महीनों में इन्होंने 16 अरब डॉलर की खरीद की है जो चार वर्ष के उच्चतम स्तर पर है। देश की आर्थिक वृद्घि के अनुमानों में तेज गिरावट के बावजूद ऐसा हुआ है। यह रुझान जल्द बदलता नहीं दिखता। 
 
इसे समझने के लिए हमें शेयर बाजार के स्वामित्व की प्रकृति पर नजर डालनी होगी: इसके आधे हिस्से पर प्रवर्तक काबिज हैं। इसमें सरकारी और निजी दोनों तरह के प्रवर्तक शामिल हैं। शीर्ष 500 शेयरों का विदेशी स्वामित्व दिसंबर 2019 में 21.2 फीसदी के साथ 30 महीने के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। इसका पांचवां हिस्सा सॉवरिन वेल्थ फंड्स, विदेशी केंद्रीय बैंकों और पेंशन फंड के पास है। भारत में इन फंड का एक मानक आवंटन है और वे आवक पर भी नजर रखते हैं। पांचवां हिस्सा हेज फंड जैसे व्यापक फंडों के पास और आधा म्युचुअल फंड के पास है। ये इक्विटी सूचकांक के मानक हैं और इनमें भारतीय हिस्सेदारी अवश्य है। जब वैश्विक शेयर बाजार की मजबूती की बदौलत इन मानक फंड में आवक होती है तो कम से कम कुछ हिस्सा भारत पहुंचता है। यदि फंड प्रबंधक भारत की संभावनाओं को बेहतर न मानें तो भारत का दबदबा कम हो सकता है। भारत के समर्पित फंड धन जुटाने में संघर्ष करते रहे हैं। बीते पांच वर्ष में एफपीआई खरीद का बड़ा हिस्सा वित्तीय रहा है। इनमें अभी भी मजबूत आय वृद्घि हो रही है। 
 
शेयर बाजार का घरेलू संस्थागत स्वामित्व रिकॉर्ड स्तर पर है क्योंकि म्युचुअल फंड में अच्छी आवक हो रही है। शेयर में यह वृद्घि सरकार के खर्च पर हुई है। उसकी हिस्सेदारी 8 फीसदी के निचले स्तर पर है। दशक भर पहले यह 28 फीसदी पर थी। ऐसा मोटे तौर पर सरकारी शेयरों के कमजोर प्रदर्शन और उसकी हिस्सेदारी की बिकवाली से हुआ। शेयरों का खुदरा स्वामित्व भी 14.2 फीसदी के निचले स्तर पर रहा, हालांकि यहां गिरावट अधिक गहरी है। हमारे विश्लेषकों के मुताबिक ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि बचतकर्ता परिसंपत्तियों को प्रबंधित पोर्टफोलियो से म्युचुअल फंड में ले जा रहे हैं। 
 
ऐसा इसलिए क्योंकि छोटे और मिड-कैप फंड के प्रबंधन वाली परिसंपत्ति अब तक के उच्चतम स्तर पर है। यह 15 माह पहले के स्तर से 29 फीसदी ऊंचाई पर है। ऐसा छोटे और मिड-कैप शेयरों में कमजोरी के बावजूद है। एफपीआई का ध्यान बड़े और नकदीकृत शेयरों पर है। उल्लेखनीय है कि घरेलू म्युचुअल फंड के लिए भी निष्क्रिय फंड अब एयूएम के 15 फीसदी के लिए उत्तरदायी हैं। चार वर्ष पहले यह शून्य के करीब था। निवेशक इन फंडों का चयन प्रबंधन शुल्क बचाने और बाजार पर लंबी अवधि का दांव लगाने के लिए करते हैं। इन फंड को ईपीएफओ से भी मदद मिलती है। ऐसी आवक 200 से 500 शेयरों वाले सूचकांक के बजाय 30 से 50 शेयरों वाले सूचकांक की जमीन तैयार करती है। छोटे और मिड-कैप शेयर दो वर्ष से कमजोर रहे लेकिन जनवरी में उन्होंने जबरदस्त वापसी की। परंतु फरवरी में एक बार फिर उनमें गिरावट का दौर शुरू हो गया है जो जारी रह सकता है। 
 
घरेलू अर्थव्यवस्था लार्ज-कैप शेयरों के बजाय छोटे और मिड-कैप शेयरों के मामले में अधिक जोखिम में है। उनका स्वामित्व भी घरेलू है इसलिए वे विदेशी फंड प्रवाह से प्रभावित नहीं होते। जो लोग शेयर बाजार की ओर से अर्थव्यवस्था को मिलने वाले अग्रगामी संकेतों की ओर देख रहे हैं, उनके लिए छोटे और मझोले शेयरों का प्रदर्शन भविष्य का बेहतर संकेतक हो सकता है, बजाय कि संकीर्ण और कहीं अधिक लोकप्रिय सूचकांकों की तुलना में। 
Keyword: india, economy, GDP, share market,,
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